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जब से लल्लू तिवारी का नाती पुत्ती ननिहाल आया है, तब से रामरती की जान सांसत में पड़ गयी है। बमुश्किल सात आठ साल के पुत्ती ने गॉव की सबसे घाघ समझी जाने वाली स्त्री रामरती का जीना हराम कर रखा था।

ज्यों-ज्यों जेठ की तपन बढ़ती जाती थी, पुत्ती की शरारतें भी परवान चढ़ती जाती थी। रामरती को ये बात महसूस होने लगी थी कि ऑधी-पानी से तो उसने अपनी लौकियां और टिकोरे बचा लिये थे, मगर ये पुत्ती से न बच सकेंगे। नीचे की डालियों के टिकोरे (छोटे आम) तो पुत्ती ने लगभग सारे तोड़ डाले थे, मगर उपर वाले टिकोरों पर उसे सटीक निशाना लगाने का मौका ही नही मिल पाता था। क्योंकि रामरती की चौकस निगाहें हमेशा उसकी रखवाली जो किया करती थीं। गॉव के लड़कों की मंडली ने कुछ तो लालचवश एवं कुछ शरारतों के वास्ते ही पुत्ती को आगे कर रखा था, कि वही बतिया (छोटी लौकी) तोड़ कर लाये। किशोर वय के लड़के प्रायः गांजा पीने की नकल में अमरूती पिया करते थे। अमरूती का अपना खास आकर्षण था। अमरूद की पत्तियों को टुकड़ों में तोड़कर उसे जलाकर पीना, फिर गंजेड़ियों की तरह उसे जोर से खींचकर क्रमबद्ध ढंग से खॉसना उस गॉव के लड़को का प्रिय शगल था। मगर पुत्ती जैसे छोटी वय के लड़के अमरूती के सेवन को ‘‘गंदी बात‘‘ कहकर कन्नी काट जाते थे। पुत्ती के मंडली का इकलौता प्रिय शगल बस यही था कि रामरती के लौकियों की बतिया चुराना और उसे गॉव के बाहर भूनकर उसमें गुड़ मिलाकर खाने का अपना ही आनन्द था। रामरती इतनी वृद्ध एवं जीर्ण-शीर्ण थी कि वो मारपीट करके और पीछा करके अपने लौकियो को बचा नही सकती थी। सो इस बाबत उसने ये विकल्प चुना था कि वो लौकी चुराने वालों और उसे नुकसान पहॅंचाने वालों को पानी पी-पीकर श्राप दिया करती थी। गॉव की औरतों में ये मान्यता व्याप्त थी कि रामरती ने अपनी लौकियों पर टोटका कर रखा था। शायद इसीलिये बिक्री के लिये उपलब्ध होने के बावजूद गॉव में रामरती की लौकियो को कोई नही खरीदता था। मजबूरन उस निराश्रित वृद्धा को अपनी लौकियां सोमवार की साप्ताहिक बाजार में बेचनी पड़ती थी। ‘‘डायन‘‘, ‘‘चुड़ैल‘‘ ओर टोटकेवालीं जैसी पदवियों से रामरती को मन ही मन तकलीफ तो बहुत होती थी, मगर दिल के किसी कोने में इस बात की तसल्ली भी थी कि इन्ही उपमाओं के कारण ही उसके जीविकोपार्जन के साधन सुरक्षित बचे रहते है। मगर जब से पुत्ती आया है, रामरती की सारी गणित गड़बड़ा गयी है। पुत्ती इतनी ज्यादा बतिया पर हमले करता था कि रामरती को कुछ सूझ ही नही रहा था कि वो क्या करे? यहॉ तक कि पुत्ती ने रामरती का खाना बनाना और शौच जाना तक दूभर कर दिया था। रामरती खुलेआम पुत्ती को श्राप दे नही सकती थी, क्योंकि उसकी झोपड़ी तिवारी के बाग के खाली पड़े नम्बर में ही बनी थी। ननिहाल में हद से ज्यादा लाड़-प्यार दिये जाने के कारण पुत्ती काफी मनबढ़ हो चुका था। अब वो अपने ननिहाल वालो की भी नहीं सुनता था। रामरती के शिकायत