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फरवरी, 1999 के खुले मौसम में एक दिन भारतीय जनता पार्टी के सांसद योगी आदित्यनाथ अपने हथियारबंद अनुयायियों के साथ उत्तर प्रदेश के महाराजगंज ज़िले के मुस्लिम बहुल गांव पंचरुखिया से गुज़रे। गोरखनाथ मंदिर के महंत पद के उत्तराधिकारी अपनी एकदम नई चमचमाती एसयूवी में सवार थे। उनके साथ कारों और मोटर साइकिलों का पूरा काफिला था। कारों का काफिला वहां से दनदनाता हुआ आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र से लगे पूर्वी उत्तर प्रदेश के महाराजगंज की ओर तेज़ रफ्तार से चला गया। परंतु इसे समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने रुकने पर मजबूर कर दिया जो तलत अज़ीज़ के नेतृत्व में गिरफ्तारी देने के लिए मुख्य सड़क पर एकत्र हुए थे। वे राज्य में भाजपा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे।

इस टकराव ने शीध्र ही आक्रोश में नारे लगाने से आगे निकल गोलीबारी की शक्ल ले ली। अज़ीज़ के सुरक्षाकर्मी हवलदार सत्यप्रकाश यादव के चेहरे पर एक बुलेट लगी और वह नीचे गिर पड़ा। उसके चेहरे से तेज़ी से खून बह रहा था। इससे भयभीत, अज़ीज़ और समाजवादी पार्टी के समर्थक सड़क के दोनों ओर बने खेतों में भाग गए। आदित्यनाथ और उनके आदमी, सभी गोरक्षा मंच के सदस्य थे, आराम से आगे निकल गए। तीन घंटे बाद 10 फरवरी, 1999 को महाराजगंज पुलिस ने आदित्यनाथ और 24 अन्य के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की जिसमें अपराधों की लंबी सूची थी[1]। इनमें हत्या के प्रयास (भारतीय दंड संहिता धारा 307), दंगा करना (धारा 147), घातक हथियार लेकर चलना (धारा 148), एक धार्मिक स्थल को अशुद्ध करना (धारा 295), मुस्लिम कब्रिस्तान में जबरन घुसना (धारा 297), दो धार्मिक समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना (धारा 153-ए), और आपराधिक धमकी देना (धारा 506) शामिल थीं।

प्राथमिकी में विस्तार से इस बात का ज़िक्र था कि गोरखपुर के सांसद और उनके वफादारों ने किस तरह पंचरुखिया में हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने का प्रयास किया और कब्रिस्तान में कब्रों को खोदा। इसमें यह भी लिखा था कि पुलिस द्वारा गिरफ्तारियां शुरू किए जाने के बाद वे चौदह से पंद्रह गाड़ियों में गांव से भाग गए और उन्होंने समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर गोलियां दागीं जिससे सत्यप्रकाश यादव (जिसकी बाद में बुरी तरह घायल होने के कारण मृत्यु हो गई) और तीन अन्य जख्मी हो गए।

पंचरुखिया घटना योगी आदित्यनाथ के सक्रिय राजनीति में आने के एक साल बाद हुई। वह 1998 में गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से 26000 मतों से जीत कर सांसद चुने गए थे। 1999 के चुनाव में उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी के जमुना प्रसाद निषाद को मात्र 7339 मतों से पराजित किया। आदित्यनाथ ने पहली बार लोक सभा का चुनाव जीतने के तुरंत बाद गोरक्षा मंच शुरू किया परंतु ऐसा लगता है कि ध्रुवीकरण करने के उनके प्रयासों ने 1999 के चुनावों में मतदाताओं ने उनकी कोई मदद नहीं की।

जनवरी-फरवरी 2002 में उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए हुए चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा और समाजवादी पार्टी ने उसे सत्ता से बेदखल कर दिया। आदित्यनाथ अपने सहयोगी राधा मोहन दास अग्रवाल को, जिन्हें उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़ा किया था, जिताने में कामयाब रहे। भाजपा ने अग्रवाल को टिकट देने से इन्कार कर दिया था। परंतु विधान सभा में अग्रवाल की सीट का कोई विशेष महत्व नहीं रहा क्योंकि यह आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र का बामुश्किल पांचवां हिस्सा था।

ऐसा लगता है कि अनिश्चितता के इसी परिदृश्य ने आदित्यनाथ को एक ऐसा नया संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया जो मतदाताओं के बीच अपना आधार बढ़ाने में मददगार हो सके। विधान सभा चुनाव के नतीजों की घोषणा के एक सप्ताह के भीतर ही यह मौका आ गया।

27 फरवरी, 2002 को गुजरात के एक छोटे से शहर गोधरा के रेलवे स्टेशन के निकट साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में लगी आग में 58 व्यक्तियों की मौत हो गई। इस घटना ने मुसलमानों के खिलाफ बहुत ही खराब हिंसा की शुरुआत की जो हालिया इतिहास में सबसे संगीन थी। गुजरात में जब मुसलमानों को जनसंहार का निशाना बनाया जा रहा था तब आदित्यनाथ गोरखपुर में अल्पसंख्यक विरोधी समूह के रूप में एक नया संगठन बनाने की दिशा में अपना पहला कदम उठा रहे थे।

गोरक्षा मंच का गोरक्षा पीठ या गोरखनाथ मंदिर के अनुयायियों से आगे इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं हो रहा था। इसलिए संगठन के नाम में परिवर्तन की आवश्यकता थी ताकि हिंदुओं के बीच उसकी व्यापक पैठ सुनिश्चित की जा सके। तब हिंदू युवा वाहिनी की स्थापना की गई जिसमें गोरक्षा मंच का विलय कर दिया गया था। इसका मकसद आदित्यनाथ की चुनावी आकांक्षाओं को पूरा करना और अपने विचारों को गोरखपुर से आगे ले जाना था।

