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मैं चाय-परांठा लेकर खड़ा था कि उधर से गुज़रते हुए एक छात्र ने कहा , ‘कैसे प्रेसीडेंट हो? उधर साबरमती ढाबे पर मारपीट हो रही है और तुम यहां चाय पी रहे हो?’

मैंने उससे कहा, ‘मारपीट बंद कराना प्रेसीडेंट का काम है क्या? यह तो सिक्योरिटी गार्ड का काम है.’

उसने बताया कि यह आम मारपीट नहीं थी – एबीवीपी साबरमती ढाबे पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम केआयोजकों को परेशान कर रहा है. इतने में मैंने अपने ही होस्टल, ब्रह्मपुत्र, में रहने वाले एबीवीपी के एक लड़के को दौड़ कर जाते हुए देखा. उसकी तेज़ी से मुझे इस मामले की गंभीरता का अंदाज़ा लगा. मैं भी साबरमती की तरफ़ चल पड़ा.

ढाबे के पास खड़े एबीवीपी के लोग नारे लगा रहे थे: ‘खून से तिलक करेंगे, गोलियों से आरती. पुकारती पुकारती मां भारती पुकारती.’

मुझे देख कर एबीवीपी का एक कार्यकर्ता मेरी तरफ़ आया और व्यंग्य करते हुए बोला, ‘कहां हैं प्रेसीडेंट साहब? देखिए क्या सब हो रहा है.’

जब मैंने उससे पूछा कि क्या हो रहा है, उसने जवाब दिया, ‘अफज़ल गुरु की बरसी मनाई जा रही है.’

मुझे उस पर यकीन नहीं आया. 2001 में हुए संसद हमले में भागीदार होने के आरोपी अफज़ल गुरु को जेल में रखा गया था और बाद में फांसी दे दी गई थी.

मैंने कहा कि कोई अफज़ल गुरु की बरसी क्यों मनाएगा. वह फौरन बोला, ‘यहां एक सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा गया था. हम उसका विरोध कर रहे हैं.’

मैंने कहा कि अच्छा है, विरोध करो. लेकिन मुझे बताया गया कि मारपीट हो रही है. उसने जवाब दिया कि मारपीट नहीं हो रही है. हम यहां शांति से खड़े होकर विरोध कर रहे हैं.

करीब पचास मीटर की दूरी पर छात्र गोल घेरा बना कर खड़े थे. वे कुछ कर नहीं रहे थे. घेरे के भीतर एक लड़की हाथ में किताब लिए एक बेंच पर खड़ी थी और वहां जुटे लोगों से कुछ कह रही थी. मैंने आसपास नज़र दौड़ाई. वहां पुलिस की एक गाड़ी खड़ी थी और कुछ पुलिसकर्मी सादी वर्दी में खड़े थे.

इतने में वहां जुटे छात्रों का जुलूस सड़क पर आया और गंगा ढाबा की तरफ़ बढ़ने लगा. एबीवीपी के लोगों ने उनको रोकने की कोशिश की. मैंने सिक्योरिटी गार्डों को कहा कि वो एक चेन बना कर दोनों समूहों को अलग करें और आपस में झगड़ा नहीं होने दें. वहां कोई झगड़ा नहीं हुआ. थोड़ी नोकझोंक हुई, लेकिन कोई टकराव नहीं हुआ. गंगा ढाबा पर वसंत कुंज थाना प्रभारी (एसएचओ) के साथ करीब सौ की संख्या में पुलिस वहां खड़ी थी. एक तरफ़ एबीवीपी लोग थे, दूसरी तरफ़ अन्य छात्रों का समूह था. दोनों तरफ़ से नारेबाज़ी हो रही थी- एबीवीपी मुर्दाबाद, गुंडागर्दी नहीं चलेगी, जेएनयू है छात्रों का, एबीवीपी की जागीर नहीं जैसे नारे एक तरफ़ से लग रहे थे.

एबीवीपी नारे लगा रहा था- जहां हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है, जो कश्मीर हमारा है वो सारा का सारा है, चीन के दलालों को धक्के मारो सालों को.

