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वर्ष १९८४

मलकीत, शिबानी और अमन सचदेव, तीनों रेडियो पर दंगों की खबर सुन रहे थे। शिबानी का जी मुँह को आ रहा था यह सोच-सोच कर कि उनके परिवार का एक सदस्य, हरजीत, घर से बाहर है।

शिबानी, अपनी बेटी, अमन से कहती है, ‘बेटा, तूने बहुत बड़ी गलती कर दी जो तू अपने भाई को छोड़ आयी। तुझे कहा था ना कि हमेशा साथ ही आया-जाया करो।’

अमन ने, ‘मम्मी’, कहा ही था कि मलकीत, शिबानी का पति, बोलता है, ‘तो उस बेवकूफ के चक्कर में हमारी बेटी फँस जाये ?’

शिबानी जवाब देती है, ‘बड़ी है, कुछ तो ज़िम्मेदारी है ना !’

मलकीत कहता है, ‘हाँ, हमने ही सबका ठेका ले रखा है !’

शिबानी तंग हो कर कहती है, ‘क्या हो गया ? शर्म करो ! वहाँ हमारा बच्चा दंगाइयों के बीच फंसा है और तुम…’

मलकीत शिबानी को झट से टोकता है, ‘ओए ! ज़्यादा धौंस मत दिखा, मेरा नहीं है वो… तेरी बहन का लड़का है…’

शिबानी मुंह-मुंह में कुछ कहती है ।

यह देख, मलकीत को और ज़्यादा गुस्सा चढ़ता है और वो चिल्लाता है, ‘सामने बोल !’

शिबानी मलकीत का गुस्सा देख शांत हो जाती है । मलकीत रेडियो बंद कर देता है और कमरे के चक्कर लगाने लगता है । वहीं, अमन जो अभी तक ज़मीन पर बैठे अपने माँ-बाप की बहस सुन रही थी, सोफ़े पर जाकर लेट जाती है ।

फिर कुछ देर बाद शिबानी मलकीत से कहती है, ‘आप प्लीज़, हरजीत को ले आओ, फिर बात करते हैं ।’

मलकीत चिल्लाता है, ‘मुझे पागल कुत्ते ने काटा है ! तू जा, तेरा बेटा है ना !’

‘शर्म नहीं आती बीवी को ये कहते हुए ?’, शिबानी पूछती है ।

‘तेरे बहन-जीजा शरमाये अपने बेटे को सरदार बनाते हुए ?’, मलकीत पलटवार करता है ।

‘पता है ना आपको, हमारे में एक बेटा देते हैं !’, शिबानी कहती है ।

‘हाँ, वो ही बेटे अब खालिस्तान मांग रहें हैं, इन्दिरा गांधी को मार दिया’, मलकीत कहता है ।

‘प्लीज़ मलकीत, आप ये सब छोड़ो, आप हरजीत को ले आओ, बेटा नहीं, घर का तो है ना वो !’, शिबानी कहती है ।

‘मैं मर गया तो तुम्हे कौन पालेगा, बस इसका जवाब दे दे’, मलकीत पूछता है ।

‘आप भी ! हम हिन्दू हैं, हमें कुछ नहीं कहेंगे ।’

‘तेरे बेटे के साथ देखेंगे, फिर ?’

‘तुम रोली लगा लो, अमन बेटे इधर आ…’, शिबानी अमन को पास बुलाती है ।

अमन जल्दी से भागकर अपनी माँ के पास जाती है ।

शिबानी अमन से कहती है, ‘बेटा, मंदिर से एक कटोरी में थोड़े से पानी में भिगोह कर रोली और हनुमान चालीसा भी, मंदिर में, जा पड़ी है, ले आ !’

अमन झट से दोनों चीज़ें ले आती है । तब तक, शिबानी मलकीत को एक कैंची पकड़ाती है और कहती है, ‘जैसे ही हरजीत दिखे, उसकी पग उतार कर, उसके बाल काट देना !’

‘दे दे जो तुझे पकड़ाना है… अगर मैं गया भी तो मैं स्कूल से एक कदम आगे नहीं ढूंढूंगा’, मलकीत ऐलान करता है ।

शिबानी, उस दौरान, मलकीत के कुर्ते की जेब में हनुमान चालीसा रख देती है और माथे पर भीगी रोली से टीका मल देती है ।

मलकीत का गुस्सा, एकदम डर में बदल जाता है और वो कहता है, ‘तुझे अमन की फिक्र नहीं होगी, पर मुझे है… मैं चला जाता हूँ पर कहीं ज़्यादा इधर-उधर नहीं ढूंढूंगा उसे !’

शिबानी, एक विचित्र विश्वास के साथ कहती है, ‘हाँ ठीक है, बस स्कूल में देख कर आ जाना… वो वहीं होना है ।’

मलकीत की सांसें चढ़ रहीं है । वो गुस्सायी आवाज़ में कहता है, ‘और हाँ, हरजीत को हिन्दू बना देना अब, बिना कुछ ड्रामा किये !’

शिबानी मलकीत से हाथ जोड़कर कहती है, ‘आप ले आओ उसे बस, मैं आपका ये एहसान कभी नहीं भूलूँगी ।’

मलकीत शिबानी की यह बात सुन, एक लंबी सांस भरता है और अमन से पूछता है, ‘क्या लगता है ? अपने किसी दोस्त के यहाँ निकल गया होगा या स्कूल में ही होगा ?’

अमन कहती है, ‘पापा, बताया ही था आपको, वो क्रिकेट खेलने में लगा था बोला भी था आने को सुनता नहीं है मेरी वो रमनदीप और हरमन के पीछे-पीछे भागता है ।’

मलकीत पूछता है, ‘वो जो गली पाँच में रहते हैं, वो ?’

‘हाँ’, अमन जवाब देती है ।

मलकीत शिबानी से कहता है ‘सारे दोस्त तो सरदार हैं उसके, बचेगा थोड़े-ही आज वो, और मुझे और साथ ले मरेगा ।’

शिबानी मलकीत से हाथ जोड़कर दरख्वास्त करती है मलकीत शिबानी को गुस्से-भरी आँखों से देखते हुए, घर से बाहर चल देता है ।

पीछे से शिबानी की आवाज़ आती है, ‘ख्याल रखना !’

दो ज़ीने उतरने के बाद मलकीत वापस घर में घुसता है ।

शिबानी पूछती है, ‘क्या हुआ ?’

मलकीत बिना कोई जवाब दिये, कुर्ता-पजामा उतारकर, बुशर्ट और पैंट पहनकर, घर से बाहर चल देता  है ।

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