अपनी स्थापना के पहले दिन से ही हिंदू युवा वाहिनी ने धार्मिक राजनीति के लिए विषमन के साथ ही आक्रामक प्रचार शुरू किया और इस दौरान हुई कुछ छोटी मोटी घटनाओं को सांप्रदायिक युद्ध की तरह हवा दी गई और अल्पसंख्यकों को हिंदुओं के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में पेश किया गया। इस संगठन ने लगातार ‘लव जिहाद’, मुसलमानों की मांस खाने की आदत, हिंसा की ओर उनके झुकाव, उनके द्वारा जानबूझकर हिंदू क्रियाकलापों और राष्ट्रीय प्रतीकों का अनादर करना और कहीं भी बहुमत में होने पर अपना वर्चस्व जताने की उनकी प्रवृत्ति पर ज़ोर देते हुए लगातार एक भय का माहौल पैदा करने का प्रयास किया।

हिंदू युवा वाहिनी ने अपने सांप्रदायिक कृत्यों और भाषणों के के माध्यम से इस क्षेत्र में जो कटुता बोई थी उसने अंततः शानदार चुनावी लाभ दिलाया। उदाहरण के लिए 2004 के लोकसभा चुनाव में आदित्यनाथ की जीत का अंतर 1999 के महज 7339 मतों की तुलना में 1,42,000 मतों का हो गया। लोकसभा के 2009 के चुनाव में आदित्यनाथ की जीत का अंतर तीन लाख से भी अधिक हो गया और 2014 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर उन्होंने इसी लक्ष्य को प्राप्त किया।

एक सांसद के लिए अपने राजनीतिक दल के दायरे से बाहर किसी एक संगठन का गठन असामान्य बात है। परंतु आदित्यनाथ लोक सभा में जिस दल का प्रतिनिधित्व करते थे उससे अलग अपनी पहचान बनाने के महत्व को जानते थे। भारतीय जनता पार्टी और उसके संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अलग अपनी पहचान बनाए रखने की परंपरा को दिग्विजय नाथ, जो 1935 से 1969 तक गोरखनाथ मंदिर महंत और बीसवीं सदी के राजनीतिक दृष्टि से बेहद चतुर साधुओं में से एक थे, के समय से खोजा जा सकता था।

सन 1894 में जाति से ठाकुर नान्हू सिंह का जन्म हुआ, जो आगे चल कर दिग्विजय नाथ बने। इस अनाथ बच्चे का लालन पालन गोरखनाथ मंदिर में हुआ।[2] वह 1939 में हिंदू महासभा में शामिल हुए और गोरक्षा पीठ के महंत होने की वजह से उन्होंने बहुत तेज़ी से संगठन में अपनी पहचान बना ली और हिंदू महासभा के अधिकांश सदस्यों की भांति उनमें भी राजनीतिक वाकपटुता थी। उन्होंने भी महात्मा गांधी का ज़ोरदार तरीके से विरोध किया।

27 जनवरी, 1948 – गांधी की हत्या से तीन दिन पहले उन्होंने हिंदू चरमपंथियों का उनकी हत्या करने के लिए आह्वान किया था। उनके विषवमन करने वाले भाषण का ज़िक्र करते हुए महात्मा गांधी हत्याकांड की जांच करने वाले आयोग ने टिप्पणी की थीः

वी. जी. देशपांडे, महंत दिग्विजय नाथ और प्रोफेसर राम सिंह (सभी हिंदू महासभा के नेता) ने 27 जनवरी, 1948 – दिल्ली प्रांतीय हिंदू सभा के तत्वाधान में कनाट प्लेस में आयोजित बैठक में कहा कि महात्मा गांधी के रवैए ने पाकिस्तान के हाथ मज़बूत किए हैं। महंत दिग्विजय नाथ ने तो उपस्थित लोगों का महात्मा गांधी और दूसरे हिंदू विरोधी तत्वों का निकाल बाहर करने का आह्वान किया था।

1949 में पार्टी के संयुक्त प्रांतों के अध्यक्ष के रूप में दिग्विजय नाथ ने महसूस किया कि अयोध्या की बाबरी मस्जिद मसले का चतुराई के साथ इस्तेमाल करने से हिंदू महासभा को कांग्रेस, विशेषकर धार्मिक समुदायों के बीच जिसका प्रतिनिधित्व करने का वह दावा करती है, के मुकाबले बहुत ज़बर्दस्त लाभ मिल सकता है। उन्होंने न सिर्फ पूरी योजना को तैयार किया बल्कि दिसंबर 1949 में बाबरी मस्जिद में राम लला की मूर्तियां रखने की पूरी कार्रवाई का गुप्त रूप से संचालन भी किया। जहां उन्होंने सभी स्रोतों का इस्तेमाल किया वहीं अखिल भारतीय रामायण महासभा के झंडे तले अयोध्या में महासभा के सदस्यों ने मैदान में सारा काम किया।

इसके बाद ही, दिग्विजय नाथ को हिंदू महासभा का महामंत्री बना दिया गया। जून 1950 में स्टेट्समैन  अखबार को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने घोषणा की कि यदि हिंदू महासभा सत्ता हासिल करती है, तो वह मुसलमानों को पांच से दस साल के लिए मत देने के अधिकार से वंचित कर देगी, इस अवधि में उन्हें सरकार को आश्वस्त करना होगा कि उनके हित और भावनाएं भारत के पक्ष में हैं।

 

 

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