थाना प्रभारी ने मुझसे कहा कि मैं वहां जुटे लोगों से बात करूं और उन्हें वहां से जाने को कहूं. मुझे महसूस हुआ कि छात्रों में एबीवीपी के ख़िलाफ़ गुस्से को शांत करना है और तनाव को कम करने का तरीका निकालना है. मुझे पता नहीं था कि कार्यक्रम में क्या हुआ था और क्या नारे लगे थे. लेकिन अपने अनुभव से मुझे यह ज़रूर पता था कि एबीवीपी उन कार्यक्रमों को रोकने की कोशिश करता है, जो उसकी विचारधारा के ख़िलाफ़ होते हैं. मुझे यह भी महसूस हुआ कि कार्यक्रम आयोजित करना उसके आयोजकों का लोकतांत्रिक अधिकार था, भले ही मैं उससे सहमत नहीं हूं.

मैंने कहा कि आरएसएस के जनवरी-फरवरी (नौनिहालों) एबीवीपी के लोगों को गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है. आख़िर बेचारे वे क्या करेंगे. अच्छे दिनों की उम्मीद में उन्होंने भाजपा को वोट दिया. अच्छे दिन तो आए नहीं. अब वे इसलिए उछल-कूद कर रहे हैं कि कम से कम एडहॉक लेक्चरशिप मिल जाए. इतनी बेरोज़गारी है, इसलिए ऐसा करना इन बेचारों की मजबूरी है.

मैंने एबीवीपी का मज़ाक बनाने की कोशिश की. इससे छात्रों के बीच तनाव कम हुआ. यही मैं चाहता था. इसके बाद मैंने देश के अंदर चल रही व्यापक राजनीति और अपने नए वीसी पर तंज़ किया, जिसको भाजपा ने नियुक्त किया था. वहां आए लोग धीरे-धीरे लौट गए.

सिक्योरिटी गार्डों ने मुझे विस्तार से बताया. उन्होंने बताया कि छात्रों ने अफज़ल गुरु की असंवैधानिक तरीके से की गई हत्या पर सवाल उठाते हुए एक सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा था. प्रशासन ने उसकी अनुमति रद्द कर दी थी. लेकिन आयोजकों ने कार्यक्रम करने का फैसला किया था. माइक नहीं लगाए जा सके, पोस्टर नहीं लगाने दिया गया. इसलिए उन्होंने बिना माइक के ही कविताएं पढ़ीं. फिर उन्होंने एक जुलूस निकाला. एबीवीपी ने इन सबको रोकने की कोशिश की.सभी संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि यूनियन को जाकर पता करना चाहिए कि मामला क्या है? इसमें पुलिस की बात कहां से आ गई? हममें से करीब दस लोग थाने गए. वहां एबीवीपी के लोग पहले से मौजूद थे. जब मैंने पूछा कि वे वहां क्या कर रहे थे, उन्होंने बताया कि वो मारपीट की शिकायत दर्ज़ कराने आए हैं.

मैंने उनसे कहा कि कोई मारपीट तो हुई नहीं थी. अगर उन्हें कार्यक्रम से शिकायत थी तो वे जेएनयू प्रशासन से शिकायत कर सकते थे. ऐसी तो कोई घटना नहीं हुई थी जिसमें पुलिस की दखल की ज़रूरत पड़े.

अगली सुबह एक फोन कॉल ने मुझे जगाया, जो अलार्म की तरह हर सुबह मुझे जगाता है. यह एक टीवी चैनल से था. वे जेएनयू में अफज़ल गुरु की बरसी मनाने और राष्ट्र-विरोधी नारे लगाए जाने पर मेरी राय पूछ रहे थे. राष्ट्र-विरोधी नारे? जेएनयू में? यह सुनकर मैं हैरान हुआ. दूसरी तरफ़ से कहा गया कि ऐसा सचमुच हुआ था और वे फोन पर मेरा इंटरव्यू लेना चाहते थे. मैं तैयार हो गया. कॉल ट्रांस्फर हुआ.

वही सवाल दोहराया गया. मैंने भी वही बात कही जो मैं कह चुका था – कि जेएनयू में अफज़ल गुरु की बरसी नहीं मनाई गई थी और अगर किसी ने राष्ट्र-विरोधी नारे लगाएं हैं तो मैं इसकी कड़े शब्दों में निंदा करूंगा. पहले की तरह इस बार भी एबीवीपी इसको गढ़ रहा है. छात्रों के हकों के लिए लड़ने के बजाए यह कैंपस में सरकार केजासूस की तरह काम कर रहा है.

