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ये मीटू का मौसम है! बॉलीवुड के चेहरे का चमकीला नक़ाब उतर रहा है। फिल्म इंडस्ट्री के अंधेरों का सच जानने के लिए आज पढ़िए रवि बुले की लिखी कहानी  वल्गर :बॉलीवुड स्टोरी बॉक्स’ की  अनसेंसर्ड कहानियों से _

दिन भर की शूटिंग से थके तमाम लोग खा-पीकर कमरों में चले गए लेकिन कुछ नौजवान बरामदे की नर्म घास पर बैठे गप्प लड़ा रहे थे। रात आधी से ज़्यादा गुज़र चुकी थी और सिनेमा की कला पर चर्चा चल रही थी। राइटर आरिफ शेख का कहना था, ‘आर्ट में कोई भी थॉट अपने सबसे प्योर फॉर्म में होता है। अगर न्यूडिटी भी है तो सबसे खूबसूरत अंदाज़ में निकल कर आती है। वल्गर नहीं होती। जैसे ही वह वल्गर या चीप दिखती है आप कह उठते हैं कि यह आर्ट नहीं है…।’

धड़ाम की आवाज़ हुई। सबके सिर उधर घूम गए। ग्राउंड फ्लोर पर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर प्रेमलालवानी के कमरे का दरवाजा खुल कर लहराया और फिल्म की हीरोइन लतिका तेज़वानी अपनेकपड़े संभालती, फनफनाती हुई तेज़ी से सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर की मंज़िल पर निकल गई। फिल्म में आर्ट का सेक्शन संभाल रहे हितेन दुग्गल की आवाज़ आई, ‘ये सब जब तक बंद कमरे में था,आर्ट था… अब खुल कर सामने आ गया तो वल्गर है।’ सब हा हा हा करके हंस दिए। संजय शेट्टीबोला, ‘बुड्ढा सुन लेगा तो फिल्म से निकाल देगा।’ शेट्टी फिल्म में हीरो का रोल निभा रहा था। फिल्म एक ट्यूटर और उसकी स्टूडेंट की प्रेम कहानी थी। टाइटल था, द लास्ट लेसन। लालवानी ने खंडाला में चार बेडरूम और लॉन वाला बंगला बुक किया था। उसने सब ऐसे प्लान किया था कि एक लोकेशन पर पूरी फिल्म शूट हो जाए। लालवानी की उम्र 75 और 80 के बीच कुछ थी औरएक समय उसकी ख्याति बेहतरीन फिल्म निर्देशक की थी। उसकी करीब दर्जन भर फिल्में नेशनलआर्काइव की धरोहर थीं। मगर बीते कुछ बरसों से वह बहुत खराब फिल्में बनाने लगा था। पुरानी साख की वजह से नए युवा उससे सीखने आते थे और बुरी फिल्में बनाते हुए वह नई-नई लड़कियोंको पर्दे पर मौका देता रहता था।

बरामदे में सन्नाटा छाया था। ऊपर लतिका तेज़वानी ने अपने कमरे का दरवाजा भड़भड़ाते हुएखोला और तेज़ आवाज़ के साथ बंद किया।अंदर क्या हुआ? सबके मन में सवाल था।‘छोड़ो यार…’ आरिफ शेख ने कहा, ‘दोनों सुबह ऐसे मिलेंगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं।’अहमद ने पूछा, ‘वो शिकायत नहीं करेगी?’पागल है तू…?’ दुग्गल बोला, ‘सैट पर देखता नहीं कि कैसे लालवानी आंखों से ही सब करता रहता है और वह फुल कोऑपरेट करती है… यहां सब ऐसे ही चलता है…’

