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सोचा था कि यह किताब किसी एक की कहानी होगी । पढ़ने लगा तो देखा कि इसमें कई कहानियाँ हैं जिनके बीच संघर्ष चल रहा है । अपना स्पेस बचाने का संघर्ष । दूसरे के स्पेस में अपना स्पेस बनाने का संघर्ष । दूसरे स्पेस के अतिक्रमण से अपने स्पेस को सुरक्षित रखने का संघर्ष । यह संघर्ष अपने क़िस्सों को उनके क़िस्सों से बचाने का भी है। अपने जंगल को बचाने का है । कोई बच नहीं रहा है । कोई बचा नहीं पा रहा है । वेंकट रमन सिंह श्याम इस भ्रम में नहीं हैं । मध्यप्रदेश के जंगलों से निकलकर बार्सीलोना पेरिस तक की यात्रा में उनके भीतर संयोग से काफी कुछ बचा हुआ है ।

इस किताब में शब्द घड़ी की दिशा में घूमते हैं और उनके मायने उल्टी दिशा में । आधुनिकता परंपरा की तरह है और परंपरा पहले से आधुनिक होने का दावा करती है । कभी यह काम शब्द करते हैं, कभी तस्वीर, कभी गीत तो कभी रंग । तस्वीरों में झुग्गियाँ, औरतें, अंबेडकर, साइकिल, हवाई जहाज़ सब उस आदिम युग के हैं जहाँ कल्पनाएँ पहाड़ों को नहीं तोड़ती है बल्कि चट्टानों से टकरा कर चमकने लगती हैं । शब्दों में विली जीप, आई फोन, फ़िल्म के पोस्टर, बाँध, रेल, हवाई जहाज़ मिथक की तरह हैं जो पहाड़ों को तोड़ने आते हैं । ये सब वेंकट को रोमांचित करते हैं । चमत्कृत करते हैं । वेंकट ऊन का गोला है । एक सिरा बाबा देव के पास है और एक अनंत के पास । जितना ज़्यादा गोला खुलता है उतना ही कोई लपेट लेता है ।

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हमने चमत्कृत होना बंद कर दिया है । हम आज की आधुनिकता से बोर हो चुके हैं । पहले जेब में फोन आया अब फोन में कई जेबें हैं । इतिहास बनने के लिए जरूरी है कि समय से मौत हो । चाचा जनगढ़ की जापान में समय से पहले मौत न हुई होती तो कला से दूर जा चुके वेंकट होर्डिंग की सीढ़ी से नीचे नहीं उतरते । इतिहास नहीं बनाते । गोंड कलाकार बनने की सीढ़ी जो चाचा से पहले लिंगो ने लगाई थी उस पर चढ़ने के लिए । उस दुनिया में फिर से लौटते हैं जहाँ संस्कृति विभाग की कई संस्थाएँ आदिवासियों को दस्तकार बनाकर टहलाती रहती हैं । जिनके बारे में समाजशास्त्रियों और नृशास्त्रियों ने अनेक किताबें लिखी हैं । आदिवासी सरकारी भी है और प्राइवेट भी ।

कलाकार बाग़ी न हो तो उसकी कला बासी लगती है । वेंकट कला के बाग़ी हैं । लाखों वर्ष पुराने गोंडवाना भूमि का लाडला भूमिजन प्राथमिक विद्यालय, सिंझोरा से पढ़ाई की यात्रा शुरू करते हैं और दसवीं पर ख़त्म कर देते हैं । दिल्ली आकर रिक्शा चलाते हैं, पुताई करते हैं और भूखे सोते हैं । ट्रक में हेल्पर का काम करते हैं । दर्ज़ी का काम करते हैं । वेंकट आज भी एक दिन भूखे रहते हैं । वे अपनी भूख बचाकर रखना चाहते हैं । वैसे ही जैसे लाखों साल पहले बाबा देव ने सफेद कौए से कहा था कि जाओ धरती ढूँढ लाओ । वेंकट धरती खोज रहे हैं ।

