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                  ग्रेग चैपल के साथ वो सात दिन

‘तो आजकल तुम ऑस्ट्रेलिया की रंगीन रातों का लुत्फ उठा रहे हो?’ ग्रेग चैपल ने अपनी आंखों की चमक और मुस्कान के साथ पूछा।

मैं ग्रेग की निगहबानी में पिछले कुछ दिनों से सिडनी क्रिकेट ग्राउंड (एससीजी) पर अभ्यास कर रहा था। हमारा कार्यक्रम तय था-वह मुझे ठीक साढ़े नौ बजे होटल लेने आते थे। हम लोग फिर गाड़ी से खूबसूरत एससीजी पहुंचते जहां पर मैं सुबह का अभ्यास करता था। कुछ दिन बाद मैंने उनसे आग्रह किया कि मैं उनसे सीधे साढ़े दस बजे मैदान पर मिला करूंगा। मैंने कहा, ‘ग्रेग, आप परेशान न हों मैं खुद से ही वहां पहुंच जाया करूंगा।’ इसी आग्रह के बाद ग्रेग मुझे ऑस्ट्रेलिया की रंगीन रातों के मुद्दे पर छेड़ने लगे।

अब आप जानते हो मैं शराब नहीं पीता। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया की रंगीन रातें मेरे लिए कभी आकर्षण का कारण रहीं ही नहीं। यह बात और है कि मेरे कुछ शौकीन साथियों के लिए यह एक बहुत बड़ा आकर्षण रही थीं। मेरे प्रैक्टिस पर एक घंटा देर से पहुंचने का कारण इतना रंगीन नहीं था। बिल्कुल अनाकर्षक था। मैं ग्रेग से मिलने से पहले अपना अभ्यास खुद से शुरू करना चाहता था-मैं चाहता था कि उनके आने से पहले ही मैं ग्राउंड के 13-14 चक्कर लगा लूं। इतने वार्मअप के बाद ही मैदान पर उतरूं।

दरअसल जमकर दौड़ना अब मेरे नए फिटनेस कार्यक्रम का अहम हिस्सा बन चुका था। मैं चाहता था कि बतौर कप्तान मैं एक उदाहरण पेश करूं। मुझे पता था कि खासकर ऑस्ट्रेलिया जैसे कठिन दौरे पर मुझे ही नज़ीर पेश करनी थी।

कभी-कभी आपकी ज़िंदगी रुक सी जाती है। आप अपने करियर के ऐसे शिखर पर पहुंच जाते हो कि उसके बाद शिखर की चोटियां खत्म हो जाती है। यहां शिखर पठार में बदल जाते हो और पाने के लिए लक्ष्य खत्म से दिखने लगते है। तो ऐसे में क्या किया जाए?क्या इसे सफर का अंत मानकर रुक जाया जाए? क्या मिले मुकाम से संतोष कर लिया जाए? या फिर मुझे फिर से एक जोखिम उठाकर नए बड़े लक्ष्य के लिए शुरुआत करनी चाहिए? इससे अलग और गहरा सवाल भी था। इस दोराहे पर एक सवाल यक्ष प्रश्न बन जाता है- क्या मुझे मिले इस मुकाम पर बस सधी सुरक्षित पारियां खेलते हुए समय बिताना चाहिए? या फिर मुझ पर ज़िम्मेदारी है कि मैं भविष्य को अपनी विरासत छोड़ कर जाऊं?

साल 2003 के बीच में मुझे ऐसे ही दोराहे का सामना करना पड़ा। कप्तान के तौर पर मेरा विश्व कप का अभियान सफल था। मैं टीम को फाइनल तक ले गया। फाइनल में हम अपने चिर प्रतिद्वंद्वी बन चुके,और उस दिन बेहतर साबित हुए, ऑस्ट्रेलिया से हार गए थे। उससे पहले टीम ने मेरी कप्तानी में मज़बूत इंग्लोड को उनके ही घर में (घरेलू पिचों पर) हराकर नैटवेस्ट ट्रॉफी जीती थी। भारत चैंपियंस ट्रॉफी का संयुक्त विजेता बन चुका था। सबकुछ हासिल था पर सवाल अब भी वही था-मैंने जो हासिल किया है क्या उससे मैं संतुष्ट हो जाऊं? या फिर कप्तान के तौर पर मैं और ऊंची उड़ान का जोखिम उठाऊं?

