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कैसे लिखें व्यंग्य? पत्रकार,लेखक,व्यंग्यकार, मनु पंवार के साथ हुई इस कार्यशाला में उन्होंने कहा कि लेखन की कोई तकनीक नहीं होती। व्यंग्य विरोधाभासों से पैदा होता है। एक अच्छा व्यंग्य इस बात पर भी निर्भर करता है कि अपने आसपास घट रही घटनाओं पर आपकी नज़र कैसी है? अच्छा व्यंग्य लेखन आपकी ऑब्जरवेशन क्षमता और संवेदनशीलता पर डिपेंड करता है।

हास्य और व्यंग्य दो अलग विधाएं हैं,व्यंग्य में हास्य हो ये ज़रूरी नहीं है.बल्कि व्यंग्य एक औज़ार है अपने विचारों को व्यक्त करने का. व्यंग्य की एक खासियत ये होती है कि वो चुभता है जोकि चुभना ज़रूरी भी है.
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देखा जाए तो व्यंग्य को हम बुनने की एक कला भी मान सकते हैं, जिस तरह से हम कुछ बुनते हैं ठीक वैसे ही हमें लेखन की कला को भी  सिलसिलेवार तरीके से बुनना पड़ता है.इसलिए कोशिश करिए कि अपने आसपास हो रही ख़बरों,घटनाओं से जितना हो सकें अवगत रहें.

घटनाओं को नोटिस करने की आपकी क्षमता क्या है? ये भी निर्भर करता है कि हम ख़बरों को किस तरह देखते हैं?
मनु ने कार्यशाला में मौजूद प्रतिभागियों के सामने अपने लेखन से जुड़े अनुभव तो साझा किए ही साथ ही किताबों से कुछ व्यंग्य भी पढ़ कर सुनाएं.अपनी किताब सेल्फी का स्वर्ण युग से उन्होंने ‘फेंकना’ भी एक कला है’ व्यंग्य सभी को  पढ़ कर सुनाया. जिसका छोटा सा अंश नीचे दिया जा रहा है_

‘फेंकना’ भी एक कला है_

रोमांचक मुक़ाबले में जीत के बाद भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान ने कहा- गेंदबाज़ों ने अच्छा फेंका, इसलिए हम जीत गए. उनकी इस बात से एक बार फिर से साबित हो गया कि ‘फेंकने’ और जीत के बीच परस्पर कितना गहरा संबंध है. इस देश को क्रिकेट का तो शुक्रगुज़ार होना ही चाहिए कि जिसने ‘फेंकने’ को मुहावरे में बदल दिया.

वैसे ‘फेंकना’ भी एक कला है. कई लोगों के लिए ललित कला से कम नहीं है. मुझे लगता है कि क्रिकेट ने इस कला को भारत में ज्य़ादा लोकप्रिय बनाया है. क्रिकेट की कमेंटरी से ही हमने जाना कि फलां गेंदबाज़ फलां छोर से फेंक रहा है. लेकिन अब ‘फेंकने’ में लोग इतने पारंगत हो गए हैं कि उसका कोई ओर-छोर ही नज़र नहीं आता. हालांकि फेंकने के नतीज़े क्या होंगे, यह काफी हद तक इस पर डिपेंड करता है कि फेंका क्या गया है. अगर कूड़ा फेंका गया है तो उसका हश्र कई बार दिल्ली की सड़कों जैसा हो जाता है, जिसमें प्राय: एमसीडी वालों की कोर्ट में पेशी हो जाया करती है.

वैसे कई लोग यह भी मानते हैं कि अपने यहां फेंकने की कला का एक चमकदार अतीत रहा है. ऐसे मतावलंबियों के मुताबिक अकबर के दरबारी बीरबल की इतिहास के सबसे बड़े फेंकुओं में ख्याति है. लेकिन भारत के आधुनिक इतिहास में फेंकने की कला ने राजनीति में कब घुसपैठ कर ली, इसका पता ही नहीं चला. नेता अक्सर चुनावों में इसका इस्तेमाल किया करते हैं. छोटा नेता बेचारा छोटी दूरी की ही फेंक पाता है क्योंकि उसका दायरा छोटा होता है. उसे यह भय भी रहता है कि अगर वह बड़ी-बड़ी फेंकने लगेगा तो पकड़ा जाएगा, लेकिन बड़े नेता को बड़ी-बड़ी फेंकने की सहूलियत रहती है. उसका कारपेट एरिया बड़ा होता है. जब-जब उसे अपने ‘फेंकने’ के पकड़ में आ जाने की आशंका रहती है, वह तत्काल छोर बदलकर दूसरी उससे भी ज्यादा लंबी फेंक लेता है. ऐसा फेंकना कई बार पांच साल में ही पकड़ में आ पाता है. इस तरह फेंकने की कला ने राजनीति के साथ चोली-दामन टाइप रिश्ता बना लिया.

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कुल मिलकर इस कार्यशाला में सभी प्रतिभागियों के अनुभव काफी अच्छे रहें | मनु का कहना था कि व्यंग्यकार होने के लिए हास्यबोध का होना ज़रूरी  है और अपने आसपास हो रही घटनाओं के प्रति सचेत रहें और जितना संभव हो सके किताबें पढ़ें.

 

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