इसके बाद लगातार टीवी चैनलों के फोन आते रहे. शुरू में सब फोन पर ही मुझसे बात कर रहे थे, कि न्यूज़24 चैनल ने ‘5 की पंचायत’ नाम के शो के लिए मुझे स्टूडियो बुलाया. जल्दी ही कई चैनल उसी स्लॉट में मुझे अपने स्टूडियो में बुलाने लगे. मैं अब थोड़ा चिंतित होने लगा था कि मामला क्या है. दरअसल मैं टीवी नहीं देखता हूं. होस्टल में एक कॉमन टीवी है, लेकिन उसे देखने का वक़्त नहीं मिलता है. तब मेरे कमरे में इंटरनेट नहीं था और मैंने उस दिन का अखबार भी नहीं देखा था.

मुझे स्टूडियो ले जाने के लिए जब न्यूज़24 की गाड़ी आई तो मुझे बताया गया कि उसी बहस में एबीवीपी का एक प्रतिनिधि भी आएगा और मुझसे पूछा गया कि क्या उसके साथ एक ही कार में जाने में मुझे कोई दिक्कत थी. मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं थी.

उसको लेने के लिए गाड़ी प्रशासनिक भवन के पास पहुंची. वहां एबीवीपी जेएनयू प्रशासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते हुए मांग कर रहा था कि कार्यक्रम के आयोजकों पर कार्रवाई की जाए. वो गाड़ी में बैठा. बातें करते हुए हम चैनल के लिए रवाना हुए. उसके पास चने थे. उसने मुझे भी चने खिलाए. मुझे मालूम नहीं था कि आज जो लड़का मुझे चने खिला रहा था, उसकी सरकार मुझे जेल के चने खिलाने की तैयारी में थी.

चैनल में हिंदू महासभा का एक आदमी और कांग्रेस का नेता बैठा था. वहीं मैंने पहली बार 9 फरवरी का वीडियो देखा, जो सब जगह भेजा जा रहा था और जिसने मीडिया में एक उन्माद पैदा कर दिया था. भारत पर हमला करने और कश्मीर की आज़ादी की लड़ाई का समर्थन करने वाले नारे लगाए जा रहे थे. मुझे विश्वास नहीं हुआ कि यह जेएनयू में हुआ था. मैंने कहा कि मुझे भरोसा नहीं है कि ऐसी नारेबाज़ी जेएनयू में हो सकती है. दूसरे, अगर यह हुआ भी है तो मैं इसका समर्थन नहीं करता. लेकिन मैंने यह सवाल भी किया कि एबीवीपी क्यों इस पूरे मामले को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहा था. यह कैंपस का माहौल ख़राब करने और जेएनयू को बदनाम करने की एक कोशिश थी.

मुझे यह साफ़ हो गया कि यह जेएनयू पर हमला है. एबीवीपी पहले से ही चाहता रहा है कि गरीब पढ़ाई न कर सकें. क्योंकि तीन हज़ार कमाने वाले के बेटे और बेटियां अगर पीएचडी करेंगे तो सवाल करेंगे जिसका जवाब देना मुश्किल होगा. उन्हीं दिनों रोहित वेमुला के इंसाफ के लिए एक आंदोलन चल रहा था और साफ़ तौर पर उसे भटकाने के लिए फर्जी ‘राष्ट्रवाद’ का मुद्दा गढ़ा जा रहा था.

बहस ख़त्म हुई. अभी मैं स्टूडियो में ही था कि ज़ी न्यूज़ का एक आदमी दौड़ा-दौड़ा आया कि मैं बस दस मिनट के लिए उसके चैनल में चले चलूं. जब मैं वहां पहुंचा, ज़ी न्यूज़ पर चर्चा शुरू हो चुकी थी. एंकर जिस तरह से बोल रहा था, उसमें वह खुद ही गवाह, मुद्दई, और जज बना हुआ था. मैंने सबसे पहले उसी से सवाल किया – आपको तनख्वाह कौन देता है, ज़ी न्यूज़ या आरएसएस? इस कार्यक्रम तक आते-आते मुझे उस वीडियो को लेकर संदेह होने लगा था. हालांकि 9 फरवरी की रात को मैंने गंगा ढाबा पर ज़ी न्यूज़ के कैमरामैन को देखा था. उन्होंने कुछ रॉ वीडियोज़ लिए होंगे. लेकिन रॉ तो रॉ होता है- वो असली होता है. चैनल पर जो दिखाया जाता है, उसे संपादित किया जाता है और उसमें छेड़छाड़ की जा सकती है.

