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हमारे आज के लेखक शून्य की कहानियां लिखने की शुरुआत दिल्ली से हुई थी. पिछले 17 सालों से वह मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉिनक मीडिया के लिए  लेखन में कायर्रत हैं जिसमें  प्रमुख हैं-  टेलीविज़न फिक्शन, नान-फिक्शन और वृतिचत्र फिल्में . इसके अलावा एक स्वतंत्र फिल्म -मेकर के रूप में वह  कई कॉप्रॉर्ट-फिल्म विज्ञापन, वृतिचत्र और वन्य-जीव फिल्म्स के निर्माण भी संलग्न है, शून्य मुंबई में रहते हुए अपनी सभी ज़िम्मेदारियों को बख़ूबी अंजाम दे रहें हैं.

आपकी कहानी भंजन को संपादक की पसंद के रूप में चुना गया है कहानी के बारे में विस्तार से बताएं.

प्रेम-कहानी में प्रेम शायद सबसे ज़रूरी भाव होता है, लेकिन तब क्या होता है जब प्रेम ही ना हो? या ऐसा आभास हो कि प्रेम नहीं है. रेखा और संजीव की शादी के कई सालों बाद जीवन जैसे स्वयं-चलित अवस्था में था, जीवन को गतिमान, जीवंत बनाने के लिए ना कोई प्रयास हो रहा था, ना कोई वजह दिख रही थी. ऐसे खाली, बोरियत से भरे जीवन के लिए रेखा प्रेम के ना होने को ही ज़िम्मेदार मान रही थी, लेकिन प्रेम क्यों नहीं है, उसके और संजीव के बीच, यह वो नहीं पकड़ पा रही थी. और तब इस तरह की दार्शनिक उधेड़बुन में उसे अपने पुराने दोस्त सुमेश की याद आती है. कहने को कभी सुमेश उसका बॉय-फ़्रेंड था, लेकिन अब वो उसे पूरी तरह भूल चुकी थी. और आज जब वो याद आया है तो पता चलता है कि सुमेश इस दुनिया से जा चुका है. जाते हुए वो एक आख़िरी चिट्ठी रेखा के नाम छोड़ गया था. यह चिट्ठी रेखा को आभास कराती है कि प्रेम क्या हो सकता था, प्रेम क्या हो सकता है? अपने इर्द-गिर्द मौजूदा ख़ुशियों को नज़र-अन्दाज़ कर अगर हमेशा किसी और ख़ुशी के पीछे भागते रहोगे तो ख़ुशी कभी नहीं मिलेगी, सिर्फ़ भागना मिलेगा. यही रेखा ने किया था जब संजीव के लिए उसने सुमेश को छोड़ था, यही वो अब कर रही है जब संजीव उसका पति है. सुमेश की यह आख़िरी चिट्ठी रेखा को बताती है कि वो हमेशा कुछ तलाशती रहती थी. अक्सर जो हम चारों तरफ़ तलाशते हैं वो हमारे पास ही होता है; ख़ास करके ख़ुशी.

भंजन कहानी के माध्यम से यही कहने का प्रयास था कि प्रेम के होने के लिए उसे करना भी पड़ेगा, प्रेम को वस्तु ना समझ उसे एक भाव समझ अगर उसे महसूस करने की कोशिश होगी तो सम्भावना है कि शायद प्रेम भी हो ही जाए, ना कि उसे वस्तु समझ हासिल किया जाए. एक बार तो रेखा ऐसी ग़लती कर चुकी थी, लेकिन इस बार वो ऐसा नहीं करती.

भंजन शीर्षक रखने की क्या वजह थी?

रेखा की जब सुमेश से दोस्ती थी तो सुमेश ने ब्रेक-अप के लिए भंजन शब्द का इस्तेमाल किया था. भंग हो जाना, टूट जाना – रिश्ते का. यही रेखा ने किया था सुमेश के साथ, यही अब वो करने जा रही थी संजीव के साथ. बेफ़िक्री में हर तरफ़ ब्रेक-अप के बारे में सुनने में आता है, अब इसे रिश्ते के एक स्वाभाविक अंजाम की तरह भी माना जाने लगा है, कि अगर रेलेशन्शिप है तो ब्रेक-अप तो होगा ही. भंजन वैसे तो सिर्फ़ एक शब्द ही है, लेकिन सुमेश जिस तरह से इसका इस्तेमाल करता है, बिना कहे जैसे इसके मायने, इसके परिणाम दिखाता है, वैसे ही यह शब्द एक तरह से कहानी की धुरी बनता है – केंद्र-बिंदु . धुरी भी और अंत भी, एक ऐसा अंत जिसे इस बार रेखा होने से रोक देती है.

 एक लेखक बनने के पीछे क्या प्रेरणा रही?

