हौसलों की उड़ान

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उस दिन जब पिताजी का फ़ोन आया, तो किरन भाग कर छत पर चढ़ गई, सिग्नल छत पर ही आता था  पिताजी  बोले, ‘सामनवा बांध लो सब के सब, हम कमरे का इन्तज़ाम कर लिये हैं, परसों की गाड़ी में चले आओ।’

किरन ख़ुशी से बौरा गई, और मन ही मन बोली, ‘शहर कभी गए नहीं और रेलगाड़ी कभी दिखबैए न रहे। दोनों काज एक साथ, सोच के ही मन मा लडडू फूटन लगे हैं।’ किरन ने झूमते हुए पिताजी  को प्रणाम किया और ख़ुशी से मचलते हुई छत से नीचे कूद गई।

‘हड्डी तोड़ये का है क्या? बंदरिया की तरह काहे छलांग लगाये रही है?’ अम्मा चिल्लाई।

‘पिताजी फोन किये रहे, कमरे का इन्तज़ाम कर लियें हैं, सबको शहर बुलाएं हैं, परसों की गाड़ी से।’ किरन मारे ख़ुशी से चिल्लाई।

‘हाँ, शहर में तो कोई परोस के खिलाब हमका।’

‘शहर में होटल होत हैं अम्मा, कभी सुने हो?’

‘और होटल मुफ़्त में रोटी नहीं बाटंत, टाइम ख़राब ना करो हमार और देखो तुम्हार भाई कहाँ ख़ाक छाँटत है? सब रोटी खाओ तो हम चूल्हा ठंडा करें।’

अम्मा की जिंदगी चूल्हे के इर्दगिर्द घूमती थी तो किरन के बड़े भाई की गांव की लड़कियों के इर्दगिर्द, उम्र का तकाज़ा था।  सोलह साल का क़दम माता पिता के लिए मुसीबत बन गया था। किरन क़दम से दो साल छोटी थी पर कहीं समझदार थी। लेकिन क़दम माता-पिता का इकलौता बेटा था तो उसके सौ गुनाह तो माफ़ थे।

‘क़दम, अम्मा बुलावा भेजे हैं, जल्दी चलो।’

‘अम्मा से कहो हमका रोटी नहीं खाये का है। तुम सब खाये के सो जाओ।’

‘तुम हमरी बात सुनो, बहुत स्पेशल है।’ किरन इतराती हुई बोली। क़दम बे-मने उठ कर आया और पूछा, ‘क्या है? जल्दी कहो?’

‘पिताजी कमरे का इंतज़ाम कर लिए हैं, सबको शहर बुलाया हैं।’

‘तुम को जाये का है तो जाओ, हमको नहीं जाये का है।’

‘कब तक चंपा-चमेली में अटके रहोगे, शहर चल कर देखो कितने तरह के फूल हैं।’  किरन मस्का लगाते हुई बोली, जानती थी  कि अगर भाई ने ना कर दी तो शहर जाना मुश्किल था। मर्द जात के बिना कहाँ कोई घर से निकलने देगा भला? दस्तूर है आख़िर।

‘तुम घरे लौट जाओ, हम आ के बतियाबे।’ क़दम खिसिया कर बोला।

रात भर घर में बहस हुई, अम्मा हार कर सो गयी, कदम ने भी किरन की ज़िद के आगे घुटने टेक दिये और तह हुआ की एक दिन बाद की गाड़ी में सब जौनपुर से दिल्ली की गाड़ी में रवाना होंगें।

‘तुम सामान टिकाओ, सब हुई जाब,’ पिताजी बोले।

‘इस कमरा से बड़ा तो हमार गुसलखाना बा, दरबा में रखे का हम सबको गाँव से बुलाये हो क्या?’ अम्मा सामान की गठरी पटकते हुई बोली।

‘अम्मा शांति रखो, सारी ज़िंदगी नहीं रहे का है यहाँ,’ किरन बोली।

‘पिताजी, आपकी ख़ातिर हम यहाँ आ गए, नहीं हमरा मन बिलकुल नहीं था,’ क़दम ऊंघता हुआ बोला।

‘हाँ, तुम का तो पूरे खेत की कटाई करे का रहा ना?’   पिताजी उसके सर पर एक तमाचा लगाते हुए बोले, ‘नालायक।’

‘एक तो हम चारों को बटोर कर यहाँ ले कर आये, और अब आपकी गाली सुनो। हम कल की ट्रेन से वापिस लौट जाएंगे, आप अपना जनाना माल संभालिये।’ क़दम बोला।

‘तुम कहीं और से टपके हो क्या? तुमका भी हम ही पैदा किये है।’ अम्मा खिसिया कर बोली।

‘ तुम सब हमका चार महीने बाद मिले हो, थोड़ा तमीज़ से बतिया लो?’ पिताजी बोले।

किरन और उसकी छोटी बहनें भूख से बिलख रहीं थी, सबसे छोटी सरिता बोली, ‘पिताजी हम सुबह से कुछ नहीं खाये हैं, रोटी खाये का है।’

‘पिताजी, किरन दीदी बोली थीं यहाँ खाना होटल में मिलता है, हमका भी होटल जाना है,’ मंझली बबिता बोली।

