By

कॉलेज से लौटा तो मां बरामदे में बिछे तख्तपोश पर सोई हुई थी। वह मुंह पर दुपट्टा लपेटे जब चाहे, जहां चाहे सो जाती है। कई बार सोचा कि पूछूं-क्या नींद उसके दुपट्टे में छिपी बैठी रहती है! पूछा नहीं। जब कोई बात समझ न आए तो गाली देती है। उसके पास औरत-मर्द की गालियों का अगणित खजाना है।

वह बीचवाले बेटे के पास रहती है। जब भी आएगी बिना इत्तला दिए। उसे न लिखना आता है न पढ़ना। बेटे से खत लिखने को कहे तो एक ही जवाब, ‘‘क्या करोगी वीरजी के पास। उस घर में सारे अंग्रेज़ी बोलते हैं। यहां कोई तकलीफ है क्या?’’

‘‘मोया बहुत जिरह मत किया कर। यह तकलीफ मोई बीच में कहां से आ गई! बड़े काके की याद आ रही है कहीं बीमार न हो!’’

मां जिन वक्तों की है तब गिनकर बच्चे पैदा नहीं किए जाते थे। बच्चे सालाना फसल। मुझसे पहले शायद दो मर गए थे। मैं जनमा तो उसने तहैया कर लिया कि मरने नहीं देगी। सारे देवी-देवताओं की मदद ली बचाने के लिए। गले में ताबीज़ कलाइयों पर रंग-बिरंगे धागे। कोई देखने आए तो चादर से ढाँप देती और कहती, “काका सोया है। फिर देख लेना।‘‘ पिता जी बाद में मज़े लेने के लिए हमें माँ की हरकतें बताते-सुनाते थे।

‘‘जब कोई आए तो इसे देखने क्यों नहीं देती। मेरी बहनों को भी…’’

‘‘नज़र लगवानी है! मारना है! तुहाडी भैंणाँ तो पक्की डायनें हैं। आँख भर देख लें तो फूल मुरझा जाएँ। कुछ हो गया तो पहले सबको ज़हर दूँगी फिर खुद खा लूंगी।’’

‘‘मत बका कर वाही-तबाही हर वक्त। कुछ नहीं होगा इसे। देखने दिया कर। लोग उलटी-सीधी बातें…’’

‘‘यह इसे-इसे क्या लगा रखा है। कोई मीठा-सा नाम रखो। किस काम आएगी पढ़ाई तुम्हारी! और कान खोलकर सुन लो। नाम छोटा हो, सुनकर कानों में मिश्री घुल जाए।’’

पिता तब के मैट्रिक पास थे। अनपढ़ रिश्तेदारों के लिए वे बहुत पढ़े-लिखे थे। पिता जाने-माने हकीम थे। दूसरी सुबह मरीज़ आने से पहले माँ को पास बैठाया।

‘‘सोच लिया काके का नाम–सार्थक।’’

माँ उन्हें फटी-फटी आँखों से देखती रही। फिर फट पड़ी।

‘‘यह अरबी-फारसी का नाम किसी और का रखना। सार्थक! हुँह!’’

‘‘बीबी, सार्थक हिंदी का लफ्ज़ है। बड़ा अच्छा मतलब। साथ रोटी वाला र बोल। दो-तीन दिन में मुँह पर चढ़ जाएगा। और बता देना सबको मेरी तरफ़ से। किसी ने नाम बिगाड़कर बोला तो टाँगें चीर दूँगा। कोई माँ का यार सथ्थू कहेगा कोई सथ। चीज़ें बिगाड़े बिना पंजाबवालों को चैन नहीं मिलता।’’

माँ जानती थी पिता सचमुच टाँगें चीर देगा। कई बार चीर चुका है। रोज़ शाम घोड़े पर सवार हो वह दुश्मन रिश्तेदारों को खोजने निकल पड़ता है।

नाम रखनेवाले दिन, पूजा के बाद माँ ने हाथ बाँध सबको चेतावनी दी, ‘‘मेरी एक अरज है। पूरे ध्यान से सुन लो। काके का नाम सार्थक है। बिगाड़कर कोई न बोले। हकीम साहब का हुकुम है। उन्हें क्रोध आ जाए तो रब्ब भी राखा नहीं।’’

हाथ बाँधने के पीछे खड़ी धमकी सबने देख ली थी। मैं बंटी, टीटू वगैरह बनने से बच गया।

मेरी शादी के कुछ दिनों बाद माँ आई तो पहला सवाल पूछा…

‘‘घरवाली तुझे क्या कहकर बुलाती है?’’

