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शाह का बेड़ा बहुत धीमी रफ्तार से  कड़ा  की ओर बढ़ रहा था. बेड़े में एक छोटी बख्तरबंद सेना भी शामिल थी . इस सेना की कमान अहमद छप के हाथों में थी. सफर की शुरूआत से पहले ही, अहमद छप ने बड़ी सेना को शामिल करने की बहुत वकालत की थी.

” हमारे बादशाह की ​हिफाजत बेहद अहम है. क्योंकि वहां हर जगह गद्दार बैठे हैं . ” उसने कहा था.

” तुम तो किसी बूढ़ी दाई की तरह बात कर रहे हो.” जलालुद्दीन खिलजी ने बड़ी खामोश मुस्कुराहट के साथ कहा था. खिलजी ने गुलाम वंश के साथ खूनी संघर्ष को अंजाम दिया था और बलबन के वशंजों को खाक में मिला दिया था.

” तुम तो मेरे दिमाग में यह बात बिठाना चाहते हो कि मुझे अपने साये तक से खतरा है! और ये खतरा इतना ज़्यादा है कि तुम हर जगह मेरे चारों ओर अंगरक्षकों को तैनात कर दोगे .  . . उस समय भी अंगरक्षक मुझे घेरे रहेंगे जब मैं हग मूत रहा होउंगा या . . .  जब मैं किसी हसीना की जवानी का रस चूस रहा होउंगा!

उसकी उम्र करीब 70 साल रही होगी लेकिन शाह के नैन नक्श अब भी बहुत कशिश लिए हुए थे . उसका कद मझौला था और शरीर वैसा ही छरहरा था, जैसा कभी उस दौर में रहा होगा जब सेना में उसका सितारा बुलंदी पर रहा होगा. वह थोड़ा लगड़ा कर चलता था और जंगों ने उसके शरीर पर कई घावों के निशान छोड़ दिए थे . इसलिए जब वह लगड़ा कर चलता तो उसके शरीर की बनावट से लोगों को ऐसा लगता था कि वह कमज़ोर पड़ गया है .

छप का चेहरा पत्थर की तरह सपाट था . वह जानता था कि एक बादशाह के साथ उसके बेसिर पैर के नखरों को भी झेलना पड़ता है . बादशाह की बात से उसे कोई हंसी नहीं आई . लेकिन उसे यह भी पता था कि बादशाह की जान पर जो खतरा था, उसे नज़रंदाज़ करना भी कोई समझदारी नहीं थी.

जलालुद्दीन, छप की पेशानी पर होती हरकत को समझ गए और एक लंबी सांस ली. उन्होंने करीब छह साल तक बड़े ही खामोशी के साथ इस बेहतरीन तरीके से गद्दी संभाली थी कि वह काबिले तारीफ था . ऐसे में वह उन लोगों को कतई पसंद नहीं करते थे जो उनकी कामयाबियों को कमतर करने की जुर्रत करते थे . इसके बावजूद, उन्होंने अपने सामने खड़े उस शख्स से कुछ कहना चाहा जो उनका खैरख्वाह था:

” अलाउद्दीन मेरे बेटे के जैसा है . उसने मुझे कभी शक करने की कोई वजह नहीं दी. ” उन्हें अपनी कही बात ही अपने कानों में एक तसल्ली की तरह सुनाई दे रही थी. एक इंसान के तौर पर वह दिल का साफ सैनिक था और वह कभी एक शहंशाह की तरह बर्ताव करना नहीं सीख पाया.

जलालुद्दीन ने अपनी बात जारी रखी,” वो मेरी प्यारी बेटी का अच्छा शौहर साबित हुआ है, हालांकि अल्लाह मुझे मुआफ करे, हर गुज़रते दिन के साथ वो अपनी अम्मी जैसी दिखने लगी है . इसके बावजूद वह खुद पर काबू किए हुए है और अब भी उतना ही प्यार करता है . मुझे अल्लाउद्दीन खिलजी जैसा बहादुर या इज़्ज़तदार शख्स कोई नज़र नहीं आता.और उसके दुश्मन उसके बारे में जो चाहे कहते हों लेकिन उस सबके बावजूद वो लालची नहीं है .

बादशाह के दरबारियों ने बड़ी बेचैनी से पहलू बदला.

इतना ज़हीन और नेकदिल होने के बावजूद कोई कैसे सच्चाई से आंखें मूंद सकता है ?

छप को हैरत हुई और उसने बड़ी मुश्किल से अपने गुस्से को पीने की कोशिश की. वह चाहते थे कि शाह को अलाउद्दीन की ओर से बढ़ते खतरे को लेकर आगाह किया जाए लेकिन उनकी हैसियत न थी कि वे कोई बहस कर पाते . अलाउद्दीन खिलजी ज़ाहिर तौर पर एक खतरनाक इंसान था . निश्चित तौर पर उसे बादशाह की बेटी से कोई मोहब्बत न थी . बरसों से उसके दिल में दिल्ली के तख्त को पाने की आग सुलग रही थी . हर कोई इस बात से वाकिफ था, लेकिन बादशाह नहीं . अलाउद्दीन ने न सिर्फ बादशाह की मंज़ूरी के बिना देवगिरी पर आक्रमण करने की जुर्रत की थी बल्कि दिल्ली तलब किए जाने के आदेश की नाफरमानी भी की थी. उल्टे उसने किसी न किसी तरह से खुद बादशाह को कारा आने के लिए राज़ी कर लिया था, यह कहकर कि ढहते साम्राज्य के लूट के माल में से कुछ हिस्सा बादशाह को दिया जाएगा.

बस एक ही बात समझ में नहीं आ रही थी कि शाह को अलाउद्दीन के बिछाया जाल क्यों नहीं नज़र आ रहा था? अलाउद्दीन की लूटे हुए खज़ाने में से शाह को हिस्सा देने की कोई मंशा नहीं थी. कायदे से तो शाह ही उस दौलत के असली हकदार थे.

” बादशाह सलामत, आप अपने फैसले पर संदेह क्यों नहीं करते!” छप ने एक बार फिर से बात छेड़ने की कोशिश की. ” एहतियात बरतना ठीक रहता है. मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि हर समय सशस्त्र सैनिक आपके चारों ओर रहेंगे और हम पूरी ताकत से कारा की ओर बढ़ रहे हैं . आप दिल्ली के शाह हैं . ”

जलालुउद्दीन की त्यौरियां चढ़ गईं . हां , वह बूढ़े और कमज़ोर हो गए हैं लेकिन क्या ये सब लोग यही सोचते हैं कि वह मूर्ख भी हैं ? वह उनकी बात समझ रहे थे और उन्हें साफ नज़र आ रहा था कि उनके भतीजे पर उन लोगों को यकीन नहीं है . ये लोग पहले भी उनके कानों में महान दरवेश सिद्दी मौला के बारे में इसी तरह की ज़हरबुझी बातें घोल चुके हैं.

लेखिका अनुजा चंद्र्मौली की किताब रानी पद्मावती से  से प्रकाशित.

 

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