प्रेरणा तो शायद बहुत बाद में आयी, पहले तो विवशता थी. हर कोई अपने को बताना चाहता है, अभिव्यक्त करना चाहता है. नाच-गा के, एंजिनीयर-डॉक्टर बन के, फ़ौजी या प्रधान-मंत्री बन के. वैसे ही मुझे लगा की लिखना ही मेरी अभिव्यक्ति को पहचान देगा, लिखना अच्छा लगा और पसंद आने लगा. लेकिन जब लिखने की कोशिश की तो समझ में आया की यह तो बेहद ही दुर्गम और जटिल काम है. तब प्रेरणा की आवश्यकता पड़ी. फिर जो लेखक पसंद आते थे, उनके काम से आत्म-विभोर हो लिखने की कोशिश होती थी. सबसे बड़ी प्रेरणा तो स्वयं को अभिव्यक्त करने की ही थी. क्योंकि बोलने से ज़्यादा लिखने अच्छा लगता था तो वो आदत सी बनती गयी और फिर जीवन का एक हिस्सा, और आजीविका भी.

आपकी अपनी लिखी कोई कहानी जो आपके दिल के क़रीब है?

एक कहानी थी जो शायद कॉलेज के समय में मैंने एक पत्रिका को भेजी थी, पत्रिका में तो वो कहानी छपी नहीं, लेकिन दिल के बेहद क़रीब थी. हैरानी की बात है की अब वो कहानी मुझे याद भी नहीं, लेकिन अवचेतन में कहीं यह बात दबी हुई है की वो कहानी अच्छी थी, मुझे सम्भाल के रखनी चाहिए थी. वो दिन कम्प्यूटर्ज़ के नहीं थे, सब कुछ काग़ज़ों में दर्ज होता था, काग़ज़ खो गए अपनी कहानी के साथ. छोटे बच्चे की कहानी थी जो एक मुश्किल काम को साध कर कुछ बड़ा अंजाम देना चाहता है, और अचानक से जैसे भाग्य उसका साथ देता है और वो काम हो भी जाता है, उसे समझ नहीं आता की अंजाम का श्रेय वो ख़ुद को दे या भाग्य को. बालक-मन जीत का सारा श्रेय ख़ुद हड़पना चाहता है, लेकिन यह भी जानता है कि संयोग या भाग्य ना होता तो यह काम होता भी नहीं. आख़िर में वो यह तसल्ली कर लेता है की चलो वो तो हुआ जो वो करना चाहता था. क्योंकि मेरी शुरुआती कहानियों में से थी, तो इसलिए वो आज तक पसंद है, और याद ना होने की वजह से एक मज़ाक़ भी बनता है कि मेरी सबसे पसंदीदा कहानी वो है जो मुझे याद ही नहीं.

हिंदी में नव रचनाकारों का भविष्य किस तरह से देखते हैं?

कुछ सालों पहले तो ऐसा लग रहा था कि भविष्य अंधेरे में है. नव रचनाकारों के सामने आने के माध्यम बेहद कम थे – थोड़ी सी पत्रिकाएँ और अख़बार. लेकिन फिर जो डिजिटल क्रान्ति आई उसके बाद से लगातार ऐसा लगा कि अब भविष्य उज्जवल है. पहले तो कई बार ऐसा ख़तरा होता था की क्या लिखित हिंदी ख़त्म ही हो जाएगी, लेकिन उसके बाद कम्प्यूटर, सोशल मीडिया और मोबाइल फ़ोन ने इस ख़तरे को जड़ से ही ख़त्म कर दिया. डिजिटल दुनिया में तो अब आप है, आपका लेखन है और उसे पढ़ने वाले. इस तरह के प्रजातंत्रीकरण के बाद अब भविष्य की फ़िक्र ख़त्म हो गई है. आगे बढ़ रहें लेखक और पढ़ने वाले  पाठक लगातार बढ़ रहें हैं और उनका उज्जवल भविष्य है.

जगरनॉट का प्लेटफार्म हिंदी लेखकों के लिए किस तरह लाभदायक है?

जगरनॉट प्लेटफार्म शाब्दिक रूप से क्षेत्रीय, आँचलिक लेखन के  उस जगरनॉट की ओर इशारा कर रहा है जो अब रुकने वाला नहीं. डिजिटल माध्यम का बेहतरीन उदाहरण.

जो मशहूर हैं सारे प्लेटफार्म उन तक ख़ुद ही पहुँच जाते हैं, लेकिन बाक़ियों के लिए जगरनॉट का लेखन मंच एक सम्पर्क, एक माध्यम का काम कर रहा है. नये लेखकों का सामने आना, अच्छे लेखन को पढ़ और अच्छा लिखने की प्रेरणा पाना, लिखने और पढ़ने वालों की एक कम्यूनिटी बनाना एक बेहद ही लाभदायक और क़ाबिले-तारीफ़ काम है.

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