बाबा देव ने ही नागा बैगा और नागा बैगिन को जन्म दिया । प्रथम आदम । बैगिन को बाबा देव के सामने जाने से शर्म आई तो गोदना से ढंक लिया । वो दुनिया की प्रथम कलाकार बनी । शहर आकर वेकेंट जब पेड़ के नीचे कई तरह की दुकाने देखते हैं तो याद आता है कि बाबा देव भी तो पेड़ ही हैं । हमारा बाना भी तो किसी पेड़ का बना है । गोंड के सात भाइयों में सबसे छोटे को बाबा देव ने कहा था घूमो फिरो । वंशावली गाओ । वेंकट की यह किताब वंशावली गान है ।

हम सबके पास आदिवासी समाज के क़िस्सों को बयां करने के लिए एक ही शब्द है । मिथक । वेंकट मिथक में खुद को देखते हैं । अपने अतीत को देखते हैं और आज को भी । उनके चाचा उस लिंगो की तरह हैं जो तीरों को जोड़ सीढ़ी बना लेने के फन में माहिर हैं । कला की दुनिया में पहली सीढ़ी बनने का काम तो जनगढ़ ने ही किया था । लिंगो की बनाई सीढ़ी पर चढ़े बिना ऊँचाई पर पहुँचा जा सकता है । बार्सीलोना के मॉल में जब वेंकट एक्सलेटर देखते हैं तो लिंगो की सीढ़ी याद आती है । लिखते हैं कि तो धरती पर सबकुछ ऐसे ही चल रहा है । कहाँ से शुरू हो रहा है और कहाँ ख़त्म हो रहा है, बिना जाने आप ऊँचाई पर पहुँच जाते हैं ।

महादेव और गौरा ने गोंड भाइयों को गिलहरी का पीछा करने के लिए कहा । गिलहरी उन्हें अपने पीछे गुफ़ा में ले जाती है जिसे एक चट्टान से बंद कर दिया जाता है । लिंगो इसी गुफ़ा से गोंड को आज़ाद कराने आता है । जनगढ़ सिंह श्याम इस दुनिया में गोंड कलाकारों की पहली सीढ़ी थे । जिन चीज़ों को हम अत्याधुनिक समझते हैं वेंकट को उससे मिलती जुलती चीजें अपनी परंपराओं के किस्से में मिल जाती हैं । वही पुरानी सीढ़ी आज भी है जिस पर सब चल रहे हैं ।

आदिवासी समाज के क़िस्सों को गुफ़ाओं में बंद कर दिया गया है । वेंकट अपनी आत्मकथा के ज़रिये उन क़िस्सों को आज़ाद करते हैं । आधुनिक बाँधों, पुलों के खंभों के नीचे आदिवासी मज़दूर दबा दिये जाते हैं । नरबलि दी जाती है । चमत्कृत वेंकट नरबलि की प्रथा को वेदों में खोजते हैं । महाभारत में खोजते हैं । यज्ञ की वेदी में कैसे जानवरों को झोंक दिया जाता है । जंगल जला दिये जाते हैं ।

वेंकट नरबलि की कथा को पुराणों में नहीं खोजते बल्कि वे विज्ञान की एक पत्रिका करंट साइंस ( 2014) में खोज लेते हैं जो कहती है कि निर्माण स्थलों पर जो लोग मारे जाते हैं उन्हें कई बार नरबलि के समकक्ष शुभ माना जाता है । वेंकट और आनंद ने ज़रूर इस प्रसंग को खोजा होगा । बचपन के एक किस्से के बहाने । उस रोज़ पिता ने वेंकट को खूब मारा । वेंकट घर से भाग गए । पिता ने खूब खोजा । घर लौट कर आए तो पिता ने अपना यह डर बताया था कि गाँव के कई गोंड लड़के ऐसे ही लापता हो गए ।

