By

ज्ञानपीठ अवार्ड से सम्मानित,हिंदी की मशहूर लेखिका, कृष्णा सोबती का आज निधन हो गया है,
जानिए उनके बारे में कुछ दिलचस्प बातें_
1. वो 1966 में प्रकाशित उपन्यास मित्रो मरजानी के लिए सबसे ज्यादा जानी जाती हैं.
2. सोबती अपने पहनावा के कारण समकालीन लेखिकाओं में सबसे दिखती थी.
3. उन्होंने काफी समय तक ‘हशमत ( पुरुष उपनाम ) से कॉलम लिखें.
4. मुहावरेदार पंजाबी और उर्दू भाषा के प्रयोग के लिए उनके उपन्यास मशहूर रहें.
5. सोबती ने 2010 में पद्म भूषण अवार्ड लेने से मना कर दिया था.
 6. उन्होंने 70 साल की उम्र में डोगरी के लेखक शिव नाथ से विवाह किया.
7.  सोबती को 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
8. उनका आत्मकथात्मक उपन्यास ‘ गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ नाम से है.
कृष्णा सोबती को उनके उपन्यास जिंदगीनामा के लिए साहित्य अवार्ड मिला था । उनके कुछ अन्य उपन्यास हैं दारा से बिछुरी, और सूरजमुखी अँधेरे के.नफीसा, सिक्का बादल गया और बदालोम के घर उनकी अन्य रचनायें हैं।
सोबती मानती थी कि, “मैं एक’ महिला लेखिका कहलाना पसंद नहीं करती ‘। मुझे बल्कि एक लेखक कहा जाएगा जो एक महिला भी है। मेरे लिए, पुरुष और महिला एक दूसरे के बहुत करीबी हैं। उनके द्वारा साझा किए जाने वाले स्पष्ट गुणों के अलावा, दोनों लिंगों में एक अलग आत्मा नहीं होती है। पहले महिलाएं अपने घरों तक ही सीमित थीं, लेकिन आज महिलाएं एक जैसी शिक्षा प्राप्त करती हैं और अपने घरों से बाहर रहकर जीवनयापन करती हैं।  कई मायनों में, सोबती अपने समय से आगे थी।
पेश है ‘स्त्री-यौनिकता’ को प्रमुखता से रेखांकित करने वाली रचना ‘मित्रो मरजानी’ का एक अंश:
मित्रो पहले खड़ी-खड़ी देखती रही, फिर देवर को आंख मार हाथ से ताली बजा दी – मान गई, फूलां रानी, मान गई! गुलजारी, तेरी इस बन्नो को न धड़की है, न कोई दर्द, न कमज़ोरी। यह तो गले-गले गहरे चरित्र हैं। गुलजारी देवर, तुम मिट्टी के माधो बने रहे तो एक दिन तुम्हारी अकल-बुद्धि सब चुरा ले जाएगी यह चोट्टी!

घायल शेरनी-सी फूलां गला फाड़-फाड़ दहाड़ने लगी – जो मेरे रोग-बीमारी झूठ माने उसके अपने नैन-प्राण दुखें! दर्द-पीर से कालजा फटे!

मंझली ने घुड़की दी – चुप री, फूलां! यह झूठ-मूठ के रोग छोड़, मर्द का बच्चा जन!

नहले-दहले ख़त्म होते न देख धनवंती अंदर आई। तेवर चढ़ा बहुओं को घूरा और लड़के को उलाहना दे बोली – बेटा, पास बैठाल इन दोनों की कलह-कलत्र सुन रहा है? मंझली तो जबान-छुट है, तू ही अपनी को समझा!

गुलजारी ने बेबसी से सिर हिला तत्ते-जले कहा – फूलां का दोष हो तो उसे कुछ कहूं। जब भौजाई आप ही मुंह लगे, आप ही गले पड़े तो…

मंझली ओठों को मरोर दे हंस दी।

– वाह रे निन्दक! गुलजारी लाल, मैं तो समझी थी, औरत के साथ ढुक तू अब मर्द बन गया होगा…

धनवंती ने बीच में ही डपट दिया – चुप कर, बहू, कंजरोंवाले फक्कड़ न तोल! जबान काबू में रख!

मंझली ने आंखों-ही-आंखों में देवर को बेपर्द कर दिया और सिर हिला बोली – काका गुलजारी, मां की इतनी-सी घुड़की से डर गया? तू तो चोखा गबरू जवान है, फूलावंती क्या तेरे संग…

छि… छि…धनवंती के बदन पर कांटे उग आए।

– मेरी आँखों से दूर हो, बहू! और धनवंती ने आंखों पर हाथ रख लिया।मित्रो अंगुल-भर और ऊंची हो आई। सास को आंखें न खोलते देख कहा – खोल लो, मां जी, आंखें खोल लो! घुड़की सुन क्या मैं यहां से टल जाऊंगी?

धनवंती ने फूलां की ओर मुंह फेरा – फूलावंती, जी कुछ ठिकाने हुआ? कुछ खाया-पीया?

– मैं तो भली-चंगी हूं, मां जी! मुझे कोई दुख-रोग नहीं… मैं तो लेटी-लेटी स्वांग रचती हूं!

