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साल 1980 की चुनावी जीत के पांच महीने बाद ही संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में मौत हो गई। इंदिरा एकदम बिखर गईं। इसी के बाद से उनकी पैनी राजनीतिक दृष्टि और दृढ़ संकल्प क्षीण पड़ते प्रतीत होने लगे। उनके प्रधानमंत्री काल के आखिरी वर्ष में देश के अनेक अंचलों में हिंसक संघर्ष छिड़ गए थे। उन्होंने ऑपरेशन ब्लूस्टार चलाने यानी अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में छिपे खालिस्तानी आतंकवादियों को निकाल बाहर करने के लिए सेना को उसके भीतर जाने की अनुमति दी। उनके इसी निर्णय के कारण 31 अक्टूबर, 1984 को उनकी हत्या हुई।

संजय की मौत के बाद पुपुल जयकर को उनके चेहरे पर ‘घोर अकेलापन, गहरी निराशा दिखाई दी…दोनों हाथों से अपने पेट को थामे उनका चीत्कार गूंजा, ‘अब यहां से मैं कहां जाऊं?’’ राजीव को इंदिरा द्वारा ज्योतिषियों और कर्मकांडों में उलझ जाने पर चिंता होने लगी। हालांकि ज्योतिषियों से सलाह लेने के बावजूद वे उनकी निरर्थकता पर दोनों हाथ उठाकर गुस्सा जतातीं, ‘किस काम के हैं ये? क्या ये संजय को बचा पाए? यदि मैं मर जाती तो भी ठीक था। मेरी उम्र 60 साल से ज्यादा हो चुकी है, मैं जीवन को भरपूर जी चुकी हूं, मगर संजय की तो इतनी कम उम्र थी!’ जीवन की अनिश्चितता से झटका खाने के बाद मनुष्य युगों से धर्म द्वारा जताई जाने वाली निश्चितता के शरणागत होता रहा है, इसलिए उन्होंने भी वही किया। इसके बावजूद अंततः अनुष्ठान और तंत्र-मंत्र उथल-पुथल को दूर नहीं कर पाए। निरीश्वरवादी नेहरू कहीं अधिक मजबूत मिट्टी से बने थे, उन्होंने अपने राजनीतिक सहयोगियों पर भरोसा किया और राजनीतिक जमीन पर उनके पांव जमाने में उनकी मदद भी की थी। लेकिन किसी भी साथी पर भरोसा करने में असमर्थ, वे अब एक विमानन कंपनी में पायलट अपने बड़े बेटे राजीव में अपना उत्तराधिकारी तलाशने लगीं। ऐसा करके उन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र पर एक और गहरी चोट की।

राजनीति में आने के प्रति राजीव हमेशा अनमने रहे, लेकिन अब बोले, ‘मुझे यह समझ में आया कि मम्मी की मदद हर हाल में करनी होगी’। नटवर सिंह याद करते हैं कि राजीव बेहद आशंकित थे। ‘उन्होंने कहा, मैं तो संजय जैसा नहीं हूं। मेरा वेतन गुज़ारे लायक ही है और मैं तो मोटर बाइक चलाता हूं। राजनीति के बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता।’ फिरोज़ के दोस्त भबानी सेनगुप्ता को फॉक यह कहते हुए उद्धृत करते हैं, ‘इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है कि बच्चे के रूप में अथवा बड़े होने पर भी राजीव को अपनी मां का विशेष प्यार अथवा देखभाल हासिल हुई हो। लेकिन वे अपने पिता के चहेते थे और प्रौद्योगिकी के प्रति उनके मन में जिज्ञासा पैदा हो गई थी।’ डॉ. माथुर को राजीव सभ्य, अपने काम के प्रति समर्पित और दयालु व्यक्ति के रूप में याद हैं। लेकिन संजय की तुलना में, अनुरागी डॉक्टर को भी, उन्हें ‘राजनैतिक अनाड़ी’ बताना पड़ा। गांधी परिवार द्वारा उत्तर बंगाल की सैर पर आने के दौरान भास्कर घोष एक वाकया याद करते हैं कि जब गांधी परिवार को लिए विमान हवाई अड्डे पर उतरा और वे उससे बाहर निकले तो संजय को फौरन नारे लगाते युवा कांग्रेसियों ने घेर लिया। घोष यह सब देख ही रहे थे कि किसी ने उनके कंधे को नरमी से टटोला। वो, अपनी पत्नी सोनिया और बच्चों को अपने रक्षा घेरे में समेटे हुए राजीव थे। उन्होंने कहा, ‘माफ कीजिए, कृपया बताइए, हमें कोई कार मिल जाएगी? मेरा परिवार और मैं इस राजनीतिक तमाशे से जल्द से जल्द दूर होना चाहते हैं।’

संजय की मौत और राजीव की उन्नति ने प्रधानमंत्री निवास में मौजूद एक अन्य शख्सियत को भी ठिकाने लगा दिया। वह था – धीरेंद्र ब्रह्मचारी, ऊंचा-पूरा, सुगठित योग गुरु जो लंबे घने बाल और कुटिल भंगिमा लिए तीखे नाक-नक्श, निर्वस्त्र बदन वाला, रूसी धर्मोपदेशक रास्पुतिन जैसा व्यक्ति था। उसकी इंदिरा तथा नेहरू के घर में 1950 के दशक से ही योग गुरु के रूप में पैठ बन गई थी। आपातकाल के दौरान ब्रह्मचारी के भी दिन फिर गए थे जिसका फायदा उठाकर उसने दिल्ली तथा कश्मीर में योग केंद्र खोल लिए थे। उसने विमानन कंपनी खोलकर निजी विमान भी खरीद लिया और यह कानाफूसी आम थी कि वो सरकार में कोई भी चमत्कार करवा सकता था। यह बात दीगर है कि उस चमत्कार का आधार उसकी आध्यात्मिक शक्ति नहीं बल्कि प्रधानमंत्री निवास में उसकी एकदम सामयिक आमदोरफ्त था।

