By

“ऐतिहासिक कहानी” कथा ( प्रतियोगिता ) के अंतर्गत हमें अनेक रचनाएं प्राप्त हुई, जिसमें सौरभ एस दौलत की सुतानुका कहानी को सबसे बेहतर कहानी के तौर पर चयन किया गया है. सौरभ को जगरनॉट बुक्स की ओर से विजेता बनने पर बधाई एवं शुभकामनाएं.
सौरभ एक इंजिनियर हैं और नॉएडा स्थित एक कंपनी में कार्यरत हैं ,साहित्य उनके जीवन का एक अभिन्न्न भाग हैं . साहित्य के अलावा वो  विज्ञान, इतिहास और दर्शन में रूचि रखते हैं, वो एक ब्लॉगर भी हैं.
आपकी कहानी सुतानुका ऐतिहासिक कथा प्रतियोगिता की विजेता घोषित की गई है, कहानी के बारे में थोड़ा बताएं.
ये कहानी तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के समय के अनुसार लिखी गयी है । मुख्य पात्रों के नाम और जगह इतिहास से प्रेरित हैं । ये कहानी एक स्त्री के प्रेम और जीवन संघर्ष को दर्शाती है । ये कहानी उस काल के स्त्रियों की दशा पर भी प्रकाश डालती है । मुख्य पात्र सुतानुका जोकि एक देवदासी और नृत्यांगना है प्रेम के लिए सर्वस्व त्याग देती है , रिश्तों  में स्वार्थ और आवश्यकता उसे अपने मित्रों से दूर कर देती हैं. परिस्थितियों की दास सुतानुका एक स्थान से दूसरे स्थान भटकती रहती है जब तक उसे अपनी मंज़िल नहीं मिल जाती . रास्ता लम्बा हो तो लक्ष्य भी कई बार बदल जाता है , समय के साथ इच्छाएं और उपलब्धि भी बदल जाते हैं , ये कहानी इन्ही जीवन संभावनाओं को दर्शाती है .
ऐतिहासिक कहानी लिखने के लिए सबसे अहम चीज़ क्या होती है?
सबसे अहम् बात उस काल का चित्रण करना कुछ इस तरह की पाठक ख़ुद को उस काल में महसूस कर सके। पात्रों के नाम , स्थल और भेषभूषा उसी काल के अनुसार होनी चाहिए. अगर पाठक ख़ुद को उस काल में महसूस कर सके तो लेखक की लेखनी सराहनीय है .
दूसरी बात , ऐसी बातों को न लिखा जाएजो की उस काल में संभव न हो, नहीं तो कहानी हल्की हो जाती है । हज़ारों साल पुरानी कहानी को गढ़ना आज के आधुनिक समय में मुश्किल हो जाता है , ये तभी संभव होता है जब उस काल के इतिहास की भी अच्छी जानकारी हो. और उसके लिए काफी पढ़ने और खोज बीन की आवश्यकता होती है , ऐसी कहानियां कई बार ज़रूरत  से ज़्यादा समय भी ले सकती हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है की ऐतिहासिक कहानियां वर्तमान कहानियों के तुलना में ज्यादा छानबीन और समय मांगती हैं .
तीसरी बात, कहानी मनोरंजक होने के साथ साथ ज्ञान वर्धक भी होनी चाहिए , जैसे की उस काल का रहन सहन , भाषा , राजनीति और सामाजिक बातों का उल्लेख जहाँ तक संभव हो सके यथार्थ लिखने की कोशिश करनी चाहिए। अगर ऐतिहासिक कहानियां कोरी कल्पना लगे तो कहानी अपना रस खो देती है, इसलिए काल्पनिक होते हुए भी ऐतिहासिक कहानियां सच्ची लगनी चाहिए , इसी में लेखनी की जीत है .
जगरनॉट के लेखन मंच पर कहानी लिखने का अनुभव कैसा रहा ?
साहित्य में मेरी रूचि होने के कारण मुझे ऐसे मंच हमेशा आकर्षित करते रहे हैं. जगरनॉट की ऐसी पहल सराहनीय है . ऐसे लोग जो किताबों से समय की वजह से दूर रहते थे ,आज वेबसाइट और एप्प होने से बड़ी आसानी से कहानियों को पढ़ रहे हैं, मै भी अब ऑफिस के बाद साहित्य पर इस मंच की वजह से ज़्यादा समय दे पा रहा हूँ . मुझे लगता है जगरनॉट को ऐसे नए प्रयास  करते रहना चाहिए जिससे की ये मंच सभी पाठकों तक पहुंच सके. ऐसे मंच की वजह से सुसुप्त लेखक और पाठक भी अपना समय साहित्य को दे पाते हैं. इस मंच की वजह से अब मै कई कहानियों और लेखकों से जुड़ सकता हूँ , जो की इस दौड़ती भागती ज़िन्दगी में बड़ी बात है. अगर कहानियां अच्छी लगे या न लगे उसका फीडबैक भी लेखक को इस मंच के द्वारा दिया जा सकता है. इस मंच की सबसे अच्छी बात पाठकों का उपलब्ध होना है जो की व्यक्तिगत ब्लॉग पे इतनी आसानी से नहीं मिलते.