‘तुम सब मुँह-हाथ धो लिओ, तब चल बे,’ पिताजी बोले।

परिवार को होटल में खाना खिलाने के लिए पिताजी पिछले कई दिनों से अपना पेट काट रहे थे, रात में केवल भात, बिना दाल के, खा कर सो जाते थे ताकि बच्चों को एक-दो बार होटल में खाना खिला सकें।

पिताजी पास के ढाबे पर सबको ले गए, सुबह का वक़्त था, हींग-कचौड़ी  और आलू-तरकारी की खुशबु चारों ओर महक रही थी। अम्मा लंबा घूँघट और सरकाती हुई बोली, ‘रोज-रोज यहीं खाये का है क्या? कमरे में एक ठो चूल्हा लगा लो, हम रोज़ ही कचौड़ी उतार दें।’

‘तुम आराम से खाओ आज, हम किसी से बोले हैं, गैस का इंतज़ाम होइ जाब, कमरा में चूल्हा नहीं फूक सकत, समझीं?’

‘हे राम, हम से न होब, गैस का चूल्हा हम कभी देखे नहीं, और तुम कहत हो उस पर रोटी पकायें?’ अम्मा परेशानी से तिल मिला उठीं।

‘हम सिखाय देब, हमको आत है,’ पिताजी अम्मा को प्यार से निहारती हुए बोले।

 

‘हम अगर बच्चन के सामने शुरू हो गए तब मत कहियो?’ अम्मा की सुनते ही नींद उड़ गई।

‘पगलाए गए हो क्या, क़दम के पिताजी?’

‘चार महीने  हुए गये, पगलाए नहीं तो क्या करें? हम भी जीव हैं, पैसा बनाने की मशीन नहीं।’ पिताजी खुमारी में बोले।

‘तुम्हारे बाल-गोपाल के सामने ही शुरू करियो क्या, कहाँ जाये का है? बाहर? सड़क मा?’

‘अरे नहीं, साथ का कमरा ख़ाली है, हमरे दोस्त का है, वो गांव  गया है, चलो जल्दी।’ अम्मा ऐसे शरमाईं  जैसे नयी दुल्हन हो।

‘इंतज़ाम किये हो? हमका अब और बालक ना चाही, हमरे बस की नहीं अब।’

‘सब किये हैं, चलो अब।’ पिताजी बोले।

कुछ दिन रंगीन बीते, सुबह दिल्ली शहर की सैर, रात को पड़ोसी-दोस्त का कमरा और बाकी  समय ऑटो-रिक्शॉ की सवारियाँ। लेकिन कुछ ही दिनों बाद शहर में किसी महामारी की ख़बरें उड़ने लगी, चारों और हाथ धोने की, मुँह पर  कपड़ा लपेट ने की बातें होने लगीं । पिताजी के लिए छ: लोगों के लिए पीने का पानी जुटाना मुश्किल था, हाथ तो संडास के बाद धुल जाएं बस इतना काफी था। डर चारों ओर फैल रहा था, क़दम सबसे ज़्यादा परेशान था, उसे शहर वैसे ही कुछ पसंद ना आया था, तो उसने वापिस जाने की ज़िद शुरू कर दी, ‘हमको यहाँ नहीं मरे का है, हम कल वापिस जाएंगे, आप सबको यहाँ रुकना है रूको, हम नहीं रुकेंगें,’ क़दम बोला।

‘क़दम के पिताजी क़दम सही कहत है, गाँव में खुली हवा-पानी है, इस दरबे में तो ऐसे दी दम निकल जाई और कुछ दिनों मां।’

‘अम्मा, पहली बात, पिताजी सिर्फ कदम के पिताजी नहीं हम सबों के हैं, और हम पहली बार शहर आयें है कुछ दिन तो रुक जाओ, फिर जाने कब आना हो?’ किरन बोली।

‘किरन, पर क़दम सही कहत है, शहर में रहना ठीक नहीं, तुम सब वापस लौट जाओ, गांव में बीमारी नहीं है, सब कहत हैं, ये शहर की बीमारी है,’ पिताजी बोले।

 

तीन-चार दिन बाद पिताजी कुछ बेहतर हो गये, पर ठीक से चल नहीं सकते थे, और महामारी बढ़ती जा रही थी, तो पिताजी ने सब से गांव लौट जाने के लिए कहा, लेकिन किरन ज़िद कर बैठी कि वह पिताजी को छोड़ कर नहीं जाएगी जब तक वो पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाते। सब उसकी हठ के आगे हार गए, क़दम अम्मा और छोटी बहनों को ले कर गांव लौट गया। कुछ दिन किरन पिताजी की सेवा करती रही। फिर महामारी के चलते एक दिन फरमान आया की सभी बसें और ट्रेनें बंद कर दी जाएंगी और जो भी जहाँ है उसे वहीँ रहना होगा।

यह सुन कर किरन और उसके पिताजी घबरा गए, कुछ दिन चुप-चाप कमरे में दुबके रहे और जो राशन-पानी था, खा के गुज़ारा करते रहे। पर कुछ ही दिनों में दाना-पानी, पैसा, दवा-दारू सब खत्म हो गया। पिताजी बीमारी और लाचारी से मायूस होते चले गए, पर किरन ने हिम्मत ना हारी।

‘हम हज़ार रूपये बचा कर रखें हैं, कहीं से साइकिल का इंतज़ाम कर लें तो हम आपको गांव ले चलें।’

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