फेसबुक और व्हाट्सअप पर मुझे गालियां देने का सिलसिला शुरू हो गया था. अनजान नंबरों से मुझे गालियां देते हुए लगातार कॉल आ रहे थे. इन लोगों के नाम अजीब-अजीब होते जैसे ‘भक्त’, ‘ओल्ड मॉन्क’. उस रात मेरे फोन पर कोई भी कॉल नहीं आया मुझे संदेह हुआ कि या तो कंपनी ने मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया था या फिर नेटवर्क जाम हो गया था.

अगले दिन, 11 फरवरी को जेएनयू छात्र संघ ने दो काम किए गए. हमने एक पर्चा निकाला, जिसमें दिखाए जा रहे वीडियो के आधार पर नारों की निंदा की गई थी. हमने एबीवीपी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया और कहा कि जेएनयू एक प्रगतिशील विश्वविद्यालय है, इसलिए एबीवीपी जानबूझ कर जेएनयू को नुकसान पहुंचाना चाहता है और इसके भीतर और बाहर बदमाशी कर रहा है.

मेरा मोबाइल चेक करो साथियो. मेरी मां और बहन को भद्दी-भद्दी गालियां दी जा रही हैं. तुम कौन सी भारत माता की बात करते हो? अगर तुम्हारी भारत माता में मेरी मां शामिल नहीं है तो मुझे ये भारत माता का कॉन्सेप्ट मंज़ूर नहीं है.

मेरी मां आंगनबाड़ी सेविका है, उसके 3000 से हमारा घर चलता है. और ये उसके ख़िलाफ़ गालियां दे रहे हैं. मुझे शर्म है इस देश पर. इस देश के अंदर जो गरीब, मज़दूर, दलित किसान हैं उनकी माताएं भारत माताएं नहीं हैं. मैं कहूंगा जय, भारत की माताओं की जय, पिताओं की जय, माताओं, बहनों की जय, किसानों, मज़दूरों, दलितों आदिवासियों की जय. मैं कहूंगा, तुममें हिम्मत है तो बोलो इंकलाब ज़िंदाबाद, बोलो भगत सिंह ज़िंदाबाद, बोलो सुखदेव ज़िंदाबाद, बोलो अशफाक उल्ला खां ज़िंदाबाद, बोलो बाबासाहेब ज़िंदाबाद, तब हम मानेंगे तुम इस देश पे भरोसा करते हो.

तुम बाबासाहेब की 125वीं जयंती मनाने का नाटक कर रहे हो, है तुममें हिम्मत तो सवाल उठाओ जो बाबासाहेब ने उठाया कि इस देश के अंदर जातिवाद सबसे बड़ी समस्या है. बोलो जातिवाद पर, लाओ प्राइवेट सेक्टर में रिज़र्वेशन, तमाम जगह रिज़र्वेशन को लागू करो, तब हम मानेंगे कि तुमको इस देश पर भरोसा है.

ये देश तुम्हारा कभी नहीं था और कभी नहीं हो सकता. कोई देश अगर बनता है तो वहां के लोगों से बनता है. अगर देश की अवधारणा में भूखे लोगों के लिए जगह नहीं है, गरीब मज़दूरों के लिए जगह नहीं है तो वह देश नहीं है.

कल मैं टीवी डिबेट में यह बोल रहा था कि ये गंभीर समय है. मुल्क में फासीवाद जिस तरीके से आ रहा है, मीडिया भी सुरक्षित नहीं रहने वाला है. उसके भी स्क्रिप्ट संघ के ऑफिस से लिखकर आएंगे और जैसे कभी इंदिरा गांधी के समय में कांग्रेस के ऑफिस से आते थे.

मीडिया के कुछ साथी कह रहे थे कि हमारे टैक्स के पैसे से, सब्सिडी के पैसे से जेएनयू चलता है, हां सच है कि जेएनयू सब्सिडी के पैसे से चलता है, लेकिन ये सवाल खडा करना चाहता हूं: यूनिवर्सिटी होती किसलिए है? यूनिवर्सिटी होती है कि समाज के अंदर जो “कॉमन कन्साइंस” है, उसका क्रिटिकल एनालिसिस किया जाए. अगर यूनिवर्सिटी इस काम में फेल होगी तो कोई देश नहीं बनेगा, अगर इस देश में लोग शामिल नहीं होंगे तो यह सिर्फ़ और सिर्फ़ पूंजीपतियों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ लूट और शोषण की चरागाह बन करके रह जाएगा.

