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हमारे आज के लेखन मंच के लेखक पवन कुमार श्रीवास्तव, महुवा चैनल के धारावाहिक ‘भाग न बांचे कोई’ के लिए कथा,पटकथा लेखन, ज़ी टीवी के धारावाहिक अपनों के लिए गीता का धर्मयुद्ध’ के लिए संवाद लेखन,लाइफ ओके के धारावाहिक ‘सावधान इण्डिया के लिए कथा,पटकथा और संवाद लेखन,विभिन्न म्यूजिक एल्बमों के लिए गीत लेखन,विभिन्न दृश्य माध्यमों के लिए वृत्त-चित्र लेखन,विज्ञापन लेखन ,कथा,पटकथा लेखन कर चुके हैं इसके अलावा वह कविता,कहानी भी लिखते  हैं।

आपकी कहानी नामर्द को संपादक की पसंद के तौर पर चुना गया है, कहानी के बारे में विस्तार से बताएं?

यह कहानी एक ऐसे आदमी की कहानी है जिसे नकारे जाने के डर ने इंसान से हैवान बना दिया है। कहानी संदेश देना चाहती है कि डर चाहे अकादमिक परीक्षा में असफ़ल हो जाने का हो,नौकरी न पाने का हो,रिश्ता खो देने का हो या कुछ और,यह आपको ग़लतियों के दलदल में धकेल देता है।इसलिए आप अपने फियर ऑफ रिजेक्शन पर क़ाबिज़ होकर ,उसका बहादुरी से सामना करें ।तभी आप अपने मसाईल का हल पा सकते हैं।

मैंने इस कहानी को कुछ नामचीन पत्रिकाओं में शाया करवाने का प्रयास किया था पर वे सम्पादक जो मेरी कहानियों का खुली बाहों से स्वागत किया करते थे,इस कहानी को अपने सफ़हों में उतारने का साहस न कर सकें।

यह कहानी चूंकि काफ़ी बोल्ड कथानक लिये हुए है इसलिए कई शुचितावादियों व नैतिकता आग्रही लोगों को इस पर घोर आपत्ति हो सकती है पर मेरे नज़रिये से चूंकि इस कहानी में दर्शायी गई घटना समाज़ का हीं हिस्सा है इसलिए यह एक ईमानदार और बेहिचक तज़किरा मांगती है।यह कहानी लिखकर मैंने यही करने का प्रयास किया है ,यह जानते हुए भी कि कुछ आदर्शवादी समालोचक जो किसी अच्छी कहानी के कहानीकार को सराहते हुए उनकी लेखनी के बाबत कहते हैं कि उसपर सरस्वती विराजमान है ,वे यह कहानी पढ़कर शायद कहेंगे कि मेरी लेखनी पर सनी लियोन विराजमान है। ख़ैर मैं उनसे विनम्रतापूर्वक यही कहूंगा कि अपने तन से निकलने वाला मल निसंदेह एक अतिघृणित पदार्थ है पर उसे साफ़ करने के लिये उसे छूना हीं पड़ता है । मैंने भी अपनी लेखनी से यही किया है।

कहानी नामर्द लिखने के पिछले क्या प्रेरणा रही ?

आपके सवाल में ज़रा सा तरतीम कर दूं तो मेरे लिए ज़वाब देना आसान हो जाएगा।आप पूछिये कि मैंने किस चीज़ से मुत्तासिर होकर यह कहानी लिखी।तो जवाब है कि जिस बेइंतहाइ से समाज में हत्या ,बलात्कार जैसी पाशविक घटनाएं हो रही हैं,मुझे लगा कि इनमें से कई घटनाओं की जड़ में ठीक वही कारण विद्यमान है जिसने मेरी कहानी के किरदार जुल्लु को अधम बना दिया।

इन्हीं कारणों से व्यथित होकर मैंने जुल्लु नाम का एक तसव्वुरी किरदार रचा और उसके कांधे पर इस कहानी की पोटली डाल दी।

थीम से हटकर कहानी के किरदार गड़ना कितना मुश्किल होता है?

लीक से हटकर किरदार गढ़ना काफ़ी चुनौती भरा होता है।पहली चुनौती तो यह है कि आप अपने विचारों का दुधर्ष मंथन कर,काफ़ी ज़ेहनी मशक्क़त के बाद ख़्यालों की अनदेखी ज़मीन से एक अयाना सा किरदार लाते हैं ।दूसरी चुनौती है अपने लेखन कौशल से उन अलहदा किरदारों को पाठकों द्वारा अंगीकृत करवाना ।आपको अगर अपने विचारों को रुपहला जामा पहनाना नहीं आता,आपकी तहरीर में अगर वाजिब तास्सुर नहीं तो पाठक आपको सिरे से ख़ारिज कर देंगे।

आपकी आने वाली कहानी /रचना कौन कौन सी हैं?

