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वर्चस्व की लड़ाइयां कभी-कभी बदलावों का संवाहक हुआ करती थीं। हालॉकि गॉव के हर नाके पर तनाव था, मगर चुहल भी थी, और कयासें तो सबसे ज्यादा थीं।

कयासें, अन्देशों को जन्म देती थीं, जो कि अनजाने डर से इंसान को डराती थीं। फिर भी, कयासों का अपना लुल्फ था, जिसे लगाने की इंसान की फितरत। अब तक रामसुध इतना महत्वपूर्ण न हुआ था। न इससे पहले किसी ने सेखौं जैसी स्त्री में दिलजोई की इतनी उम्मीदें देखी थीं। सेखौं के बाप ने खुद को इतना महत्वपूर्ण कभी नहीं पाया था, जबकि उसने ठाकुरों के कहने पर अदालत में झूठी कसमें खायी थीं जबकि ठाकुरद्वारे की चोरी में वो पकड़ा भी गया था। हुआ बस ये था कि ब्राहम्ण बहुल बनहटी गॉव की दलित औरत को ठाकुर बहुल हरहटी गॉव का एक आदमी ले आया था। इसे ब्याह या अपहरण कहना उचित न होगा। क्योंकि स्त्री किसी भी तरह से ला कर, चाहे हथिया कर ही घर में खपा दी जाती थी। उस समाज में सामान्य स्त्रियों से इतर उस स्त्री की शीलभंग स्वीकृत किया जाता था और उसे हथियाये हुये व्यक्ति की सती-सावित्री बने रहने की घुट्टी पिला दी जाती थी। इन रिश्तों में तर्क न था। असंतुष्टि भी न थी। कुछ था, तो सहज-सरल तरीके से भाग्य को स्वीकारना। कोई गिला नहीं, शिकवा नहीं। दो-चार रोज स्त्री नाराज रही। स्त्री डरी, सहमी, घुटती, रटती, गरियाती-श्रापती रहती। पुरूष अकड़ता, दुलारता, समझाता एवं धमकाता रहता। समाज का निचला तबका जिन्दगी को बुद्धिमता के तर्कोें में नहीं उलझाता बल्कि आवश्यकता के अनुरूप खुद को ढाल कर अनुकूल बना लेता है। भगाकर लायी गयी नाबालिग सेखौं, अधेड़ रामसुधि के जीवन में ऐसे रच-बस गयी जैसे दूध में शक्कर घुल जाती है, इस मिश्रण से दूध की तासीर तो बदल जाती है, मगर आयतन नहीं,। मगर दूध से इतर जिन्दगी के विन्यास बनते भी हैं, बिगड़ते भी हैं। हुया यॅू था कि लाड़िला शुक्ल के अस्वामी फिरंगी, जो कि देसी दारू की भट्ठी भी चालाता था, हरहटी गॉव के फेरई से दो हजार रूपये ले गया था। दारू की भट्ठी पर आठ रूपये सैकड़ा की वापसी पर सूद का कौल-करार तय हुआ था। दारू की गवाही में फेरई ने ये कसम खाकर बताया था कि वो ये रकम माधौ शुकुल को बतौर पेशगी देने वाला था जो कि उसे बंगाल प्रांत से कोई औरत लाकर देगा। बंगाल से लायी गयी औरतें वफादारी, हाड़-तोड़ मेहनत एवं अपने सहज-सरल स्वभाव के कारण यहॉ काफी लोकप्रिय थीं। फिर माधौ शुकुल की लायी हुयी औरत ने शायद ही कभी किसी के साथ फरेब किया हो। इसीलिए रणुओं और बड़ी उमर के कुआंरो में माधौ शुकुल की खासी पैठ थी। देसी दारू की भट्ठी पर किया गया कौल परवान न चढ़ सका। करार के वायदे बुलबुलों के मानिंद फना हो गये। माघ की ठिठुरन ने फेरई की जीना मुहाल कर रखा था। गॉव में चुहल होती थी कि ‘‘जाड़ा कटै या तो रूई से या दुई से’’। फेरई के घर में न तो रूई की रजाई थी और न दुई यानी जोरू। हालॉकि ये जरूरत कम थी, मगर जुर्रत ज्यादा। सो बात बिगड़ गयी।दोनों  पक्षों ने दारू की भट्ठी पर एक-दूसरे से निपट लेने की चुनौती दी। लड्डू सिंह इसी मौके की तलाश में थे। बात तब की है जब युवावस्था के दिनों में ही लड्डू एवं माधौ बंगाल प्रांत से महिलायें लाया करते थे। माधौ शुकुल लंगोट के काफी पक्के थे। वे स्त्री व्यापार, बतौर रोजगार पूरी निष्ठा एवं इमानदारी से करते थे। इसके उलट लड्डू सिंह रसिक मिजाज व्यक्ति थे। उन्हे लालच ज्यादा न था। बस दिलजोई एवं रसिक मिजाजी के चलते वे इस पेशे में थे। एक बार कमली नाम की एक कमसिन युवती को उन्होने मुर्शिदाबाद से खरीदा। उसे देखते ही लड्डू सिंह की लार टपकने लगी। मुर्शिदाबाद से ही उन्होने शुकुल से अनुनय-विनय शुरू कर दी। शुकुल, लड्डू सिंह का उग्र स्वभाव जानते थे। सो वहॉ उन्होने हामी भर ली। मगर कमली के लिये शुकुल ने पहले ही गांव में छंगा सुनार से बतौर पेशगी दस हजार रूपये ले लिये थे। छंगा सुनार, जो कि हर वर्ष रामलीला में रावण का जीवंत किरदार किया करते थे। छंगा ने अपनी विधुरता से लड़ने के लिए शुकुल से रामजी की कसम उठवा ली थी कि जो जनाना शुकुल को देंगे वो बिल्कुल पवित्र होगी। छंगा ने मॉगी धर्म भीरू पत्नी। भले ही छंगा रामलीला में रावण का किरदार निभाते थे मगर अपनी पत्नी उन्हे सिया जैसी पाने एवं रखने की उम्मीदे थीं। शुकुल भी कमली को सौंपकर रामलीला में सहयोग और धार्मिक कार्य जैसा कुछ समझने लगे। मुर्शिदाबाद से ही लड्डू सिंह ने कमली पर कुछ ऐसी लार टपकायी थी कि शुकुल को उसे सकुशल बचाना मुश्किल हो गया था। धर्म और रोजगार के धर्म संकट ने शुकुल को ऐसा घेरा कि वे गाड़ी बदलकर, लड्डू को गच्चा देकर, कमली को लेकर भागे। क्योंकि लड्डू सिंह ने साफ कह दिया था कि यदि लड़की हाथ नहीं आई तो वो राह में कहीं भी शुकुल की गरदन मरोड़ देंगे। वैसे लंठ स्वभाव के लड्डू सिंह हिंसक तो न थे, मगर छूटते ही वार करना उनकी फितरत में शामिल था। शुकुल के सामने धर्म था, रोजगार था। फिर मार का भय भी था। मगर धर्म पुरूष छंगा सुनार की धर्म सेवा हेतु उन्होने लड्डू को दगा दिया और कमली को छंगा के हवाले कर दिया। बिहान ही ब्याह हो गया। छंगा धर्म पुरूष थे। उनके जैसे धर्म पुरूष एवं विधुर व्यक्ति के सहचरी को आवश्यकता को सबने माना।

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