हमारे नए सत्र के विदेशी दौरों के कार्यक्रम ने मुझे एक अवसर प्रदान किया। हम साल के अंत में ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर जा रहे थे। उस समय की मेज़बान टीम के फॉर्म को देखते हुए उनके घर में उनको हराना करीब-करीब नामुमकिन था। हम अब तक कभी यह नहीं कर सके थे। क्या मुझे मेहमान टीम के अब तक के कप्तानों की तरह सुरक्षित खेलना चाहिए या फिर ऑस्ट्रेलियाई टीम पर उनके किले में ही हमला करना चाहिए था? यह इतिहास की अब तक की सबसे बेहतरीन टीम थी। लेकिन इस वजह ने चुनौती को और ज़्यादा रोमांचक बना दिया था।

बाद में जिस फैसले को शृंखला का निर्णायक माना जा सकता है वह मैंने लिया। दिसंबर में शुरू होने वाले टेस्ट से पहले निजी तौर पर हालात का जायज़ा लेने के लिए मैंने जुलाई में एक व्यक्तिगत दौरे पर सिडनी जाने का फैसला लिया। मैंने सोचा कि इसका दोहरा फायदा होगा। इस दौरे का उपयोग मैं अपनी व्यक्तिगत बैटिंग को अगले स्तर पर ले जाने के लिए कर सकता था साथ ही यह दौरा मुझे वहां खेलने की परिस्थितियों से वाकिफ करा देगा।हम पर इस बात का कुछ और बुरा असर हो सकता था। जब मैदान बड़ा हो तो आप को तीन-तीन रन लेने के मौके मिलते हो पर अगर आप तीन रन लेते हो तो दौड़ने में थक जाते हो और अगली गेंद खेलने से पहले बुरी तरह थके होते है। मैं इसीलिए सिडनी क्रिकेट ग्राउंड के चक्कर लगा रहा था और खुद से कह रहा था कि बड़े मैदान कोई समस्या नहीं है, हम उन्हें हरा देंगे।मुझे ग्रेग का नंबर अपने एक पत्रकार मित्र से मिला। मैंने ग्रेग से पूछा अगर वो राज़ी हों तो मैं उनकी सुविधानुसार मेलबॉर्न या सिडनी आ सकता था, पर मुझे उनके साथ एक हफ्ते का पूरा समय चाहिए था।

जैसे ही मैं सिडनी पहुंचा तो वहां जमा देने वाली सर्दी से मेरा सामना हुआ। ग्रेग ने पहले ही आगाह कर दिया था कि प्रैक्टिस करने वाली पिचों में कुछ नमी होगी। पर मुझे इससे कोई नहीं समस्या नहीं थी। मैं सबसे कठिन परिस्थितियों में अभ्यास के लिए मन बनाकर आया था।जैसे गेंदबाज़ को ऑस्ट्रेलिया की सख्त पिचों पर किस लंबाई पर गेंद फेंकनी चाहिए? किसी भी दिन के खेल में सबसे कठिन समय कौन सा होता है? ऑस्ट्रेलिया के किस मैदान पर मुझे दो स्पिन गेंदबाज़ों के साथ खेलना चाहिए? गाबा में आदर्श बॉलिंग समीकरण क्या होंगे? मैदान के किस बॉलिंग छोर से मुझे स्पिनर लगाने चाहिए? एडिलेड के चौकोर मैदान में किन-किन जगहों पर मुझे क्षेत्ररक्षक लगाने चाहिए?

हम कई बार बुरी तरह इसलिए हारे क्योंकि हमारे क्षेत्ररक्षक सही जगहों पर नहीं लगाए गए और उन्होंने कई कैच छोड़े। इन कैचों के साथ हमने जीत को भी हाथ से फिसल जाने दिया था।

मैं ग्रेग की क्रिकेटीय दक्षता का कायल था और उनका बहुत सम्मान करता था। मैं उन्हें मैदानों में कई जगह ले गया। वहां पर अपने क्षेत्ररक्षक लगाने के बारे में उनकी राय लेकर अपनी समझ को बेहतर किया। यह भी जाना कि किस कोण पर क्षेत्ररक्षक लगाने से सही परिणाम आ सकते है। सीरीज़ का पहला मैच ब्रिसबेन में था। मैंने उनसे आग्रह किया कि वो मुझे एक दिन के लिए ब्रिसबेन ले चलें। दुर्भाग्य से यह संभव नहीं हो सका क्योंकि वहां बहुत सर्दी थी और ब्रिसबेन का पूरा मैदान ही कोहरे और पाले से प्रभावित था।

मैंने कई तरह के बल्लेबाज़ी अभ्यास किए जैसे शॉट मारते समय अपने शरीर का संतुलन सही रखना, पुल शॉट मारते समय शरीर की आदर्श स्थिति, कब कौन सा शॉट मारना है, मेरे पिछले पैर का संतुलन। इन सब पर मैंने विस्तार से चर्चा की।