मैं बतौर लेखक दृश्य-माध्यम(विज़ुअल मीडिया) व मुद्रा-माध्यम(प्रिंट मीडिया) दोनों में काफ़ी सक्रिय हूँ। मैं क़रीबन हर रोज विभिन्न सोशल मीडिया,ब्लॉग ,अदबी मंच पर नई कहानियां,कविताएं,नज़्म वग़ैरह लिखता रहता हूँ।

फिल्मों में बतौर गीतकार मेरा एक गीत शाहिद कपूर की बहन साना कपूर अभिनीत फ़िल्म सरोज का रिश्ता में अपेक्षित है ।मेरी एक कहानी ‘मुआवज़ा’ पर एक फ़िल्म निर्माणाधीन है।

इसके अलावा जल्दी हीं मैं अपनी लिखी कई स्वनामधन्य लोगों की जीवनियां भी प्रकाशित करवाने जा रहा हूँ ।कुछ प्रकाशकों से इस बाबत बात चल रही है । इन जीवनियों में अदब के अमीर, अमीर ख़ुसरो,माहिरे-सुखन ग़ालिब, ख्यातिनाम फ़िल्मकार अकीरा कुरोसावा,दिलजोई गीतों के सौदागर साहिर लुधियानवी,आज के युवाओं की धड़कन सलमान,शाहरुख जैसी कई आलमताबी शख्सियत की कहानियां शामिल हैं।

जगरनॉट का लेखन मंच आपके लिए किस तरह लाभदायक रहा?

जगरनॉट एक सप्तवर्णी तितली सरीखा मंच है जहाँ अदब के सभी रंग देखने को मिलते हैं।इस प्रितिष्ठित मंच को इसके सुचारू व्यस्थापन,दक्ष विपणन और अच्छी कहानियों,आलेखों के प्रभावशाली चयन और कुशल प्रचार,प्रसार की वज़ह से पाठकों की ऐसी निष्ठा प्राप्त है कि यहाँ आकर रचनाएँ ठीक उसी तरह जी उठती हैं जैसे पानी का कोई नहीफ़ क़तरा समन्दर पाकर ।

हिंदी में आपके पसंदीदा लेखक/लेखिकाएं कौन हैं और क्यों?

हिंदी में मेरे पसंदीदा लेखक हैं प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु ।मैं इनकी लेखनी का इस कदर मुरीद हूँ कि अगर मैं इनके बारे में सताइशी लेख लिखूँ तो शायद ग्रन्थ भी उसे समाहित न कर सके।ये दोनों ज़मीनी लेखक हैं जिन्होंने दुःख के अथाह समन्दर में गोते लगाकर कहानियों के मोती चुने हैं ।यही वज़ह है कि इनकी लिखी कहानियों से ज़िन्दगी की सच्ची पर तल्ख झांकियां झांकने लगती हैं।आप इनकी रूह में पैवस्त होने वाली कहानियां पढ़कर ‘आह’ और ‘वाह’ दोनों कहने को मजबूर हो जाते हैं।

नए लेखकों के लिए क्या सुझाव देंगे?

मेरे लिए नए लेखक वरिष्ठ व स्थपित लेखकों जितना हीं महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे रिले-दौड़ के वे आखिरी धावक हैं जिनपर फिनिशिंग लाइन पर पहुंचने का दारोमदार है।नए लेखकों की सोच में तरुणाई होती है।वे नई सोच के झंडाबरदार,नए और उन्नत विचारों के ध्वजारोहक होते हैं।

पर कई बार कुछ नए लेखक साहित्य का सच्चा मर्म नहीं समझ पाते । लेखन एक साधना है और सामाजिक अभिष्ट को पूरा करने का साधन भी।साहित्य सिर्फ़ तफ़रीह और दिलबस्तगी का सामान नहीं होता ,समाज़ का हलाहल पीने वाला शिव भी होता है।

साहित्य सिर्फ सुंदर सुघड़ शब्दों का जमावड़ा नहीं है।शब्दों की मनाभिराम करतब बाज़ी मात्र साहित्य को मुकम्मल नहीं बनाती।दबे कुचले,अंतिम पांत में बैठे इंसानों के दर्द को समझने,उस दर्द से उबारने का माद्दा अगर साहित्य में नहीं तो समझ लीजिए यह साहित्य नहीं फ़क़त लफ़्फ़ाज़ी है।इसलिए मेरी नए लेखकों से दिली इल्तिजा है कि वे लिखें,दिल से लिखें पर कुछ ऐसा लिखें जिससे ठंडे चूल्हे को आग मिल जाए,बदबख्तों को न्याय मिल जाए,झूठ के अंधियाले गुफ़ा में दुबका सच उजागर हो जाए ।

पवन कुमार श्रीवास्तव की नामर्द पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

 

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