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अमिता आपकी कहानी “ईदी” को लेखन मंच पर पाठकों के द्वारा काफी सरहना मिली हैं, हमारे पाठकों को कहानी के बारे में थोड़ा विस्तार से बताएं।

आपकी होसला अफ़्ज़ाई और पाठकों का बहुत-बहुत शुक्रिया।

ईदी की प्रेरणा मुझे अख़बार के एक कोने में छपी सुर्ख़ियों से मिली, जिसमें केवल इतना लिखा था कि, “एक बच्ची  को अपनी दादी एक ओल्ड-ऐज होम में मिली”, इसी पंक्ति  को केन्द्र बिंदु बना कर मैनें इस कहानी को अंजाम दिया। लेकिन  ‘ओल्ड ऐज होम्स’ की बढ़ती तादाद ऐसी बहुत सी कहानियाँ बयान कर सकती हैँ।

जैसाकि आपकी कहानी से पता चलता हैं कि यह एक एकल परिवार में रिश्तें टूटने की कहानी है। आज के परिवेश में इस पर आपकी क्या राय है?

आज के परिवेश में एकल परिवार का चलन शहरों में ज़्यादा सामान्य है, बड़े शहरों की भाग-दोड़ ने इंसानी रिश्तों की पकड़ को बहुत कमज़ोर कर दिया है। काम-काज़ी दम्पति अपने  बुज़ुर्गों की मौज़ूदगी को पाँवो  की बेड़ी समझतें हैं। यहाँ तक की युवा और बच्चे भी बुज़ुर्गों की सलाह को रोक-टोक का नाम देते हैं। ज़्यादातर लोगों का ऐसा मानना है कि छोटे  से छोटा परिवार ख़ुशियों का फार्मूला है।  इस सोच ने ‘ओल्ड आगे होम’ जैसी संस्थाओं को जनम दिया।

यह कहानी न केवल ऐकल परिवार के टूटते रिश्ते को दर्शाती है, पर बख़ूबी  यह भी दर्शाती है कि आज हम अपने असल रिश्तों की शीतलता छोड़ बाहरी रिश्तों  में सुकून ढूँढ़ते हैं। घर के बड़े-बज़ुर्ग जो  प्यार और स्नेह नाती-पोतों  को दे सकतें हैं, वह दुनिया की कोई ताकत नहीं दे सकती, यह कहानी कोमलता से यह भी दर्शाती है।

कहानी के आधार पर अगर कहें तो आप अपनी दादी मां के कितने करीब हैं?

मेरी दादी कई बरस पहले इस दुनिया से चली गईं, उनकी याद मेरे ज़हन में आज भी ताज़ा है। मैं  उनके सबसे बड़े  बेटे की सबसे बड़ी बेटी थी, याने की उनकी सबसे बड़ी पोती। वह मुझे इंदिरा गाँधी बुलाती थीं, और उनके बारह  नाती-पोतों में मैं  उन्हें सबसे प्यारी थी। उनका प्यार मेरी दाल-सब्ज़ी की कटोरी में देसी घी से नापा जा सकता था। उनके खाने में स्वाद से ज़्यादा प्यार होता था, जिसका ज़ायका शायद आपको इस कहानी में कहीं न कहीं महसूस हुआ  होगा। मेरा ऐसा मानना है कि बुज़ुर्गों का आस-पास होना बच्चों को एक महफूज़गी का ऐहसास करता  हैं, बिना कुछ कहे – बिना कुछ करे।


आपकी आने वाली कहानियां कौन कौन सी है और किन विषयों पर आधारित हैं?

आज-कल मैं एक  नये उपन्यास  पर काम कर  रही हूँ जो की ‘डिप्रेशन’ के हर पहलू को दर्शाता  है। आज के दौर में डिप्रेशन एक महामारी बन चुकी है। और यदि आप आंकड़े देंखें तो जो बात चकित करती है वो यह है कि हमारे देश में न केवल अनपढ़ बलिक पढ़े-लिखे  लोग भी इस बीमारी को पहचान नहीं पाते। इस बीमारी के बारे  में बात करना और इसका इलाज़ तो काफी दूर की बात है। मुझे बहुत लोगों ने कहा कि यह काफी डार्क-विषय है, पर मेरा संकल्प दरड़ है। मैं इस डार्क सब्जेक्ट को हस्य्पूर्ण स्वर में पेश करने की कोशिश करूंगी।

जगरनॉट के लेखन मंच से जुड़ने की बाद आपका क्या अनुभव रहा?

जगरनॉट के लेखन मंच ने लघु-कथाओं को उड़ने के लिए असमान दिया है, जो सराहनीय है। मैं लेखन-मंच की  बहुत सी रोचक कहनियाँ पढ़ती  हूँ, जो दिल को छू जाती  हैं ।

स्मार्ट-फ़ोन पर लघु कहानियां अपने आप में शिक्षा का एक स्रोत बन सकतीं हैं,  बहुत से युवा और बच्चे जो अच्छे  साहित्य से वंचित हैं और अच्छी किताबें नहीं ख़रीद  पाते, उन सबके लिए जगरनॉट  ज्ञान का भंडार बन सकता है, परन्तु उसके लिए जागरूकता की ज़रुरत है। तकनीकी तौर पर  लेखन मंच को कुछ सुधर की ज़रूरत  है। 

आपकी पसंदीदा लेखक -लेखिकाएं कौन-कौन है और क्यों?

सच कहूँ तो एक लम्बे आरसे तक मैंने हिंदी की कोई किताब नहीं पढ़ी, शायद स्कूल के बाद मैंने जगरनॉट पर  फिर से हिंदी कहानियां पढ़ना शुरू किया। प्रेमचंद मेरे सबसे पसंदीदा साहित्यकार हैं,  उनकी ‘ईदगाह‘ हमारी स्कूल किताब का हिस्सा थी, जिसको पढ़ कर में बहुत रोई थी । उमेरा अहमद की ‘बेनिशान‘ मुझे बहुत पसंद आयी। मंटो की कहानियां मैंने हाल ही में पढ़ीं, जो दिल दहलाने वालीं हैं।

हिंदी में नए लिखने वालों के लिए आप क्या भविष्य देखते हैं?

डिजिटल-वर्ल्ड ने हर भाषा को एक नया माध्यम दिया है।  आज हम हर तरह की किताब के बारे में प्रचार कर सकतें हैं। जो की प्रोत्साहनीय है। लेकिन हमें ये मानना होगा कि हिंदी-भाषी देश में अंग्रेजी किताबों का प्रचलन ही ज़्यादा है,  हमें इस प्रचलन को तोडना होगा। मेरा ऐसा मानना है कि अच्छी कहानी खुद  बोलती  है, भाषा चाहे जो भी हो, और हिंदी तो हमरी राष्ट्र भाषा है – इसको पढ़ना “फैशनेबल” बनाना आपका और हमारा काम है .

अमिता की  लिखी कहानी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

 

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