एक लेखक के तौर पर क्या आप कोई विशेष नियम फॉलो करते हैं?
कोई नियम तो नहीं है , पर हर लेखक की एक शैली होती है जो की उसके सोचने के ढंग और ज्ञान के मिश्रण से पैदा होता है. उसी को हम नियम कह सकते हैं. व्यक्तिगत रूप से मै कहानियों को धाराप्रवाह लिखने में विश्वास करता हूँ . कुछ दिन का गैप होने पर कहानियों के अर्थ और मायने बदल सकते हैं. परन्तु कुछ कहानियों में समय के साथ अर्थ का बदल जाना अच्छा होता है . लिखने की कला बहुत ज़्यादा आत्मबोधात्मक होती है , नियम बनाने से कहानी का वस्तुनिष्ट होने का भी खतरा बढ़ जाता है , जो नीरसता पैदा कर सकती है . कहानियों में पात्रों को गढ़ने में कभी कभी ज्यादा समय लग जाता है क्योकि उनके चरित्र से ही कहानियों का मोड़ , चरमोत्कर्ष और अंत का निर्धारण होता है . इसलिए किसी पात्र के चरित्र पर मेरा विशेष ध्यान रहता है .
हिंदी में लिखने वाले नए रचनाकारों की क्या विशेषता है जो आपको सबसे अधिक प्रभावित करती है?
ऐसी भाषा जो आर्थिकी पैदा करती है वो दूसरी भाषाओँ से मज़बूत हो जाती है, और समय के साथ उसका वर्चस्व बढ़ जाता है. भारत में ज़्यादातर उच्च शिक्षा भारतीय भाषाओं में नहीं होती, जिससे भारतीय भाषाओं  में साहित्य कम होता जा रहा है , अब इस प्रवाह को रोका नहीं जा सकता.
सबसे अच्छी बात नए रचनाकारों में ये है कि हिंदी साहित्य में रोज़ मर्रा की बोलचाल वाली भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जिससे पाठक पढ़ते समय सहज महसूस करता है, और इससे समय के साथ भाषा का विकास भी होता है . जैसे इंग्लिश शब्दों का प्रयोग हिंदी साहित्य में आजकल अपरिहार्य हो गया है . हिंदी तो अब कई भाषाओं से ओत प्रोत होती जा रही है जो की अच्छा है . नए रचना कार भाषाओं के मिश्रण का प्रयोग बखूबी कर रहे हैं , दसवीं शताब्दी में जन्मी हिंदी अब वो हिंदी नहीं रही , इसमें उर्दू , स्थानीय भाषा और इंग्लिश का प्रभाव देखा जा सकता है , समय के साथ चीज़ों का बदलना अच्छा होता है . globlization होने की वजह से आधुनिक रचनाकार दूसरे देश और संस्कृति को भी अपनी रचनाओं में सम्मिलित कर रहे हैं , जो की आज चालीस से पचास  साल पहले साहित्य में देखने को कम मिलता था, आज बहुत सारी कहानियां और उपन्यास ऐसे विषय को समेटे हुए हैं. संस्कृति , धर्म और जाति के मिश्रण से भी बहुत सारे नए किस्म के साहित्य जन्म ले रहे हैं , जो की सराहनीय है .
अपने पाठकों के लिए कोई सन्देश जो आप देना चाहेंगे?
पाठक तो बहुत होशियार हैं और वह जानते हैं की उन्हें क्या पड़ना है और क्या नहीं. यूट्यूब  और स्मार्ट फोन की वजह से आज लोग पढ़ने में ज़्यादासमय नहीं लगाना चाहते, क्योकि उन्हें जल्दी  मनोरंजन का साधन मिल जाता है . परन्तु साहित्य एक ऐसी विधा है जो जीवन के सूक्ष्म रहस्यों और मानव भावनाओ को बड़ी ही बारीकी से व्यक्त करता है जो की किसी और माध्यम में नहीं है . साहित्य को प्रोत्साहित करना और इससे जुड़े रहना हमें मानवता के और करीब ले जाती है . जब कोई व्यक्ति मूवी देखने जाता है तो वहां वो किसी और की कल्पना को देखता है , जबकि एक कहानी आत्मबोधात्मक होने के कारण पाठक को कल्पना की आज़ादी  देती है. कहानी चाहे जितनी ही बेहतरीन लिखी गयी हो उसमे पाठक के लिए अपने जीवन अनुभव के कारण कल्पनाओं के नए आयामों की गुंजाइश हमेशा रहती है.
पाठकों से एक विनम्र अनुरोध और है कि अपना फीडबैकअवश्य दें, इससे लेखक और पाठक का सम्बन्ध और गहरा हो जाता है. लेखक और पाठक एक दूसरे के पूरक हैं .
सौरभ एस दौलत की कहानी सुतानुका को पढ़ने के यहाँ क्लिक करें

 

 

Leave a Reply