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बेशक घटना होनी और अनहोनी के बीच बहस में टंगी थी, मगर दिलचस्प ज़रूर थी. भला किसी की मौत भी दिलचस्प हो सकती है?

किसी की मौत कुछेक के लिए अच्छी हो सकती है और कुछेक के लिए बुरी. मगर यहां तो होनी और अनहोनी मानने वाले दोनों जानिब मातम था. बस फर्क ये था कि इस मौत से कहीं अगर उम्मीदें जगी थीं, तो कहीं मातम और नाउम्मीदी भी थी. इस मौत ने दो जवानियों को सपने दिखाए थे, तो दो वृद्धाओं के बचे-खुचे भविष्य के प्रति सिहरन पैदा कर दी थी. एक तरफ अर्धशिक्षित रमेश और अनपढ़ सुरेश थे तो दूसरी तरफ कम पढ़ा, मगर कढ़ा धनेश था. रमेश की तरफ छह जनों का खर्चा था, हमेशा अल्लाह-तौबा मची रहती थी. ठीक-ठाक पहनना-ओढ़ना तो दूर, भरपेट खाने तक के लाले थे. क्योंकि छोटी-सी काश्तकारी बमुश्किल दो एकड़ की और छह जनों का खर्चा. गांव में पूंजी रहित उद्यमों से लेकर, छोटी-मोटी चोरियां और हेराफेरियां तक जसोदा के लड़कों सुरेश और राकेश ने बरसोंबरस कीं, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात.

वैसे छह जन तो धनेश की तरफ भी थे, मगर वहां के वर्तमान में न तो दुख होता था और न ही भविष्य की चिंता. धनेश के बच्चे अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में बसों से स्कूल जाया करते थे, उन्हें मोटे अनाज के बजाए फास्ट फूड का नाश्ता मिलता था. धनेश की मोटरसाइकिल का मॉडल हर साल बदल जाया करता था. धनेश की मां इंदिरा की दिनचर्या पान-सुपारी के सेवन से शुरू होकर उसी पर समाप्त हो जाया करती थी. इंदिरा उस घर की धुरी थीं. सुंदर, सुशील, आज्ञाकरी बहू गुड्डी हर हुक्म पर हाज़िर रहती थी. वो इंदिरा से डरती भी थी, क्योंकि उसका पति निठल्ला और बेरोज़गार था. इंदिरा की बदौलत ही गुड्डी के बच्चे स्कूल जाते थे, और गांव में ब्याही जाने के बावजूद उसे शहरी जीवन की तमाम सहूलियतें-नियामतें हासिल थीं. जंगल महकमे की ऊपरी कमाई इस घर में जब आती थी, तो उस पर इंदिरा का ही हक़ होता था. इंदिरा खुश तो घर खुश, हर कोई खुश. लेकिन इंदिरा की नाखुशी किसी भी के लिए परेशानी का सबब बन सकती थी.

इंदिरा इस वक्त उम्र के सातवें दशक में थीं. पैंसठ-छियासठ की तो होंगी ही. मगर ये आधिपत्य पिछले तीन दशकों से उन्हीं के पास था. बात तब की है, जब महज पैंतालीस रुपए तनख्वाह की नौकरी पाया हुआ वाचर पारस, अपनी पहली तनख्वाह के लड्डू, रिश्ते में काकी लगने वाली और उसी मकान के दूसरे हिस्से में रहने वाली इंदिरा को खिलाने और उनका आशीष लेने गया था. सामाजिक रूप से तो उस नौकरी का कोई खास महत्व न था. मगर पारस ने, जिसे ‘परसा’ पुकारा जाता था, उस विशुद्ध शुक्ला ब्राह्मण परिवार के लिए एक उपलब्धि हासिल की थी. तभी इंदिरा ने पहली बार उसे पारस बाबू के खिताब से नवाजा था, जो स्थायी साबित हुआ था. तब इंदिरा, इंदिरा न थीं, बुधराजी थीं. वो ढीले-ढाले ठिगने से बमुश्किल पैंतालीस किलो वज़न वाले रघुवर की लहीम-सहीम और सुंदर पत्नी थीं. गांव में बुधराजी के रूप-लावण्य के चर्चे तो थे, मगर उनके मुकाबले रघुबर के ढीले-ढाले व्यक्तित्व के कम चर्चे न थे.

तब तक बुधराजी की गोद में धनेश आ चुका था, जिसकी शक्लोसूरत और पारस के बड़े भाई हरिहर में काफी मेल था. उनकी मिलती शक्लों को लेकर गांव में तमाम कयास थे, क्योंकि उस गांव में ऐसे मेल की कमी न थी. ऐसी अफवाहों को लोग सुनते-सुनाते तो थे, परंतु कुछ खास महत्व न देते थे. फिर सांप काटने से हुई हरिहर की असामयिक मृत्यु ने इन चर्चाओं को अतीत की बात बना दी थी. रघुवर पर भले ही बुधराजी को लेकर छींटाकशी और तानों की बौछारें पड़ती रहती थीं, मगर विशुद्ध ब्राह्मणों के उस गांव में बहिष्कार जैसी कोई बात न थी. रघुवर इस बात पर ईश्वर को धन्यवाद देते हुए नज़रअंदाज़ कर दिया करते थे कि सामाजिक रूप से बुधराजी उन्हीं की पत्नी थी. उनके मुत्ताल्लिक लोगों को उनकी किस्मत से रश्क था और उन्हें खुद पर गुमान. मगर नौकरी की मिठाई ने ऐसा पासा पलटा कि बुधराजी ने पारस को परसा से परसराम बना डाला.

परसराम की मौत के भी तमाम निहितार्थ थे, क्योंकि उनकी ज़िंदगी भी तमाम पड़ाव देख चुकी थी. बात तब की है, जब गांव के ठलुओं ने रघुवर को उकसाया और उसने आरक्षित महिला सीट पर बुधराजी को प्रधानी का चुनाव लड़वाया था. बुधराजी सदैव शालीनता से सत्ता की तलबगार थीं. इसीलिए उन्होंने घर की दहलीज़ नहीं लांघी. बुधराजी ने उस चुनाव में प्रधान का पद तो गंवा दिया था, मगर अपनी तेज़ी और प्रभावशालिता के बूते पर इंदिरा नाम का खिताब उन्हें हासिल हो गया था. इंदिरा की शह पर पारस ने अपनी पत्नी और तीन बच्चों को छोड़ने में देर न लगाई थी. परंपराओं के मकड़जाल में उलझी जसोदा ने खपरैल के मकान और दो एकड़ की काश्त को ही नियति मानकर जीवन शुरू कर दिया था. गांव में अपने सत-सतीत्व, कर्ज़ा-उधारी, चोरी-चकारी से उसने अपने बच्चों का पेट पाला. जब जसोदा की गोद का दूधमुंहा बच्चा दवा-खुराक की कमी से मर गया था, उस वक्त इंदिरा की गोद पुनः हरी होने के आसार थे. जसोदा के मरी हुई औलाद की हाय और आह की तासीर शायद इंदिरा के गर्भस्थ शिशु को जा लगी थी. तकदीर की मार किश्तों-किश्तों में पड़ा ही करती है, सो जसोदा की गोद उजड़ी, तो इंदिरा भी गर्भ से महरूम हो गईं. शिशु गर्भ में ही मर गया. प्रसव पीड़ा झेलने के बाद इंदिरा के प्राण बचे तो इस शाप के साथ कि मातृत्व से स्थायी तौर पर वंचित हो गईं.

यह अंश  दिलीप कुमार की लिखी किताब  गोदना से लिया गया है.

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