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(स्वदेश दीपक के मशहूर नाटक कोर्टमार्शल का एक अंश)

बिकाश राय: (दबी हुई आवाज़ में बोलना शुरू करता है) सरकारी वकील मेजर पुरी ने ठीक कहा हैहम ऐसे समाज में रहते हैं जो कानून और व्यवस्था पर टिका है। और समाज में एक व्यक्ति के विरोध और विद्रोह के लिए कोई स्थान नहीं। बिल्कुल नहीं कोई स्थान। समाज ने, कानून ने, व्यवस्था ने विरोध प्रकट करने के लिए बना रखे हैं रास्ते। मीलों लंबे रास्ते। इन रास्तों पर चलना शुरू किया जा सकता है। लेकिन प्रश्न तो यह है कि विरोध प्रकट करने के ये रास्ते क्या कहीं पहुँचते भी हैं? बिल्कुल नहीं पहुँचते। कभी नहीं पहुँचते। विरोध कोई नाटक नहीं कि अंतिम अंक, लास्ट एक्ट तक पहुँचने की प्रतीक्षा करे। शक्तिशाली लोगों के विरोध को राजनीतिक विरोध कहा जाता है, जो उन्हें एक ही छलाँग में बिठा देता है सत्ता के बिल्कुल पास रखी कुर्सी पर। और कमज़ोर लोगों का विरोध। इसे विरोध नहीं, विद्रोह का नाम दिया जाता है, जो उन्हें एक ही छलाँग में पहुँचा देता है फाँसी के तख्ते तक।

जब छोटे-छोटे विरोध लगातार दबा दिए जाएँ, अनसुने-अनदेखे कर दिए जाएँ तो हमेशा एक भयंकर विस्फोट होता है। प्राणघातक विस्फोट।

कानून और संविधान ने सबको बराबर का दर्जा, बराबर का अधिकार दे दिया। लेकिन बड़े आदमी ने छोटे आदमी को, ऊँचे आदमी ने नीचे आदमी को, यह अधिकार नहीं दिया। बिल्कुल नहीं दिया। जो व्यवस्था, जो समाज जाति-भेद के आधार पर चलेगा, ऊँच-नीच के तराजू में आदमी को तोलेगा, उसकी आयु कभी लंबी नहीं होती। बिल्कुल नहीं होती।

बराबर की बात तो दूर, सोचने के स्तर पर भी हम अपने से ‘छोटों’ को बराबर का अधिकार देने के लिए तैयार नहीं। बराबर का अधिकार। हम तो आँख उठाकर अपनी ओर देखने का हक तक देने को तैयार नहीं। इसका कारण! वे सामंती प्रवृत्तियाँ, सोचने का सामंती तरीका, फ्यूडल टैंडेंसीज़, जिनसे हमें अभी तक आज़ादी नहीं मिली।

(रुकता है। लंबी साँस लेता है। फिर ऊँची और तेज़ आवाज़ में बोलता है।)

सरकारी वकील ठीक कहते हैं। सवार रामचंदर को फाँसी की सज़ा मिलनी ही चाहिए। अपने देश की रक्षा की शपथ लेने के बावजूद उसने कर दिया इन्कार अफसर की बच्ची की गंदगी उठाने से। अपने देश की रक्षा की शपथ लेने के बावजूद उसने हराम की सट्ट जैसी साधारण गाली खाने से कर दिया इन्कार। अपने देश की रक्षा की शपथ लेने के बावजूद उसने अपने कान, अपनी आँखें बंद करने से कर दिया इन्कार। उसे दंड मिलना चाहिए। मृत्यु-दंड। उसे आर्मी एक्ट 69 तथा इंडियन पीनल कोड की दफा 302 के अनुसार हर हालत में दंड मिलना चाहिए। मृत्यु-दंड। बार-बार मृत्यु-दंड।

फूली हुई साँस के साथ बिकाश अपनी जगह बैठता है। बिल्कुल चुप्पी। सूरत सिंह सारे कमरे में निगाह घुमाता है। सलाहकार जज उसके पास सिर करके कुछ कहता है।

सूरत सिंह: सब लोग बाहर जाएँ।

एक-एक करके लोग कोर्ट-कमरे से बाहर निकल जाते हैं। अब केवल जज वहाँ बैठे हैं और मेहराबदार दरवाज़े में गार्ड तनकर खड़ा है। सूरत सिंह चारों जजों की तरफ देखता है।

जज एक: उमर कैद।

जज दो: उमर कैद।

जज तीन: फाँसी।

जज चार: फाँसी।

सूरत सिंह सलाहकार जज की तरफ देखता है।

सलाहकार जज: सर! मैं आपको कोई सलाह नहीं दे सकता।

सूरत सिंह: तो निर्णायक वोट मुझे देना है। ज़िंदगी और मौत का फैसला मेरे कास्टिंग वोट से होगा। गुड।

हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित और प्रशंसित लेखक व नाटककार स्वदेश दीपक का जन्म रावलपिंडी में 6 अगस्त 1942 को हुआ। अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. करने के बाद उन्होंने लंबे समय तक गांधी मेमोरियल कॉलेज, अंबाला छावनी में अध्यापन किया। दशकों तक अंबाला ही उनका निवास स्थान रहा। 1991 से 1997 तक दुनिया से कटे रहने के बाद जीवन की ओर बहुआयामी वापसी करते हुए उन्होंने कई कालजयी कृतियां रचीं, जिनमें मैंने मांडू नहीं देखा  और सबसे उदास कविता  के साथ साथ इस संकलन में प्रस्तुत कई कहानियां शामिल हैं। वे उन कुछेक नाटककारों में से हैं, जिन्हें संगीत नाटक अकादेमी सम्मान हासिल हुआ। यह सम्मान उन्हें 2004 में प्राप्त हुआ। कहानी, उपन्यास तथा नाटकों की अब तक कुल पंद्रह पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें कहानी संग्रह तमाशा, बाल भगवान और किसी एक पेड़ का नाम लो  तथा नाटक कोर्ट मार्शल, बाल भगवान और काल कोठरी आदि शामिल हैं।

 

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