आधुनिकता से चमत्कृत होने के फन में माहिर वेंकट उसकी क्रूरता को अपनी परंपरा से देख लेते हैं । अर्जुन और कृष्णा बाहरी की तरह जंगल कथा में प्रवेश करते हैं और अग्नि को छोड़ देते हैं जिससे जंगल तबाह हो जाए । वृतांत यानी नैरेटिव की टकराहट से ये किताब आपको अलग तरीके का पाठक बनाती है । पाठक होने के अनुभव को समृद्ध करती है ।
कई पहिये चलते हैं इस किताब में । वेंकट पहिये पर सवार दिल्ली आते हैं । रिक्शा चलाते हैं । रिक्शा धरती को ठेलती है । धरती रिक्शे को ठेलती है । एक पहिया जंगल से निकला है और एक पहिया शहरों से जंगलों की तरफ निकला है । वेंकट आज की दुनिया को अपने मिथकों के संसार से भाँप लेते हैं । मैंने बहुत किताबें तो नहीं पढ़ी हैं मगर ऐसी किताब नहीं देखी ।

वेंकट कहते हैं कि हम पर नई तरह की नैतिकता थोपी जा रही है । हमारी दुनिया में भाई भाई के बीच पत्नी ज़मीन को लेकर संघर्ष नहीं है । जीवनसाथी बदलना आम बात है और इसका चुनाव सामूहिक उत्सव के बीच व्यक्तिगत मामला है । हमें उन जैसे बनाया जा रहा है । उनके किस्से हम पर थोपे जा रहे हैं । हमसे सारा लेकर मुझे जैसों को अपनी दुनिया की तरह बना दिया है । राजनीति और लोकतंत्र में अग्नि की भूख है जो जंगल को जला रही है ।

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वेंकट आत्मकथा लिख रहे हैं और उनके साथ आनंद उनकी जीवन गाथा । दो लेखक हैं । दोनों एक दूसरे को लिख रहे हैं । बदल रहे हैं । मेरे लिए इस किताब का चरम है एकलव्य का प्रसंग । एकलव्य का कई बार पुनर्जन्म होता है। जनगढ़ सिंह श्याम के रूप में । बिरसा मुंडा, हिंडिंबा, लिंगो के रूप में । जनगढ़ अपने गुरु स्वामिनाथन से सीखते हैं । माँगते नहीं । जापान जाते हैं । मामूली पैसे पर काम करते हैं । म्यूज़ियम के लोग शोषण करते हैं और मर जाते हैं ।

ग़ज़ब की व्याख्या है एकलव्य की । पहिये की तरह बग़ैर पूर्णविराम के । एकलव्य आज भी है । जो नक्सल है । जिसके हाथ में आई डी है । एल एम जी बंदूक है । एकलव्य आज भी छला जा रहा है । नक्सल भी छल रहे हैं । खुद राज्य होते जा रहे हैं । ईसाई हिन्दू सब आ रहे हैं एक व्य को छलने । अँगूठा का ज़िक्र नहीं है ।

वेकेंट कहते हैं उनकी दुनिया मलबों की कई परतों के नीचे दबी है । बेहतरीन कलाकारी है यह किताब । कबीर की तरह निराकार है । गोंड भी कबीर की तरह है । पिकासो की कला गोंड कला जैसी है तो लियोनार्दो द विंची गोंड मिथकों का हिस्सा । Finding My Way,  Navyana और जगरनॉट ने छापा है । तस्वीरों का अलग से पाठ किया जाना चाहिए । 1499 रुपये की इस चौकोर किताब के पन्नों पर नंबर नहीं है । गोल धरती के कई बिंदु बिखरे हैं । अंत और शुरूआत की तरह । आप चाहें तो इन सबको जोड़ कर कुछ नया किस्सा बना सकते हैं । मुझे समीझा नहीं आती । किताब पढ़ते वक्त जैसा दिखता है वैसे लिख देता हूँ । वेंकट ने जीया है और उसके लिखे को पढ़कर जीते हैं ।उन्हें पता है ये कहानी अब बिकने जा रही है ।

Reproduced with permission from Ravish Kumar. Original post can be viewed here

 

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