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वाइफ और मोटर-बाइक की तलाश में निकला इंसान कन्फ्यूज़ हो ही जाता है, ख़ासकर बाइक के मामले में. नए-नए फ़ीचर्स और बढ़िया से बढ़िया मॉडल, लेकिन नीरव कांत पर न जाने कब से बुलेट की सवारी का भूत सवार था. बुलेट मानी भी जाती है राजा-सी सवारी. कोई घोंचू भी उस पर ऐसा फ़बता है, मानो किसी चक्रवर्ती सम्राट का युवराज अपने रथ पर चला आ रहा हो. ढोल- नगाड़ों की कसर भी बाइक की गुर्राहट-भरी आवाज़ पूरी कर जाती है. किसी हॉलीवुड एक्ट्रेस ने सालों पहले अपने एक इंटरव्यू में कहा था, “अधिकांश पुरुष ‘छोटे साइज़’ की कुंठा के चलते बड़ी बाइक चुनते हैं. बाइक उनके लिए ‘एक्टेंशन’ का काम करती है.” एक मध्यमवर्गीय परिवार से होने के चलते 29 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर नीरव कांत का बुलेट चुनना ‘एक्सटेंशन’ से ज़्यादा ‘टेंशन’ साबित होता आया था. फिर एक दिन अचानक उसे अपने खड़ूस बाप से लाख रुपये मिल गए और इन नकद रुपयों के बल-बूते पर बुलेट ख़रीदने का इंतजाम हो गया. शोरूम में दाख़िल होते ही ठाठ की सवारी का सपना लगा कि अब बस साकार होने को ही है. नीरव की सबसे बड़ी ख़ुशी चंद कदमों की दूरी पर थी, पर दुनिया में दो प्राणी ऐसे भी होते हैं, जो दूर से ही ख़ुशियां सूंघ लेते हैं, एक बीवी और दूसरा बॉस. बस आ गया रघु रमण का फ़ोन,

‘हैलो नीरव, फ़ाइनल हुई तेरी मोटर-साइकल की डील?’

‘यस बॉस! मॉडल, कलर, एक्सेसरीज़ और पेमेंट सब फ़ाइनल है. बस थोड़ा-सा पेपर-वर्क और फिर डिलीवरी मिल जाएगी.’ नीरव ने चहकते हुए कहा।

‘ओके, लेकिन आज डिलीवरी मत ले, कल ले लेना. आज बाकी सब फाइनल करके आ जा.’

‘क्यों?’ उसने चौंकते हुए पूछा.

‘शनिवार है न. मैं तो आज अपनी कार में पेट्रोल तक नहीं डलवाता और तू सीधा मोटर-साइकल की डिलीवरी लेगा स्टुपिड? देख ज़मीन के नीचे से निकलने वाले पेट्रोलियम प्रॉडक्ट, मेटल, गैस और स्टोन्स जैसी तमाम चीज़ें शनि से प्रभावित होती हैं.’ रघु ने आगाह करते हुए कहा.

‘हाऊ सुपर्स्टीशियस यू आर!’ नीरव ने भी जो मुंह में आया, कह दिया. हालांकि तीर कमान से निकलते ही उसे जल्द ही होने वाले इंक्रीमेंट का ख़्याल भी आ गया, पर अकेले में रघु से वह इसी तरह बेधड़क बात करता था. उस पर रघु अनजाने में बाइक ख़रीदने में अड़ंगा डाल चुका था. पर्सनल लाइफ़ में दखलंदाज़ी किसी के भी दिमाग़ का दही कर देती है. उसके दिल में आया कि अभी के अभी सारा ग़ुबार निकाल दे… स्साला… इसके सुपरस्टीशन्स ने चार साल से जीना हराम कर रखा है. कुछ पूछने जाओ, अभी नहीं राहु-काल चल रहा है…! सिग्नेचर लेना हो तो सिर्फ़ ब्ल्यू पेन चाहिए, ब्लैक पेन से इनको पता नहीं क्या प्रॉब्लम है… मंगलवार को चिकन नहीं खाना, सेटर्डे-संडे पीना मना. अब सोचो जो इंसान दिन, टाइम, ग्रह-नक्षत्र देखकर खाता-पीता, उठता-बैठता हो, वह भला जीता कैसे होगा…! अकेला नीरव ही क्यों, रघु के अंधविश्वास भरे व्यवहार से पूरा दफ़्तर परेशान भी था और गाहे-बगाहे इसी बात पर मज़े भी लेता था.