छोड़ दो पाकिस्तान और बांग्लादेश की बात. हम कहते हैं दुनिया के गरीबों एक हो. दुनिया के मज़दूरों एक हो. दुनिया की मानवता ज़िंदाबाद. भारत की मानवता ज़िंदाबाद.

जो इस मानवता के ख़िलाफ़ खड़ा है, हम उसको आज आइडेंटिफाई कर चुके हैं. आज यही हमारे सामने सबसे गंभीर सवाल है कि उस आइडेंटिफिकेशन को हमको बनाकर रखना है. वो जो चेहरा है जातिवाद का, वो जो चेहरा है मनुवाद का, वो जो चेहरा है ब्राह्मणवाद का और पूंजीवाद के गठजोड़ का, उस चेहरे को हमको एक्सपोज़ करना है और सचमुच का लोकतंत्र, सचमुच की आज़ादी, सबकी आज़ादी इस देश में हमको स्थापित करनी है. और वो आज़ादी आएगी और संविधान से आएगी, पार्लियामेंट से आएगी, लोकतंत्र से आएगी और संसद से आएगी.

आप सब तमाम साथियों से अपील है कि तमाम तरह के डिफरेंसेज़ (मतभेद) रखते हुए जो हमारा फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन है, जो हमारा कांस्टिट्यूशन है, जो हमारा मुल्क है उसकी एकता के लिए हम लोग एकजुट रहेंगे. एकमुश्त रहेंगे (उनके ख़िलाफ़) जो देश तोड़ने वाली ताकतें हैं, आतंकियों को पनाह देने वाले लोग हैं.

दोस्तो, बहुत गंभीर परिस्थिति है. किसी भी तौर पर जेएनयूएसयू किसी भी हिंसा का, किसी भी आतंकवादी का, किसी भी आतंवादी घटना का, किसी भी देशविरोधी एक्टिविटी (गतिविधि) का समर्थन नहीं करता. कुछ अनआइडेंटिफाई (नहीं पहचाने गए) लोगों ने जो ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे लगाए हैं, जेएनयूएसयू एकबार फिर से कड़े शब्दों में उसकी भर्त्सना करता है.

साथ ही साथ एक सवाल आप सब लोगों से शेयर करते हुए. ये सवाल है जेएनयू एडमिनिस्ट्रेशन (प्रशासन) और एबीवीपी के लिए, इस कैंपस में हज़ार तरह की चीज़ें होती हैं. अभी आप ध्यान से एबीवीपी का स्लोगन सुनिए. ये कहते हैं ‘कम्युनिस्ट कुत्ते.’ ये कहते हैं ‘अफज़ल गुरु के पिल्ले.’ ये कहते हैं ‘जिहादियों के बच्चे.’ आपको नहीं लगता कि अगर इस संविधान ने हमको नागरिक होने का अधिकार दिया है तो मेरे बाप को कुत्ता कहना मेरे संविधानिक अधिकारों का हनन है कि नहीं? ये सवाल मैं एबीवीपी से पूछना चाहता हूं.

ये सवाल पूछना चाहता हूं जेएनयू एडमिनिस्ट्रेशन से कि आप किसके लिए काम करते हैं? किसके साथ काम करते हैं और किसके आधार पर काम करते हैं? ये बात आज बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि जेएनयू प्रशासन पहले परमिशन देता है, फिर नागपुर से फोन आने के बाद परमिशन लेता है. ये जो परमिशन लेने देने की प्रक्रिया है, ये उसी तरह से तेज़ हो गई है इस मुल्क में, जैसे फेलोशिप को लेने और देने की प्रक्रिया है. पहले आपको फेलोशिप बढ़ाने के घोषणा होगी फिर कहा जाएगा कि फेलोशिप बंद हो गई है. ये संघी पैटर्न है, ये आरएसएस और एबीवीपी का पैटर्न है. जिस पैटर्न से वो मुल्क को चलाना चाहते हैं. और इसी पैटर्न से वो जेएनयू एडमिनिस्ट्रेशन को चलाना चाहते हैं.

