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NASERA SHARMA

यह उपन्यास लिखने के लिए मैं इसलिए बेचैन हो उठी कि तीन तलाक और दूसरे मसले हमारे यहां बहस का मुद्दा बने हुए थे. मैं मजहब, साइंस और इंसानी तरक्की के सवाल पर सोच रही थी. मैंने जब सुना कि बांझपन दूर करके साइंस ने बड़ा कदम उठाया है तब मेरे लिए यह सवाल पैदा हुआ कि मजहब इस नई खोज को किस तरह से लेता है और किस तरह से यह नई खोजों को आम इंसान को अपनाने के लिए और उसकी हदें तय करने के लिए रास्ते खोजता है. ये सब चीजें मेरे लिए बहुत हैरत की थीं, क्योंकि मैं इस पर सोच रही थी कि क्या इस्लाम इंसानी ज़िंदगी के लिए हर कदम पर एक थीसिस तैयार करता है और नए-नए उभरने वाले मुद्दों पर इतनी मेहनत करता है. मैंने देखा कि औलाद पाने के लिए दूसरे मर्दों के स्पर्म लेकर गर्भधारण की साइंस की खोज पर गौर करने का काम पहली बार 1980 में मिस्र में हुआ था.

जब मुझे ये मालूमात हासिल हुईं, तो मुझे लगा कि इसे लोगों तक पहुंचना चाहिए. हम इस तरह की नई खोजों और इसको लेकर मुस्लिम समुदाय के रवैए के बारे में नहीं जानते. खास कर औरतों की परेशानियों के बारे में. मैंने उपन्यास लिखने के लिए मरीजों और डॉक्टरों से बात की. उनसे इस सवाल के जो भी पहलू मेरे सामने आए, मैंने उन्हें उपन्यास में शामिल किया है. यह देखने की कोशिश की है कि कितनी दूर तक इस्लाम ने साइंस के इस करिश्मे पर चर्चा की है. क्योंकि ऐसे में कई तरह की उलझन होती है, मसलन औलाद के लिए जब आप बाहर से स्पर्म लेते हैं, तो बहुत मुमकिन है कि यह स्पर्म आपके सगे भाई का ही हो. ऐसे में यह शक हो सकता है कि आपकी नस्ल किस तरह खराबी की तरफ बढ़ेगी, किस तरह जायदाद के फितने पैदा होंगे. यह सब बड़ी हैरानी की बात है. ऐसे मुद्दों की गहराइयों में गए बिना, भारत में लोग में कह रहे हैं कि यूनिफॉर्म सिविल कोड बना दिया जाए. जब आपने इस पर गहराई से सोचा ही नहीं है, काम ही नहीं किया है, फिर आप कैसे एकसमान कोड बना सकते हैं? दूसरी तरफ जिस तरह से अलग अलग जगहों पर मुस्लिम समाज ने बारीक से बारीक इंसानी कमजोरियों को उठाया है, डिस्कस किया है, बताया है, उसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

पहले औरतें औलाद की खातिर किसी भी गैर मर्द से छुप कर रिश्ता बना लेती थीं. एक बहुत ही हंगामाखेज कहानी छपी थी: पराई कोख. उसमें एक पति अपने एक दोस्त से कहता है कि वो उसकी बीवी को प्रेग्नेंट कर दे, क्योंकि उसके यहां सिर्फ बेटियां ही बेटियां थीं. अब साइंस ने इस तरह छुप कर काम करने से बचा लिया है. फिर भी लोग इस पर बुरा मान जाते हैं, जबकि वे अगर संजीदगी से सोचें तो यह एक सही रास्ता है.

साइंस की इस खोज से औरतों को एक बड़ी खुशी मिली. यह बहुत बड़ी उपलब्धि है. जो लोग पूरा सोच-समझ कर इसे अपनाते हैं, उन्हें सुकून मिलता है. जिन्हें यह सही नहीं लगता, वे इसे नहीं अपनाते. जाहिर है कि यह सवाल समाज के भीतर एक तनाव, एक टकराहट को लेकर आता है – वो यह है कि आज का इंसान साइंस और धर्म, मजहब या उसूल या एक ऐसी परिपाटी जिसमें जिंदगी अच्छी तरह से गुजर जाए, उसमें कितना बेचारा बन जाता है. ग़ालिब का यह शेर भी है: ईमां मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे.

साइंस की खोजों ने ज़िंदगी में काफी आसानी लाई है. हम साइंस के वक्त में रह रहे हैं, आविष्कारों से प्रभावित हैं. हम पुराने ज्ञान की परवाह नहीं करते हैं. आज हमें कोई परेशानी नहीं है – जरूरत पड़ने पर लोग घुटने बदल लेते हैं, उसी तरह, बिना औलाद वाली औरतें और मर्द औलाद की खुशी पा रहे हैं. ऐसे मसलों पर हमें सनसनीखेज बहसों से हट कर बहुत संजीदगी से और गहरे उतरना पड़ेगा. मजहब के उसूलों के रूप में एक थीसिस हमको दी गई है, पहले ही चेतावनियां भी दी गई हैं. साथ ही, मजहब में भी यह रास्ता हमेशा होता है कि आप नतीजों और जिम्मेदारियों को समझते हुए अपनी अक्ल से काम ले सकते हैं और फैसले कर सकते हैं.

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नासिरा शर्मा की किताब दूसरी जन्नत  यहां उपलब्ध है: https://goo.gl/xlERYT

 

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