‘‘सार्थ?’’

‘‘क कहाँ गया? उसे हिदायत कर दे। पूरा नाम पुकारे। तेरे स्वर्गवासी पिता को वहाँ भी क्रोध आ जाएगा। बड़ा हरामी मर्द था। स्वर्ग से भी कुछ कर बैठेगा। और देखो पढ़ी-लिखी को। नाम ही छोटा कर दिया।’’

मैं चुप रहा। माँ से कभी बहस नहीं करता। उसे समझाता ही कैसे कि शरीर जब उत्तेजित हो तो सबसे पहले नाम ही छोटा होता है।

~

सोचा जब तक माँ सोई है चाय बना डालूँ। कुर्सी हिलने की आवाज़ से जाग गई। पैर छुए। ‘जीन्दा रह, लंबी उम्रें हों’ के बाद पूछा, ‘‘तू कमज़ोर क्यों हो गया?’’

‘‘माता वज़न पहले से बढ़ गया है।’’

‘‘वज़न मोए को मार गोली! चेहरा तो मुरझाए फुल्लों जैसा है। सुन, कहीं घरवाली के साथ बहुत सोता तो नहीं। कमज़ोरी आ जाती है।’’

माँ किसी भी विषय पर बात कर सकती है। दिन में दो बार रेडियो पर दसियों बरसों से खबरें सुनती आ रही है। और तो और उसे अमेरिका और रूस की गुंडई के बारे में भी सब कुछ पता रहता है।

सोचा माँ को छेड़ा जाए। अरसा हो गया उसके मुँह से श्लोक नहीं सुने। श्लोक – हमारे पंजाब की रसीली गालियाँ।

‘‘माता, मैं तो उसके पास से गुज़रता भी नहीं, लेटना तो दूर…’’

‘‘तू पढ़-लिखकर भी खोटे का खोटा रहा। औरत तब तक ही खुश रहती है जब तक मर्द साथ बिस्तरे में हो। बाद में तो कटखनी बन जाती है।’’

‘‘छोड़ माता। दूध दूँ कि चाय बनाऊँ?’’

माँ के चेहरे पर एकदम चिंता उग आई। डरी आवाज़ में पूछा, ‘‘काका! तू सबकी तरह पूरी नौकरी क्यों नहीं करता? लोग शाम को काम से लौटते हैं, तू दस बजे घर। न पुत्तर। अक्ल कर। निकाल दिया तो क्या करोगे? पहले थोड़े दुख पाए हैं। मर्द बेकाम हो जाए तो उसके सारे गुण बेकार। सबकी आँखों में चुभता काँटा।’’

‘‘माता, कुछ पता न हो तो चुप रहते हैं। मैं एम.ए. क्लास को पढ़ाता हूँ। एक घंटे के दो पीरियड।’’

‘‘ठीक कहा। अंग्रेज़ी वाले हमेशा कम काम करते हैं। कुछ और काम कर लिया कर। देह में जंगाल लग जाएगा।’’

मेरे पास बैठते ही माँ का हिदायतनामा शुरू हो जाता है। छोटा था तो उसे सारे मौसम मेरे शत्रु लगते थे। गरमी में बाहर मत निकल, लू लग जाएगी। लू लगने से तेरा चाचा पागल हो गया था। सर्दी में निमोनिया हो जाएगा। साल भर पड़ा रहेगा बिस्तरे में। एक बार पूछा था ‘‘माता मैं बाहर कब निकलूं।’’

‘‘बस, तू मेरे पास बैठा रहा कर। दोनों बातें करेंगे। यह औरतें बड़ी हरामी होती हैं। कैसे आँखें फाड़ तेरा रूप-रंग देखती हैं। किसी ने जादू-टोना कर दिया! तो इसका इलाज तो हकीम साहब के पास भी नहीं। मेरी बात गाँठ बाँध ले। बड़ा होगा तो तेरा नुकसान औरतें ही करेंगी। मर्द पैदाइशी बेवकूफ़ होते हैं। किसी की कभी नहीं मानते। हमेशा अपने दिल की सलाह मानेंगे।’’

पूरी किताब पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

 

Leave a Reply