हमारा सवाल है जेएनयू के वाइस चांसलर से कि (9 फरवरी के कार्यक्रम का) पोस्टर लगा था जेएनयू में बाकायदा. पर्चे आए थे मेस में. अगर दिक्कत थी तो जेएनयू एडमिनिस्ट्रेशन पहले परमिशन नहीं देता. अगर परमिशन दिया तो किसके कहने से परमिशन कैंसिल किया? ये बात जेएनयू एडमिनिस्ट्रेशन क्लियर करे.

साथ ही साथ. ये जो लोग हैं, इनकी सच्चाई जान लीजिए. इनसे नफ़रत मत कीजिएगा क्योंकि हम लोग नफ़रत कर नहीं सकते. इनसे मुझे बड़ा ही दया भाव है. ये इतने उछल रहे हैं, क्यों? इनको लगता है जैसे (एफटीआईआई में) गजेंद्र चौहान को बिठाया है, वैसे हर जगह चौहान, दीवान, फरमान ये जारी कर देंगे. चौहान, दीवान और फरमान की बदौलत ये हर जगह नौकरी पाते रहेंगे. इसीलिए ये जब ज़ोर से ‘भारत माता की जय’ चिल्लाएं तो समझ लीजिए परसों इनका इंटरव्यू डीयू में होने वाला है. नौकरी लगेगी, देशभक्ति पीछे छूट जाएगी. नौकरी लगेगी, फिर भारत माता का कोई ख्याल नहीं. तिरंगा को तो इन्होंने कभी माना ही नहीं, भगवा झंडा भी नहीं फहराएंगे.

मैं सवाल करना चाहता हूं कि कैसी देशभक्ति है? अगर एक मालिक अपने नौकर से सही बर्ताव नहीं करता, अगर किसान अपने मज़दूर से सही बर्ताव नहीं करता, अगर पूंजीपति अपने कर्मचारी से सही बर्ताव नहीं करता. और ये जो अलग अलग चैनलों के लोग हैं, 15-15 हज़ार रुपए में जो पत्रकार काम करते हैं, इनके जो सीईओ हैं, वो इनसे ठीक से बर्ताव नहीं करते हैं. कैसी देशभक्ति है?

जेएनयू ज़िंदाबाद था. जेएनयू ज़िंदाबाद रहेगा. इस देश के अंदर जितने भी संघर्ष हो रहे हैं, उन संघर्षों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेगा और इस देश के अंदर लोकतंत्र की आवाज़ को मज़बूत करते हुए, आज़ादी की आवाज़ को मज़बूत करते हुए फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन (अभिव्यक्ति की आज़ादी) की आवाज़ को मज़बूत करते हुए इस संघर्ष को आगे बढ़ाएगा, संघर्ष करेंगे, जीतेंगे और देश के गद्दारों को परास्त करेंगे, इन्हीं शब्दों के साथ आप तमाम लोगों से एकता की अपील करते हुए अपनी बात को ख़त्म करूंगा.

जय भीम, लाल सलाम.

प्रदर्शन ख़त्म होने के बाद मैंने कुछ और टीवी चैनलों को बाइट दी. उस रात यूनियन की तरफ़ से सभी संगठनों की एक बैठक बुलाई गई. इसका एजेंडा था कि कैंपस में शांति बनाए रखी जाए और उच्च स्तरीय जांच कमेटी का फैसला आने तक इंतज़ार किया जाए. रिपोर्ट आने के बाद हम अपना अगला दम उठाएंगे.

रास्ते में उन्होंने मुझसे मेरा मोबाइल फोन ले लिया. मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास एक दूसरा फोन भी है और उसे भी निकाल कर मैंने उन्हें दे दिया. थोड़ी दूर आगे जाने के पाद उन्होंने मेरा पर्स भी ले लिया. मैंने सोचा था कि वो लोग मुझे वसंत कुंज थाने ले जाएंगे. लेकिन हम हौज़ ख़ास की ओर बढ़ रहे थे. रास्ते में पुलिस को बार-बार कॉल आ रहे थे. वे आपस में कुछ बातें भी कर रहे थे, जिनका सिरा मैं नहीं समझ पा रहा था. एक बार उनमें ग़लत रास्ता ले लेने पर हल्की-सी नोकझोंक भी हुई, क्योंकि इस रास्ते पर थोड़ा जाम मिल रहा था.

आख़िर में हम लोदी रोड थाना के सामने रुके. उनमें से एक ने मुझे कपड़े से ढंकने की सलाह दी. वे तो मुझे सिर्फ़ ‘ज़रा पूछताछ’ के लिए ले जा रहे थे. इसलिए मैं हैरान हुआ कि वे मेरा चेहरा क्यों ढंक रहे हैं, लेकिन मैं अभी भी समझ नहीं पाया था कि क्या हो रहा था.