मैं सात दिन बाद घर लौट आया। अपने बाद के करियर में ग्रेग चैपल का जो व्यक्तित्व मैंने देखा वह इस समय से बिल्कुल अलग था। इन ग्रेग चैपल ने मेरे खेल में ज़बरदस्त सकारात्मक बदलाव ला दिए थे। ऑस्ट्रेलिया से निकलने से पहले मैंने दिल की गहराइयों से उनका आभार व्यक्त किया और एक नई ऊर्जा से साथ वापस लौट आया। इस ऊर्जा का ही परिणाम था कि मैंने अहमदाबाद में न्यूज़ीलोड के खिलाफ शतक भी जड़ दिया था।

मुझे इस बात की भी बेहद खुशी हो रही थी कि मैंने ऑस्ट्रेलियाई दौरे की इतनी अच्छी तैयारी कर ली थी। हो सकता है कि आपमें से कुछ लोगों यह अजीब लगे कि हमारी टीम का कप्तान क्रिकेटीय जासूसी जैसा काम करने दूसरे देश गया था। पर मुझे यह बिल्कुल औचित्यपूर्ण दिखता है। मैं नहीं चाहता था कि मुझे और मेरी टीम को दिसंबर में होने वाले मैचों में किसी भी तरह के अनदेखे खतरों और अचरज का सामना करना पड़े। मैंने वही होटल बुक किया जहां हमें टूर के दौरान ठहरना था।

बाद में मैंने कुछ खबरों में पढ़ा कि जॉन राइट को मेरे इस गुप्त ऑस्ट्रेलियाई दौरे के बारे में नहीं पता था और इस बात को लेकर वह मुझसे नाखुश भी थे। यह बिल्कुल भी सच नहीं था। राइट को इसकी पूरी जानकारी थी और वह जानते थे कि मैं किस मकसद से वहां गया था। उन्होंने मुझसे कहा था कि बतौर कप्तान मैं टीम की भलाई के लिए कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हूं। यही वजह थी कि मुझे उन्होंने वहां जाकर खुद से पिच देखने की अनुमति भी थी।

पिछले कई सालों से ऑस्ट्रेलिया चतुराई से एक काम करता था। वह मेहमान टीमों को दौरे की शुरुआत में ही सबसे कठिन परिस्थितियों में खेलाते थे। जब तक मेहमान टीमें इन परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढालतीं, तब तक सीरीज़ ही खत्म हो जाती। मुझे पता था कि इतनी योजना बनाने और तैयारी के बाद भी भूचाल का सामना तो करना ही था, पर कोशिश यह कि इसके झटके के असर को कैसे कम से कम किया जाए।

उन दिनों भारतीय क्रिकेट में कहा जाता था कि अगर मुझे छोटी से छोटी समस्या हो तो मैं फोन उठाकर 033 (कोलकाता का एसटीडी कोड) मिला देता था और सीधे जगमोहन डालमिया से ही बात करता था। यह कहानी सुनकर मुझे आज भी हंसी आती है। मैं श्री डालमिया को बहुत ही आवश्यक मामलों में फोन करता था और वह मामले भी टीम के हितों की रक्षा के ही होते थे।

उस अगस्त मैंने उन्हें फोन मिलाया था-उनसे आग्रह करने के लिए कि हमें ऑस्ट्रेलिया का दौरा शुरू होने से पहले तीन हफ्ते का समय मिल जाए। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया (ऑस्ट्रेलियाई बोर्ड) ने दौरे के कार्यक्रम की घोषणा कर दी थी। ऐसा करने में वे हमेशा की तरह ही बहुत चतुराई और तेज़ी दिखाते थे। मैं चाहता था कि डालमिया जी अपने प्रभाव का इस्तेमाल करें जिससे हमारी टीम को मुख्य टेस्ट से पहले कुछ अभ्यास मैच खेलने को मिल जाएं। मेरा तीर निशाने पर लगा था। उन्होंने क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को इसके लिए राज़ी कर लिया था।

इसके बाद हम ऑस्ट्रेलिया पहुंचे। हमने अपना पहला अभ्यास मैच विक्टोरिया के खिलाफ मेलबॉर्न में खेला था। इसके बाद हमें ऐसे ही दो मैच ब्रिसबेन में खेलने को मिले। ऑस्ट्रेलिया का यह दौरा तीन महीने लंबा था पर मुझे पता था कि पहले दो हफ्ते ही हम पर सबसे भारी पड़ने वाले है। एक बार हम इनसे पार पा जाएं तो चीज़ें आसान हो जाएंगी। और हुआ भी बिल्कुल वैसा ही। जब तक ब्रिसबेन टेस्ट शुरू हुआ हमें उन सख्त और तेज़ पिचों पर खेलने के लिए 20 से ज़्यादा शानदार सेशन मिल चुके थे। हम ऑस्ट्रेलिया से भिड़ने को तैयार थे।