मृदुभाषी और खूबसूरत राजीव गांधी धीरे-धीरे अपनी मां के सलाहकार के रूप में संजय की जगह लेने लगे। राजीव के दोस्त और सलाहकार, सफाचट, दून स्कूल में पढ़े उनके जैसे ही विभिन्न पेशों में कार्यरत राजीव के रिश्ते के भाई अरुण नेहरू और सहपाठी रहे अरुण सिंह थे। वे लोग संजय के कुर्ताधारी राजनीतिक पिट्ठुओं से एकदम अलग थे जिसकी वजह से उन्हें प्रशंसात्मक तुलना मिली ‘संजयज गून्स एंड राजीव्ज दून्स’ यानी संजय के गुंडे और राजीव के दूनिए। राजीव ने एशियाई खेलों के इंतजाम का जिम्मा संभाल लिया था जिनका दिल्ली में 1982 में आयोजन हुआ। खेलों का आयोजन दरअसल समय के मुकाबले दौड़ लगाने जैसा था लेकिन उनका आयोजन खूब सफल रहा। एशियाड-1982 ने दुनिया को भारत की झांकी दिखाई और उसके आयोजन में राजीव को सार्वजनिक जीवन में काम करने का बहुमूल्य अनुभव भी हासिल हुआ।‘भारत की उड़न परी’ धावक पी. टी. उषा ने अपनी प्रतिभा से खेलों में चार चांद लगा दिए। वो सबके मन पर छा गईं और खेलकूद में पहली देसी नायिका ने एशियाई खेलों में भारत का नाम रौशन कर दिया।

विशाल खेलकूद कार्यक्रम का आयोजन तो फिर भी गनीमत था मगर भारत को संभालना कहीं अधिक कठिन था। राजीव एक तो संजय जैसे नहीं थे और उपर से इंदिरा तब तक शोकग्रस्त मां तथा पोते से विछोह की पीड़ा झेलती दादी की मानसिकता में घिर कर अपनी उस अचूक राजनीतिक पकड़ से भी हाथ धोती जा रही थीं जिसका लोहा मन ही मन उनके विरोधी भी मानते थे। राजीव गांधी और अरूण नेहरू को आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में 1983 के विधानसभा चुनाव का जिम्मा सौंपते हुए इंदिरा गांधी ने दूसरा संजय तैयार करने की जल्दबाजी दिखाई। वे यह समझ ही नहीं पाईं कि राजनीति के अखाड़े में डटे घाघ बुजुर्ग नेता बड़ी आसानी से अराजनैतिक पूर्व विमान चालक को हाषिये पर धकेल देंगे। पत्रकार प्रेम भाटिया ने राजीव के दरबारियों के बारे में लिखाः ‘उन्हें राजनीति का ककहरा भी नहीं आता था और वे सोचते थे कि सत्ता गणित, कम्प्यूटर अथवा वर्ड प्रोसेसर थी जबकि यह गुण तो सन्निकट लड़ाई में किसी भी काम के नहीं थे।’

राजीव गांधी मन के साफ, तत्पर और काम करने को उत्सुक थे मगर उनके भीतर अपने छोटे भाई जैसी निष्ठुर राजनीतिक धार नहीं थी। उनके पास सीखने का समय था नहीं। उनकी मां ने अपने पिता के साथ करीब बीस साल राजनीति के गुर सीखे थे; संजय को इंदिरा ने लगभग एक दशक तक सबक सिखाए। लेकिन राजीव को तो बिना चेतावनी दिए गहरे पानी में पटक दिया गया था।उन्हें भारतीय राजनीति की पेचीदगियों से निपटने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा फिर भी वे यह समझ ही नहीं पा रहे थे कि कांग्रेस में मौजूद चापलूसी की संस्कृति से कैसे निपटें। इसका सबसे मौजूं उदाहरण आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री टी अंजैया को उनके द्वारा अपमानित किए जाने से संबंधित है। उन्होंने, अंजैया को मसखरा तक कह डाला था क्योंकि उन्होंने 1982 में हवाई अड्डे पर राजीव के जबरदस्त स्वागत का इंतजाम किया था। इस घटना को विपक्ष ने तेलुगु अस्मिता के अपमान से जोड़ दिया जिसकी इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई कि कुछ ही महीनों में तेलुगु फिल्मी सितारे और जननायक नंदमूरि तारक रामाराव – एनटीआर – बड़ी तेजी से प्रदेश के राजनीतिक पटल पर छा गए।

असम से पंजाब तक घरेलू मोर्चे पर संकटों के बीच अनिच्छुक और नौसिखिए राजीव को राजनीति में घसीट कर इंदिरा ने तात्कालिक यथार्थ के प्रति भीषण लापरवाही और अपनी आंखें मूंद लेने का रवैया जताया।

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