वे मुझे थाने के भीतर ले आए और एक छोटे-से कमरे में बिठा दिया. अब पूछताछ का सिलसिला शुरू हुआ. जो आदमी मुझे लेकर आया था, वो मुझसे ठीक से बात कर रहा था. लेकिन उसके बाद एक दूसरा आदमी आया. उसने बड़ी बदतमीज़ी से मुझसे कहा, ‘देश का खाता है और देश के ख़िलाफ़ नारे लगाता है?’

मुझे सुनकर बड़ा अजीब लगा. मैंने देश के ख़िलाफ़ नारे कब लगाए? मैं तो मोदी के ख़िलाफ़ नारे लगाता हूं और डंके की चोट पर लगाता हूं. मोदी अब देश हो गया है क्या?अब मुझे इसका अहसास होने लगा था कि कोई गंभीर गड़बड़ी थी. मैंने पूछा कि मुझे किस बात के लिए गिरफ़्तार किया है. गिरफ़्तारी वारंट कहां है?

‘वारंट मिलेगा तुम्हें जेल में,’ उसने कहा. ‘सब मिलेगा.’

उसके बाद उसने किसी से फोन पर बात की. उसने पूछा कि क्या वो मुझे गिरफ़्तार कर ले.

फोन रखने के बाद उसने मुझसे मेरे पिताजी का नंबर मांगा. फोन नंबरों के मामले में मैं कमज़ोर हूं. मुझे अपना नंबर भी याद नहीं रहता. लेकिन चूंकि पिताजी का फोन मेरे घर का पहला फोन था, इसलिए वह मुझे याद था. मेरे पिताजी को फोन करके पुलिस ने बताया कि मुझे ‘देशद्रोह’ के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया है.

पहली बार किसी ने मुझे मेरे ख़िलाफ़ आरोप के बारे में साफ़-साफ़ बताया था. इन कठोर शब्दों को सुनते हुए पहली बार मैं घबराया और भावुक हुआ. मेरे परिवार का खयाल मेरे दिमाग पर छा गया. मेरे चेहरे की रंगत देख कर अधिकारी ने सिपाही से पूछा कि मैंने खाना खाया था या नहीं. मैंने नहीं खाया था. उसने मुझे खाना खिलाने को कहा. मैंने खाना खाने से मना कर दिया. मैंने कहा कि मैं अनशन करूंगा.

किसी अदालत में मैं पहली बार गया था और यह फिल्मों से बहुत अलग थी. जज आए तो सब खड़े हुए. पुलिस ने बताया कि मैं कन्हैया हूं. मैंने देश के ख़िलाफ़ नारे लगाए थे और अफज़ल गुरु की बरसी मनाई थी. इसके ख़िलाफ़ ये आरोप हैं, उन्होंने कहा. हमें पांच दिनों के लिए पुलिस हिरासत (पीसी) चाहिए.

नौ फरवरी के कार्यक्रम में कन्हैया ने आपकी कोई मदद की?

उमर ने कहा कि मदद की कोई ज़रूरत ही नहीं है, डेढ़ सौ रुपए में पोस्टर बन जाता है.

पुलिस ने उमर से पूछा कि उस दिन जब आपका परमिशन कैंसल किया गया तो आपने कन्हैया को फोन किया था?

उमर ने कहा, हां फोन किया था. इसका फोन स्विच ऑफ था.

उनका अगला सवाल उमर से ही था कि आपका कार्यक्रम कन्हैया की इजाज़त के बिना कैसे हुआ?

उमर बोला कन्हैया जेएनयूू का प्रेसीडेंट है. यूएसए का प्रेसीडेंट थोड़े है.

सवाल-जवाब पूरे हुए तो उनको वापस भेज दिया गया और मैं अपने सेल में लौट आया.

जाते वक़्त उन दोनों ने कहा कि मेरे पीछे अब वे भी जेल में आ रहे हैं, लेकिन मैं देख सकता था यह सब जल्दी ही ख़त्म होने वाला है. उनसे अलग होते हुए मैंने उस दिन की कल्पना की जब हम तीनों ही आज़ाद होंगे और अपने प्यारे जेएनयू में लौट जाएंगे.

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