‘ये महज़ अंधविश्वास नहीं है नीरव… ख़ैर, मैंने जो कहना था, कह दिया. शनि को न्यौता देना है तो दो, तुम्हारी मर्ज़ी.’ नीरव से मिली उपेक्षा के बाद रघु की आवाज़ में थोड़ी सख़्ती आ गई. बॉस के बदले सुर नीरव को दोबारा सोचने पर मजबूर करते दिखे. मामले की संजीदगी का कुछ एहसास भी उसे हुआ, लेकिन इससे पहले कि कोई और दुविधा हावी हो और ये रायता और फैले, नीरव ने दो-टूक फ़ैसला सुना दिया,

‘मैं शनि के बाप से भी नहीं डरता रघु. लाइफ़ में कुछ अच्छा हुआ हो तो डरें भी. अब जब सब तरफ़ से लगी पड़ी है तो फिर किस बात की चिंता? तुमने वह शनि-शांति वाला जोक सुना है कि नहीं…? ओके नहीं सुना. अच्छा तो सुनो, एक आदमी शनि-शांति की पूजा करवाने निकला. पंडित ने कहा, “दक्षिणा में हज़ार रुपये लगेंगे.” वह बोला, “हज़ार तो नहीं हैं.” पंडित का दिल पसीजा, बोला, “अच्छा चलो पांच सौ में हो जाएगा.” उस आदमी का फिर वही जवाब, “पांच सौ भी नहीं हैं.” पंडित खीजकर बोला, “अच्छा चलो सौ-पचास तो दोगे!” आदमी बोला, “वह भी नहीं है.” बस पंडित तमतमा गया, “फिर पूजा कराने के लिए क्यों मरा जा रहा है? जब सौ-पचास भी नहीं है तो तेरा शनि भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता…” हमारा हाल भी ऐसा ही है. खोने को कुछ हो तो डरें भी…’

ख़ैर, रघु की नसीहत नज़रअंदाज़ हो गई. नीरव ने बाइक की डिलीवरी शनिवार के दिन ही ली. अब वह कोई संयोग था या फिर दुर्योग, यह कहना मुश्किल है, लेकिन बुलेट ख़रीदते ही लंबे अरसे से ठहरी हुई नीरव की ज़िंदगी ने तेज़ रफ्तार पकड़ ली. रफ़्तार के अपने फ़ायदे हैं तो कुछ ख़तरे भी. यह बात शायद उसे तब तक पता नहीं थी और इस बात का अंदाज़ा तो कतई नहीं था कि उसके पास भी खोने के लिए बहुत-कुछ है…

बग़ैर मास्क वाला सुपर-हीरो और एक डस्की ब्यूटी

ऑफ़िस के पार्किंग लॉट से निकल कर नीरव सीधे बराबर वाले एटीएम में घुस गया. सब ट्रीट मांगने लगे तो! उसने तुरंत पांच हज़ार का विड्रॉवल ले लिया, इस बात से पूरी तरह अनजान कि किसी की पैनी नज़र उसी पर टिकी है. बाहर आकर ऑफ़िस के गेट की ओर बढ़ा ही था कि एक आवाज़ से कदम रुक गए,

‘बदले बदले से जनाब नज़र आते हैं. क्या बात है मियां, बड़े ढीले लग रहे हो?’

