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कहा जाता है कि भाषा कोई भी हो, उसका आभामंडल उसकी परिधि में आने वालों को प्रभावित करता  है और सभी भाषा के लोग अपनी अपनी ज़रूरतों के अनुसार समय समय पर दूसरी भाषाओं और साहित्य से जुड़ते भी हैं.यह किसी भी समाज और वर्ग विशेष के विकास के लिए ज़रूरी भी होता है. जहाँ ज़बान संवाद का एक माध्यम होती है वहीं किसी भी देश के विकास में एक अहम किरदार भी निभाती है.
ब्रिटेन के राजनीतिज्ञ, कवि, इतिहासकार लॉर्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले ने अंग्रेजी भाषा को न्यायसंगत ठहराते हुए कहा था कि इसका मकसद भारतीयों की ऐसी पीढ़ी तैयार करना है जो कि खून और रंग से भारतीय हों, लेकिन पसंद, आचार-विचार, बुद्धिमत्ता और राय से अंग्रेज हो.और अंग्रेज़ होने और बनने के इस दबाव में राष्ट्र भाषा हिंदी को दरकिनार किया जाना इस बात का सबूत है.
अगर हम कहें कि भाषाओं के मेल में  हिंदी कहीं न कहीं पिछड़ रही है.पीछे छुट गयी है तो गलत नहीं होगा. खैर,हिंदी राष्ट्र भाषा है यह हम सभी सुनते आए हैं और इस बात को जानते भी हैं, पर क्या हिंदी को एक राष्ट्र ज़बान का दर्जा फाइलों से इतर भी दिया जाता है? यह एक कटु सत्य है कि जहाँ अंग्रेजी आज डिसीजन मेकिंग की ,बाज़ार की भाषा है वहीं हिंदी को वोट की भाषा से इतर नहीं देखा जाता है.
हम यह बात स्पष्ट रूप से जानते हैं कि भारत जैसे बहुजातीय और बहुभाषी देश में  हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा दोनों भाषाएं हमारे जीवन में समान रूप से शामिल हैं,अंग्रेज़ी जहाँ हमारे लिए शिक्षा और कारोबार पाने में मददगार है वहीं हिंदी राष्ट्र भाषा होने के साथ हम लोगों के जीवन में रची बसी हुई जबान भी है.दोनों के अपनी अपनी अहमियत है, पर ऐसा क्यों है कि दोनों के बीच में एक बड़ा अंतर और खाई पाट दी गई है?  एक सच यह भी है कि वास्तव में हिंदी भाषा और उसके लेखकों को उतना नाम और दाम नहीं मिलता है जितना अंग्रेज़ी भाषा को मिलता है
क्या वजह है कि अंग्रेज़ी और हिंदी में लिखने वाले लेखक-पाठक बटे हुए हैं?
यही वजह है कि हिंदी पत्रकारिता और लेखन को बाज़ार में वो स्थान नहीं दिया जाता है जिसकी वह सही में हक़दार है.क्यों हिंदी में लिखने वाले से अंग्रेज़ी में बोलने,लिखने का दबाव ज़्यादा होता है अंग्रेज़ी के मुकाबले ? क्या दोनों भाषाओं के लेखकों को एक जैसा मार्केटिंग रेस्पोंसे मिल पाता है? आखिर दोनों ज़बानों में एक बड़ा फ़ासला क्यों है और क्यों एक बड़ी लकीर है जो ज़बान में फर्क़ पैदा करती है? इन्हीं सब बातों  पर हम आने वाली 15  तारीख को एक वर्कशॉप कर रहें हैं,जिसमें हम लोग अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद, लेखन की  गुणवत्ता, हिंदी में नव लेखकों को मिलने वाले अवसरों और हिंदी अंग्रेज़ी भाषाओं में पैदा हुए एक फर्क पर बात करेंगे.
शुभम अरोड़ा  जोकि जगरनॉट हिंदी लेखन मंच के एक नियमित लेखक हैं, शुभम ‘हॉरर कहानी कथा’ के विजेता भी रह चुके हैं,( उनकी हिंदी में कई कहानियां भी हैं,अंग्रेजी में उनकी एक किताब One Last Time भी प्रकाशित आ चुकी है ) इस वर्कशॉप को लेखक-वक्ता होंगे.
आप भी इस वर्कशॉप में शामिल होकर अपनी राय, अनुभव साझा कर सकते हैं.

नीचे वर्कशॉप का फॉर्म और इवेंट का लिंक दिया जा रहा है,वर्कशॉप में शामिल होने के लिए आप फॉर्म को भरकर रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं:

फॉर्म: https://goo.gl/kMJgJM

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