यह सीरीज़ मेरे जीवन में हमेशा दिल के सबसे करीब सीरीज़ में से एक रहेगी। यह सिर्फ क्रिकेट के मैच जीतने या खेल में मैदान मारने की खुशी नहीं दे गई। इसने इस बात की पुष्टि भी की कि मैं यह सोचने में सही था कि चाहे जितनी बड़ी चुनौती हो, मुझे हमेशा अपना लक्ष्य बढ़ाते जाना है। जैसा कि मैंने पहले कहा कि लक्ष्य बढ़ाते जाने, उसे कठिन करते जाने में सबसे पहले आपके सबसे करीबी लोग ही आपके रास्ते की बाधा बनेंगे, जो आपकी चिंता करते है। वो आपको रोकेंगे। समझाएंगे कि तुमसे पहले किसी ने यह मुकाम हासिल नहीं किया है तो क्यों नाकामी मोल लेने पर तुले हो? पर याद रखिए ऐसे ही फैसले आपको आप बनाते है, आपकी ज़िंदगी बदल देते है

द्रविड़ ने ब्रिसबेन टेस्ट की दोनों पारियों में क्रमशः 1 और 43 रन बनाए थे। लेकिन इसके बाद द्रविड़ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने इस दौरे में बेहद शानदार प्रदर्शन किया था। उसकी सफलता इस बात की गवाही दे रही थी कि मैं नेतृत्वकर्ता की अपनी भूमिका में सफल होने लगा था। इस दौरे पर हरभजन चोट के कारण शामिल नहीं हो सका था पर कुंबले ने अपनी शेरदिल गेंदबाज़ी से उसकी भरपाई कर दी। और हां, अजित अगरकर को कैसे भूला जा सकता है, आशाओं से कहीं आगे जाकर उसने बेहद शानदार गेंदबाज़ी की। खासकर एडिलेड टेस्ट की दूसरी पारी में तो उसने ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ी की कमर तोड़ दी थी।

ऑस्ट्रेलियाई टीम अपनी सुनियोजित योजना के मुताबिक हमेशा विपक्षी टीम के कप्तान को निशाना बनाती थी। मैंने इसके लिए खुद को तभी तैयार कर लिया था जब मैंने ऑस्ट्रेलिया के लिए अपनी फ्लाइट की सीट बेल्ट भी नहीं बांधी थी कि उनका निशाना बनने के पहले ही मैं उन पर वार करूंगा। मैंने अपने मन में इन परिस्थितियों के मुताबिक मारे जाने वाले शॉट्स तक सोच लिए थे। मुझे अपनी टीम को यह भी दिखाना था कि जब भी संकट की घड़ी आएगी उनका कप्तान झाड़ियों में छिपकर खड़ा रहने वालों में से नहीं है। वह सबसे आगे आकर सारे वार सीने पर झेलेगा और उनका डटकर जवाब देगा।

मैंने उसे दूसरी पारी में जवाब दिया, जब भज्जी ने उसे आउट कर दिया तो मैं उसके पास गया और बोला, स्टीव, इस हार के बाद मुझे बताना तुम्हें कैसा लग रहा है, क्या तुम्हें इल्म है कि अब तुम ऑस्ट्रेलिया के कप्तान नहीं रह पाओगे? यह सिर्फ दोस्ताना छेड़छाड़ थी। वो कुछ नहीं बोला, बस चला गया। मुझे पता था कि मैं एक चैंपियन से लड़ रहा था और उसे मानसिक जंग में जीतने नहीं दे रहा था।

मुझे ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के साथ ऐसी छेड़छाड़ बेहद पसंद है। जब हमने ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया तो स्टीव अपनी आखिरी टेस्ट सीरीज़ खेल रहा था। पूरा माहौल भावनात्मक था। स्टीव सिर्फ क्रिकेट टीम का कप्तान नहीं था। ऑस्ट्रेलिया में उसे राष्ट्रीय नायक के तौर पर पूजा जाता था। जब दर्शक स्टेडियम आते तो वह स्टीव वॉ की पहचान बन चुके लाल रुमाल को लेकर आते और उसे लहराते थे। जब वह मैदान पर उतरता तो पूरा स्टेडियम चिल्लाकर उसका स्वागत करता था। स्टीव अपना करियर जीत के साथ खत्म करना चाहता था। वह क्लीन स्वीप चाहता था।