धनवंती समझ गई, छोटी बहू मित्रो के बोल दोहराती है। – फूलावंती, जिसे बोली-ठोली का अमल हो, बोल-कुबोल का परहेज न हो, उसके कहे का तू भरम करेगी?

मंझली ने देवरानी से और ठठा-मज़ाक किया – फूलांरानी, अपनी गऊ-सी सास के आगे जहर-भरे फुंकार न मार। रात तो तू मारे मौजें और दिन में छेड़े महाभारत!

धनवंती ने फूलां को समझाया – बेटी, जिठानी के मुंह न लग। कुछ खा-पी, आराम कर।

फूलावंती बिना डंक तड़प उठी – यह मीठी-मीठी बातें रहने दो, मां जी! जिस दिन से इस घर में पांव रखा है, मेरी जान को बन आई है। मुझसे सब जलते-भुनते हैं। मेरे बाबुल-भाई धनवान साहूकार हैं तो…

मित्रो ने देवर को आंख मारी – ओ-हो! धनी-साहूकार क्यों, फूलांरानी, यह क्यों नहीं कहती कि राजे-महाराजे हैं?- फिर दांत निकाल, सिर हिलाया, मुंह बिचकाया – देवरानी! चार छाज बड़ियां और चार छाज पापड़, यही है न तेरे पीहर का साहूकारा?

फूलावंती पटाक चारपाई से नीचे उतर आई। एक बार जलती निगाह से घरवाले को देखा, फिर चारपाई की बांही पर माथा पटक-पटक ऊंचा-ऊंचा रोने लगी – मैं सब जानती हूं, बैरी मुझे इस घर बसने नहीं देते! मेरे गहने-गट्टे पर जो आंख है!

अपमान-गुस्से से धनवंती थर-थर कांपने लगी – बहू, तेरी अक्ल-बुद्धि तो ठिकाने हैं?

फूलां ने गुलजारी के दरबार में फरियाद की – अब अपनी आंखें देख लो, तुम्हारी मां-भौजाई मुझे कैसे फाड़-फाड़ खाती हैं! मैंने आज तक बड़ा सब्र रखा है, पर कान खोल सुन लो, मैं अपनी सिंगार-पट्टी न छोड़ूंगी!

धनवंती के ओठों में बोल अटकने लगे – बहू, तेरे मन ऐसी बेऐतबारी? मेरा तो जीते-जी मरन! घर सबका सांझा पर यह तेर-मेर क्या? फूलावंती! मैं क्या तुम्हारी पराई हूं?

– अपने-पराए की बात नहीं, मां जी, मेरे गहने की कहो। धनवंती ने बेबसी से इमदाद के लिए बेटे की ओर देखा – बेटा, तेरे सामने यह चौढ़? इसे समझाएगा नहीं?

गुलजारी ने मां से नज़र नहीं मिलाई और बिना कुछ कहे-सुने उठ बाहर चला गया।

बेटे का रुख देख धनवंती मन-ही-मन कच्ची हो आई। गुस्सा संभाल सयाने कंठ से कहा – बेटी, बनवारी की पहली बहू की पाऊंचियां तेरी वरी में ढोई थीं, फिर तेरी सिंगार-पट्टी सुहाग को देकर मैंने कौन जुल्म कर लिया? फूलावंती, घर-गृहस्थी के तो सभी जोड़ बंद हैं। ऐसी बैर-विरोध की बातें बहुओं को नहीं सोहतीं।

तेज़-तर्रार लड़ने को बिल्कुल तैयार – मेरी मां के दिए गहने-कपड़े कोई क्यों ले? क्यों बांटे? कोई लूट के हैं?

धनवंती सन्नाटे में आ गई। सिर हिला-हिलाकर कहा – बहू, कुछ तो लाज-लिहाज़ रख। देखते-सुनते क्या कहेंगे? – मेरी ओर से पूरा जहान सुने! जिस अभागी का गहना-बट्टा लुटता हो, वह मुंह पर ताला लगा ले?

मंझली ने सिर हिला-हिला खूब मज़ा लिया। फूलावंती की पीठ पर थापी दे कहा – शाबाश, देवरानी, शाबाश! इस चिट्टे सिरवाली की तुमने अच्छी बात की है! पर इतना जान ले, देवरानी, मैं जो तेरे मर्द की मां होती तो, रानी, तेरे इस पिदके-से सिर पर एक बाल न रहने देती!

फूलां के मन उबाल तो ऐसा आया कि जिठानी का झोंटा नोच ले पर जाने क्या सोच ग़म खा गई। धम्म से अपनी चारपाई पर बैठकर कहा – जिसे अपनी इज्जत-पत्त प्यारी हो, वह सीधे-सीधे अपनी राह पकड़े। न मैं किसी से अड़ंगा लगाऊं, न कोई मेरे संग अड़फड़ करे।

मंझली तमाशबीन बनी बारी-बारी से सास-बहू की ओर देख हंस दी – फूलांरानी, मैं बुरों-की-बुरी मशहूर थी, पर लाडो, तू भी चोखा नाम कमाएगी!

 

Leave a Reply