करने पर लल्लू तिवारी हॅस कर टाल जाते कि अब लड़का ननिहाल में चपरहपन नही करेगा तो फिर कहॉ करेगा। हालॉकि थोड़ा-बहुत टोटका तो अवश्य किया था रामरती ने। जैसी कि गॉव में मान्यता थी कि कद्दू की बतिया को तर्जनी ऊँगली दिखाने से वो मुर्झा जाता है। इसी आशंका से और लोगों की अशुभ नजरो से बचने के खातिर रामरती ने अपने लौकियो और टिकोरो की झाड़-फॅूक भी कर डाली थी। टेकते-टेकते जाकर वो सम्मय माता का भभूत ले आयी थी और लौकियो पर उन्हे टीक भी दिया था। आखिरकार पुत्ती के हमलो और धूप-छॉह से बचाकर रामरती ने तीन ताजी लौकियां तैयार कर ही ली थी। रामरती की आदत थी कि वो अपने बिक्री का सामान कटरा बाजार के बाहर पड़ने वाले हनुमान जी के मन्दिर पर ले जाकर नमन कराती थी, तभी कोई चीज बेचना शुरू करती थी। घर से माल बिक जाये वो अलग बात थी, मगर सोमवार के बाजार के दिन वो हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाने के बाद ही माल बेचती थी। साप्ताहिक बाजार मूलतः पशु बजार थी। ज्यादातर जानवरो का ही बिक्री-बट्टा होता था, मगर चाट-पकौडे़, खिर्ची-मिर्ची के बिक्री की मनाही थोड़े ही थी। कटरा बाजार की वो साप्ताहिक उठायी बाजार श्यामतानाथ चौधरी के स्वामित्व वाले बड़े भू-भाग पर ही सजती थी। पशुओं की खरीद-फरोख्त पर रसीद कटाने के अलावा किसी भी दुकानदार को कोई टेक्स नही देना होता था। श्यामतानाथ चौधरी के छोटे भाई कामतानाथ चौधरी ने रामरती को टोका, ’’कहॉ जा रही हो बूढ़ा? लोकी-वौकी नही है क्या? रामरती ने कहा‘‘ है तो, मालिक ई देखो‘‘। उसने अपने फटे झोले में से निकालकर एक लौकी दिखायी। लौकी को लेकर कामतानाथ चौधरी ने जोर से सूॅधा, वे संतुष्टि से भर उठे। उन्होनें कहा ‘‘कैसे दोगी कितनी है’’? रामरती ने काह ‘‘ आप तो मालिक-मिरवा है। आपसे क्या मोल-भाव? हम तो आपकी पौनी प्रजा है। आपही का दिया खाते है। तीन लौकियां है, मगर एक अड़चन है मालिक। कामतानाथ चौधरी ने कहा ’’हॉ-हॉ जानता हॅू, तुम अभी हनुमान जी को प्रसाद नही चढ़ायी होगी। जाओ चढ़ा आओ, तब तक हम बाजार का राउण्ड ले लेते है। दरअसल चौधरी साहब शौकीन तो लौकी की बरिया (पकौड़ी) के थे, मगर जब से उनकी बवासीर बढ़ गयी थी, डाक्टर ने उन्हे खास तौर से तैलीय पदार्थों से दूर रहने की चेतावनी दी थी। तेल-मसाले से लबालब लौकी की बरिया का परित्याग उन्हे मजबूरन करना पड़ा था, मगर लौकी से उनका प्रेम शाश्वत था। चौधरी साहब खुद को तसल्ली देते थे कि लौकी की बरिया न सही तो भुजिया ही सही। ठसाठस भरे बाजार में जगह बनाते हुये रामरती थोड़ा आगे बढ़ी तो अक्सर सौदे उधार खरीदने वाले कल्लू शुक्ल ने उसे रोक लिया और पूछा ‘‘बूढ़ा, कुछ लौकी-वौकी है तो लाओ दे दो। लाओ दो तो लौकियां,‘‘। रामरती ने झल्लाते हुए कहा ’’कितनों का मारे बैठे हो शुकुल? जाओ पहले उनका निपटाओ। सबसे पहले मैं परसाद चढ़ाउॅगीं, सौदा-वौदा बाद में । इतना कहकर वो आगे बढ़ गयी।

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