अहमद नया था। सातवें नंबर का असिस्टेंट। वह अजीब-से रोमांच से घिर जाता था जब देखता कि लालवानी कैसे हवस भरी आंखों से घूरते हुए लतिका तेज़वानी को सीन समझाता है। हाथों से उसके शरीर को छू-छू कर बताता है कि हीरो उसे ट्यूशन पढ़ाते हुए कैसे छूएगा, क्या करेगा, क्या बोलेगा। वह ध्यान से सुनती और खिलखिलाकर कर हंसती। हंसते हुए उसका पूरा शरीर हिलता। यह देख कर लालवानी बच्चे की तरह प्रसन्न होता। लतिका बी-ग्रेड फिल्मों में आइटम डांस करती थी। लालवानी ने उसे एक्ट्रेस के रूप में ब्रेक दिया तो वह उसकी एहसानमंद हो गई। मगर लालवानी के कमरे से जिस अंदाज़ में निकली उससे साफ था कि वह एहसान की भारी कीमत चुका रही है।30 साल से लालवानी का चीफ एडी बना हुआ राजीव जैन बोला, ‘ऐसे कई केस हैं हमारी इंडस्ट्री में। प्रोड्यूसर-डायरेक्टर रंजन कुमार पता है ना… कब्र में पैर लटके हैं आज… वह एक बाबा की दी ऐसी भस्म का सेवन करता था, जिससे झड़ता ही नहीं था उसका! हीरोइनें कांपती थीं उसके नाम से… लेकिन बाद में उसी भस्म ने उसकी त्वचा में बड़े-बड़े सफेद चकत्ते पैदा कर दिए। पाप फूटा साले का!’‘बुढ़ापे की ठरक बड़ी खतरनाक होती है…’ आरिफ शेख ने कहा, ‘हमारे यहां एक बहुत बड़े डायरेक्टर हुए, क्लासिक फिल्म बनाने वाले… अल्लाह उन्हें जन्नत में हूरे बख्शें… खुद खासे बूढ़े थे मगर सेक्रेटरी जवान रखे थे… उसकी सोहबत करते हुए उन्होंने इस जहां से कूच किया… खेल-खेल में सेल्फ गोल खा गए…’

‘नाम…?’ अहमद ने आश्चर्य से पूछा।

‘वह इतना बड़ा है कि जुबान पर लाने का पाप कोई नहीं करता। मुझसे भी मत करवाओ मियां,’ आरिफ शेख ने मुस्करा कर कहा।‘चल कर सोया जाए…?’ कहते हुए राजीव जैन ने उबासी ली।इससे पहले कि कोई कुछ कहता, लालवानी की आवाज़ आई, ‘अरे तुम लोग यहां हो…!’वह सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए उनकी तरफ आ रहा था। धीमी-लड़खड़ाती चाल और शरीर भारी। बदन पर सफेद कुर्ता-पाजामा था। कुर्ते के बटन खुले और पाजामे का नाड़ा घुटने तक लटक रहा था। उसके चेहरे पर निश्चिंतता का भाव था। करीब आकर उसने पूछा, ‘क्या बातें हो रही हैं?’राजीव जैन ने कहा, ‘बस सर, सिनेमा के आर्ट पर डिस्कस कर रहे थे…’लालवानी ने ठहाका लगाया। बोला, ‘अब साला इसमें आर्ट जैसा रहा क्या जो डिस्कस कर रहे हो! ये सोचो कि फिल्म बनाने का चांस मिला तो प्रोड्यूसर की वसूली कैसे कराओगे? वो मेरा टाइम था जब सिनेमा आर्ट जैसा बनता था। अब प्रोजेक्ट जैसा सोचोगे तो फिल्म बना पाओगे।’