लेकिन हम उसकी पार्टी में हाथ बांधकर खड़े होने तो गए नहीं थे। हम उसका यह बड़ा सपना चकनाचूर करना चाहते थे। एडिलेड टेस्ट जीतकर हम 1-0 से आगे हो गए। इस टेस्ट में राहुल द्रविड़ ने दोनों पारियों में शानदार बल्लेबाज़ी की थी। साथ ही वी.वी.एस. लक्ष्मण ने भी।

कोलकाता के एक रिपोर्टर ने एक बार मुझसे पूछा, द्रविड़ ने कुछ साल पहले कहा था कि जब ऑफ साइड पर खेलने की बात हो तो पहले नंबर पर भगवान है और दूसरे पर गांगुली। अब आप द्रविड़ की यहां की गई इस बल्लेबाज़ी पर क्या कहेंगे? मैंने जवाब दिया, वह भगवान की तरह बल्लेबाज़ी कर रहा था।

अगर आप वॉ की अजेय टीम के खिलाफ खेल रहे हो तो जीत का मंत्र बस सीधा और सरल सा है। आप यह मानकर चलिए कि आप इस टीम से फील्ड पर लड़ नहीं रहे है, आप युद्ध कर रहे है। आप अपनी छोटी से छोटी मानसिक कमज़ोरी नहीं दिखा सकते। वे किसी भी छोटी से छोटी कमज़ोरी का फायदा उठाने में माहिर है। इन मौकों का फायदा उठाने का मौका मैं उन्हें नहीं देना चाहता था मुझे पता था कि मैं डिगा तो मेरी टीम मानसिक तौर पर हार जाएगी।

सीरीज़ के अंतिम सिडनी टेस्ट में सचिन का फॉर्म वापस आ गया। उसके बाद तो सचिन ने जो किया वह इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। उसकी पारी आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मिसाल है। उसने विशालकाय दोहरा शतक तो बनाया ही साथ ही उसने वी.वी.एस. के साथ मैराथन साझेदारी भी की। इस पारी ने ऑस्ट्रेलियाई दर्शकों की सांस अटका दी थी।

सचिन की दिल जीतने वाली बल्लेबाज़ी के बाद हमारे गेंदबाज़ी आक्रमण ने ऑस्ट्रेलिया को घुटनों पर ला दिया था। यह देखना ही अपने आप में बेहद सुखद था कि ताकतवर ऑस्ट्रेलिया की टीम अपने वजूद को बचाने के लिए अपने ही घर में संघर्ष कर रही थी। जब स्टीव बल्लेबाज़ी करना आया तो हम सबने एक लाइन में खड़े होकर उसके सम्मान में गार्ड ऑफ ऑनर दिया। पर हमने फील्ड में उसे एक इंच ज़मीन भी नहीं दी।इस काम में विकेटकीपर पार्थिव पटेल ने सबसे सक्रिय योगदान किया। बल्लेबाज़ के आसपास नज़दीकी क्षेत्ररक्षक रखना भी हमारी योजना का हिस्सा था। यह काम भी कर रहा था, तपे तपाए महान खिलाड़ी स्टीव वॉ ने भी अपना आपा खो दिया और पार्थिव से उलझ पड़ा। लेकिन स्टीव एक चैंपियन था तो चैंपियन की तरह ही उसने ऑस्ट्रेलिया की नैया पार लगा दी।श्री डालमिया ने मुझे एक दिन सुबह फोन कर घर बुलाया, क्योंकि उन्हें एक आवश्यक चर्चा करनी थी। उन्होंने मुझे बताया कि ग्रेग के भाई इयान चैपल भी यह मानते थे कि ग्रेग भारतीय टीम के लिए सही व्यक्ति नहीं होंगे। उनकी इस बात पर मुझे कोई संदेह नहीं था क्योंकि इयान चैपल और डालमिया जी की बहुत गहरी दोस्ती थी।

इसके बावजूद, सारी चेतावनियों को दरकिनार कर, मैंने अपने दिल की सुनने का फैसला किया। इसके बाद जो हुआ वह सबको पता है। पर क्या करें यही जीवन है। ज़िंदगी की किताब में कुछ पन्ने आपके लिए रोचक होते हो जैसे कि ऑस्ट्रेलिया का दौरा। वहीं कुछ अरुचिकर होते है, जैसे ग्रेग चैपल अध्याय। मैंने उस देश को जीत लिया पर उसके नागरिकों में से एक को नहीं जीत सका।

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