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पिछले कई सप्ताह से भारत अंतर्कलह से गुजर रहा है । 11 दिसम्बर को नरेंद्र मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून को मंजूरी दे दी । इस क़ानून के तहत भारत के तीन पड़ोसी देश- पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश- से आने वाले किसी भी प्रवासी नागरिक को भारतीय नागरिकता दी जाएगी बशर्ते कि वह मुसलमान ना हो । भारतीय धर्मनिरपेक्षता के लंबे इतिहास में धर्म को किसी क़ानून का आधार बनाया गया । कुछ समालोचकों ने इसे ‘भारत का पहला न्यूरेमबर्ग क़ानून’ बताया । ऐसा इसीलिए क्योंकि यह क़ानून पृथक नहीं है बल्कि इसके साथ कई शर्तें लागू होती हैं जिनकी वजह से भारतीय जनसंख्या के एक हिस्से की नागरिकता सवालों के घेरे में आ जाती है । ऐसा भारत के गृहमंत्री, अमित शाह के बयानों से ज़ाहिर होता है ।

हालांकि वह उन बयानों से किनारा कर चुके हैं । गृहमंत्री शाह, जिन्होंने प्रवासी मुसलमानों के लिए ‘दीमक’ शब्द का इस्तेमाल किया है, ने एक ऐसी सरकारी प्रक्रिया के बारे में बताया जिसमें पूरी जनसंख्या का सर्वेक्षण किया जाएगा । इस सर्वेक्षण के आधार पर ज़रूरी कागज़ात ना मिलने की स्थिति में उक्त जनसंख्या को ‘संदिग्ध’ वर्ग में डाल दिया जाएगा । भारतीय जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग मूलतः कृषि पर आश्रित है इनमें से कईयों के पास किसी किस्म का कोई कागज़ात नहीं है. अब इस सर्वेक्षण के बाद ही नागरिकता क़ानून हरकत में आता है ।

गैर-मुसलमानों को राहत दी जाएगी और भारतीय मुसलमानों के सामने बेदखल होने की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी । या तो उनके लिए कोई देश ही नहीं होगा या फ़िर वह क़ैदी की तरह अपने ही देश में रहने को मजबूर हो जायेंगे. पिछले छः सालों से मोदी सरकार से परेशान 20 करोड़ मुस्लिम आबादी ने आख़िरकार इस क़ानून का प्रतिरोध किया ।

उनके इस प्रतिरोध में वह गैर-मुसलमान आबादी भी शरीक हो गयी जो इस तरह बेधड़क भारतीय मूल्यों की अवमानना से सदमे में थी. संविधान विज्ञ माधव खोसला ने इन क़ानूनों के प्रभाव से उत्पन्न ख़तरे का जिक्र किया है. उनके अनुसार ‘अभी तक जहाँ नागरिकता का आधार जन्म है वहीं इन क़ानूनों के लागू होने के बाद वह आनुवांशिक हो जाएगा’. संक्षेप में कहा जाए तो ऐसी स्थिति जहाँ हिंदू प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया जाएगा और भारतीय मुसलमानों का परित्याग कर दिया जाएगा ।

भारत उबाल पर था लेकिन चाह कर भी मैं अपनी जन्मभूमि नहीं जा सकता था. मैं अपनी ही नागरिकता के भँवर में फँसा हुआ था । 7 नवंबर को भारत सरकार ने मेरी ओवरसीज सिटीजनशिप निरस्त कर दी थी और मुझ पर उस देश में घुसने पर रोक दी गयी जहाँ मेरी माँ और नानी रहती है. यह कहा गया कि मैंने अपने पिता के पाकिस्तानी होने की बात छुपायी है जबकि लगभग पूरी ज़िंदगी मैं अपने पिता से दूर ही रहा. जब मैं 21 साल का था तब उनसे पहली बार मिला था. यह निराधार आरोप था. अपनी ज़िंदगी में पिता की गैर-मौजूदगी पर मैंने कई आलेख लिखें हैं और एक किताब, स्ट्रेंजर टू हिस्ट्री  भी इसी विषय पर है. हमारा रिश्ता सर-ए-आम था. मेरे पिता, सलमान तासीर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर थे. 2011 में उनके अंगरक्षक ने ही उनकी हत्या कर दी थी क्योंकि उन्होंने ईशनिंदा की आरोपी एक ईसाई महिला के बचाव की हिमाक़त की थी.

इन सारी बातों से भारत में मेरी स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा जहाँ मैंने अपनी 40 साल के उम्र में से 30 साल गुजारे थे. मैं मोदी सरकार की नज़र में ‘पाकिस्तानी’ बन गया बल्कि इस से भी बढ़कर ‘मुसलमान’ बन गया क्योंकि भारत में धर्म आपकी मान्यता से ज्यादा आपकी आनुवांशिकता पर निर्भर करता है. यह सब तब हुआ जब मैंने टाइम मैगज़ीन के लिए ‘इंडियाज डिवाईडर इन चीफ’ शीर्षक से लेख लिखा. इस आलेख से प्रधानमंत्री भड़क गए. उन्होंने जवाब में कहा कि, ‘टाइम मैगज़ीन विदेशी है’. ‘लेखक ने ख़ुद ही कहा है कि वह पाकिस्तान के राजनैतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं. इसी से उनकी साख का अंदाजा लगाया जा सकता है’. उसी वक्त से एक भारतीय नागरिक के तौर पर मेरे दिन बस गिनती के ही थे.

 

अब मैं अपने देश नहीं जा सकता था. यही मेरी हकीक़त थी. हालांकि अनुभूति के स्तर पर एक वैचारिक क्षति भी थी. धर्मनिरपेक्ष भारत की संकल्पना को चुनौती की क्षति. श्रेष्ठता को चुनौती की क्षति. जैसा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने संकल्प लिया था कि यह कभी ‘हिंदू पाकिस्तान’ नहीं बनेगा. यह एक ऐसा जगह रहेगा जहाँ पिछली 50 सदियों में अंकुरित और पल्लवित धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों  और नस्लों को प्रश्रय दिया जाएगा…

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