सब चुप रहे। लालवानी ने सिगरेट के दो कश खींचे और दूर तक फैले आसमान को देखने लगा.‘क्या आप भी इस फिल्म को प्रोजेक्ट जैसा बना रहे हैं?’ अहमद ने सवाल किया। प्रेम लालवानी ने उसे सिर से पैर तक देखा और मुस्कराया। उसकी आंखों में हल्की उदासी उतर आई। बोला, ‘बेटा… ये न तो आर्ट है न प्रोजेक्ट… टाइम पास कर रहा हूं… तूने देखा ना…!’इतनी खरी बात से अहमद घबरा गया। उसे लगा कि गलत सवाल कर दिया। लालवानी बोला, ‘जितना काम करना था लाले मुझे, मैं कर चुका… तेरे बच्चे होंगे तो उन्हें ये मत बताना कि कभी मेरे साथ तूने काम किया… आर्काइव में मेरी जो फिल्में हैं वो दिखाना।’ उसकी आवाज़ कुछ भावुक हो गई। बोला, ‘अब मैं और तो कुछ कर नहीं सकता… यही आता है। नाम-पैसा सब कमा लिया…बीवी दस साल पहले मर गई… बच्चे हुए नहीं… क्या करूं?’ कुछ पल वह खामोश रहा, फिर बोला ‘कुछ भी नहीं होता है मुझसे… इसीलिए नाराज़ हो कर भागी वो कमरे से… और करती भी क्या…’

माहौल में सन्नाटा छा गया।

बात न बढ़े इस गरज से राजीव जैन ने कहा, ‘सर आप कमरे में चलिए… हम लोग भी सोते हैं…’

‘छोड़ यार, सोते तो रोज़ हैं… पर नींद कहां आती है?’ लालवानी ने खुद से शिकायत जैसी आवाज़ में कहा।

राजीव जैन को पता था कि लालवानी चौबीस घंटे में बमुश्किल चार घंटे सो पाता है। बाकी समय सिगरेट फूंकता और व्हिस्की के छोटे-छोटे पैग लगाता है। यूं तो वह कंट्रोल में रहता परंतु कभीइमोशनल हो जाता तो पैग का साइज़ बढ़ जाता है। पीने की रफ्तार बढ़ जाती है। तब उसे संभालना मुश्किल होता है। इसलिए लोग अब उसे पार्टी में नहीं बुलाते। राजीव जैन को आखिरी पार्टी याद है जब एक बड़े स्टार की फिल्म के सक्सेस सेलिब्रेशन पर लालवानी ने खूबसूरत पद्मा रॉय को सरेआम अपनी बांहों में जकड़ लिया था। काफी ज़ोर लगा कर वह खुद को छुड़ा पाई थी मगर उसकी कलाई पकड़े लालवानी ने ऊंची आवाज़ में कहा, ‘अब तो तू मेरा फोन भी नहीं उठाती… कितनी बार तुझे फोन किया रात में आने को… कभी तो आ जा… अच्छा, तेरा दूसरा फोन नंबर दे…।’ वह पीकर बुरी तरह लड़खड़ा रहा था। इससे पहले कि तमाशा खड़ा होता मेज़बान ने लालवानी को उसकी कार में बैठा कर रवाना कर दिया। यह अच्छा था कि पार्टी प्राइवेट थी और अंदर मीडिया नहीं था। पद्मा रॉय ने भी यह सोच कर बात नहीं बढ़ाई कि लालवानी ने ही उसे फिल्मों में ब्रेक दिया था और अब उसका दिमाग शायद जगह पर नहीं रहता।

‘जब भी सोने जाता हूं… मेरी लाइफ की पिक्चर आंखों के आगे चलने लगती है,’ लालवानी ने कहा और फिर से आसमान को ताकने लगा। लालवानी के मां-बाप देश विभाजन के समय पेशावर से आए थे। बदहवास। वहां अपना सब कुछ छोड़ कर। कारोबार-मकान, दोस्तियां-रिश्ते। लालवानी की दो बड़ी बहनें भगदड़ में खो गई थीं। मां सदमे में ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रही। बाप ने दूसरी शादी कर ली। लालवानी कुछ समय तक बाप के साथ रहा और फिर अपनी राह पर चल पड़ा। अलग-अलग शहरों में इधर-उधर मजदूरी कराने के बाद किस्मत उसे बंबई ले आई। यहां वह जिसलड़की के प्यार में पड़ा, वह एक फिल्म स्टूडियो में नौकरी करती थी। उसने ही लालवानी को स्टूडियो में बतौर क्लर्क लगवाया।

रवि बुले की ‘बॉलीवुड स्टोरी बॉक्स से ’ ‘वल्गर’ को पढ़ने के लिए क्लिक करें

 

 

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