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यहाँ मूल्यांकन एक दैनिक प्रक्रिया है और बॉस (बच्चों और समाज) को खुश करना मुश्किल है | आप चाहकर भी इसे छोड़ नहीं सकते और यहाँ रिटायर होने की कोई उम्र नहीं है | तो इतनी सारी चीजें दांव पर लगी होने के बावजूद भी क्यों बहुत सारे लोग इस काम को जोश के साथ करते हैं ?

वर्ड्सवर्थ ने जब यह वाक्य रचा कि ‘बच्चे इंसान के पिता होते हैं। तो जरूर उसके ज़ेहन में कुछ रहा होगा | बच्चे अपने माता पिता के सच्चा आईना होते हैं और बहुत बार परवरिश का अनुभव भी | माता-पिता बनने के बाद हम टाइम , इच्छाओं और दायित्वों के जाल में फंस गए,हम खुद को अपने बच्चों द्वारा हमारे समक्ष रखी गई चुनौतियों के चक्रव्यूह में फँसा हुआ पाते हैं | पुराने ट्रायल और एरर का प्रयोग करते हुए हम भूलभुलैया की दीवारों में टकराते रहते हैं | केवल आश्चर्य करने के लिए कि’ हमने कहाँ गलत किया ? या हम ही क्यों ?

                                                              मैंने हाल ही में अपनी बेटी के प्री-स्कूल में ओरिएंटेशन में भाग लिया। यहाँ ( नोएडा ) में एडमिशन में सभी के बैकग्राउंड को देखा गया था ( परिवार की आय की जांच,डिग्री की जांच ),बच्चे की एबिलिटी  ( आइंस्टीन से आगे बढ़कर मेरा दो साल का बच्चा तोते की तरह नर्सरी राइम को रट सकता हो ,अच्छा लॉजिकल रीजनिंग करता हो  और उसने टीचर की दी गई केवल एक मिठाई ली ) और माता पिता की रणनीति ( मेरे द्वारा बोला गया झूठ कि मैं अपने बच्चे को स्क्रीन नहीं दिखाता   ) तो मैं यहाँ हूँ,दूसरी बार पिता बना एडमिशन के खेल में | मैंने यह सब अनुभव किया है | मैं प्रतिनिधित्व करता हूँ  परेशान माता पिता के उस बड़े समुद्र में एक अल्पसंख्यक की तरह जो उत्सुकता से ज्ञान के मोती को देखते हुए प्रिंसिपल द्वारा साझा किया गया है | मुझे प्रिंसिपल के भाषण में सबसे ज्यादा जो चीज अच्छी लगती है और जिसमें सभी पेरेंट्स एक दूसरे को कोहनियाँ मारते हैं वो है जो स्कू माता पिता के सामने रखते हैं | इन सवालों का  दायरा काफी व्यापक होता है। आप अपने बच्चे में क्या अच्छा देखना  चाहते हैं।

आपकी पैरेंटिंग का मन्त्र क्या है। इस एडमिशन के सर्कस का मज़ा लेते हुए मैं खुद के बारे में सोचता हूँ कि यदि हम इन सवालों पर भौतिकतावादी की बजाय आत्मपरीक्षण नज़र से देखें तो हम परवरिश को शानदार तरीके से सहज भाव से कर सकते हैं |

                                      जल्दी  रिजल्ट पाने के इस दौर में ऐसे सेल्फ एक्सपरिमेंट का एहसास एक यूटोपियन अवधारणा जैसा हो सकता है,मैं सोचता हूँ यदि हम इन दीवारों के खिलाफ बिना समर्पण किए हम इस भूलभुलैया से निकलने के लिए कुछ शानदार कर सके तो | मेरे लिए वह पल बहुत सुकून देने वाला होता है जब मैं अपने चार साल के बेटे की एक्टिविटी बुक में उसकी पहेली को हल करने में मदद करता हूँ | उसकी आदत है कि वह हमेशा भूलभुलैया से शुरुआत करता है और हर बार अंत तक पहुँचते पहुँचते निराश हताश होकर छोड़ देता है | तब मैंने उसे इसे सुलझाने का तरीका बताया कि आखिरी  लाइन से शुरू करो और अपनी उंगलियों को शुरू में पहली लाइन से खोजो | वह एक एक्टिव लड़का है इसलिए वह मेरी एडवाइस  लेता है | आखिरी लाइन पर पेंसिल खींचती उसकी मुस्कान मेरे लिए बेशकीमती है |

अगर यही चीज हम परवरिश की भूल भुलैया पर प्रयोग करें,किसी भी स्तर पर फिनिश लाइन एक खुशहाल बच्चा की तरह होगी,जो लोगों और परिस्थितियों के बीचअच्छी तरह से ढलने में सक्षम है | भूल भुलैया में दीवार और अंत में समाप्त होने वाली चुनौतियाँ माता-पिता के सामने आने वाली चुनौतियों और उनके द्वारा की जाने वाली गलतियों के समान हैं। मैं यहाँ कुछ गलतियां बता रहा हूँ जो आपके और मेरे जैसे मॉर्डन पिता करते हैं

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1. वनअप मैन शिप : माँ बाप द्वारा की जाने वाली यह पहली पारंपरिक गलती है | यह गर्भधारण के समय से ही शुरू हो जाता  है | जब पेरेंट्स स्त्री रोग विशेषज्ञ के यहाँ जाना शुरू कर दें और नार्मल डिलीवरी पर डींगें मारना शुरू कर दें,वहीं युवा अभिभावक अपने बच्चों के स्कूल दिखाकर उसके पाठ्यक्रम की प्रशंसा करते हैं | एक उम्र के बाद वही माता पिता अपने बच्चों की जॉब और उनकी पोजीशन को लेकर शेखी बघारते हैं | one up man- ship प्लेग की तरह होता है जो बच्चों को कम उम्र से ही कष्ट पहुँचाना शुरू कर देता है | वे भी अपने हम उम्रों से अपनी तुलना शुरू कर देते हैं जैसे उनके पास कितनी कार हैं वो कहाँ छुट्टियां मना रहे हैं | दरअसल one up man- ship बच्चों के स्वाभिमान,उनके स्व को दीमक की तरह चाटकर तनाव की स्थिति में ला देते हैं |

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