नीरव ने पीछे मुड़ कर देखा, अर्पिता थी. अर्पिता सिंह. उसकी टीम की सॉफ्टवेयर डेवलेपर. रंग गेहुंआ. ऑफ़िस में उसे सब ‘डस्की ब्यूटी’ कहते थे, लेकिन पीठ पीछे. पता नहीं, कब-क्या सुना दे. उम्र नीरव से तकरीबन डेढ़-दो साल कम ही रही होगी, 27 के आस-पास. वैसे अर्पिता थी तो बहुत समझदार, लेकिन कई बार अनजाने में या पता नहीं जान-बूझकर ऐसे बचपना दिखा जाती, जैसे बचकानापन कोई नया फ़ैशन हो. पंद्रह दिन पहले उसने ऑफ़िस में अपने होम-सिक फ़ील होने का ख़ूब हो-हल्ला मचाया और छुट्टी लेकर दिल्ली चली गई, अपने पेरेंट्स के पास. फ़िलहाल वह जोगेश्वरी-विक्रोली लिंक रोड की फ़ुटपाथ पर ऑटो वाले से छुट्टे पैसे वापस लेने के इंतज़ार में खड़ी थी. वहीं दूर से उसे नीरव नज़र आ गया था. एटीएम से बाहर आकर नीरव ने ग्लास वॉल पर अपनी झलक देखी, बाएं हाथ में हैलमेट लेकर दाएं हाथ से बाल ठीक किए और बिना अर्पिता की बात पर कोई ध्यान दिए इंटरेंस लॉबी की तरफ़ बढ़ने लगा. पल-भर में अर्पिता ने नीरव में आया यह बदलाव नोटिस कर लिया. ग़ौर करती भी कैसे नहीं, आज तक अर्पिता से इतना भाव किसी ने नहीं खाया था, कम से कम उसके सामने तो बिल्कुल नहीं. हां, ये और बात है कि अपनी पीठ-पीछे ख़ुद पर लिए जाने वाले चटख़ारों से भी अनजान तो वह नहीं ही थी. इसके लिए वह कई बार अपनी सांवली सूरत को जी भरके कोस चुकी थी. नीरव ठहरा गोरा-चिट्टा, टॉल एंड हैंडसम. बिल्कुल मॉडल वाला परफ़ेक्ट लुक, लेकिन फ़िलहाल तो हालत यह थी कि कल तक जिसे वह ऑफ़िस का सबसे ‘कूल डूड’ समझती रही थी, वही इस वक़्त उसे लल्लू लग रहा था. ‘ओ गॉड! यह कैसा दिखता है, कैसे बोलता है, कैसे चलता है! इडियट टाइप!’ फिर उसे अचानक एटीएम के ग्लास-वॉल पर अपना थोबड़ा देख कर बाल बनाने की चुल भला कैसे चढ़ गई! चिढ़ी हुई अर्पिता ने दोबारा सवाल दाग दिया, ‘हेलमेट लेकर ऐसे ही चमका रिया है या सच में नई बाइक ख़रीद ली तूने?’

नीरव ने अर्पिता का सवाल अनसुना करके अपना सवाल दाग दिया,

‘अरे! तू कब आई?’

‘बात मत पलट भूतनी के। जो पूछ रही हूं उसका जवाब दे सीद्धे-सीद्धे.’

अर्पिता का प्यार से बात करने का यही तरीका था. बात करते-करते वह अचानक किसी भी फ़िल्मी किरदार में समा जाती. दिल्ली के शाहदरा की रहने वाली थी. इस्टर्न दिल्ली के शाहदरा सीलमपुर इलाके का डायलेक्ट अक़सर उसकी ज़ुबान पर होता. कभी-कभी उसके बात करने का ढंग लड़कों तक को शर्मसार कर जाता. ऑफ़िस में एक नीरव ही था, जिसके एटीट्यूड से उसे कड़ी टक्कर मिलती थी… पर आज अर्पिता उस पर भी भारी पड़ती दिखी. नीरव ने घबराहट में आस-पास देखा. फिर कोई जवाब दिए बिना वापस अपना सवाल दोहरा दिया,

‘तू आई कब?’

‘अबे दिखाई नहीं देता? लगेज-बैग पर ये देख एयरलाइन कंपनी का टैग?” अर्पिता ने अपने लगेज-बैग से लटका टैग दिखाते हुए कहा. ‘अभी घंटे भर पहले मुंबई लैंड किया है और उतरते ही पकड़ लिया पवई का ऑटो, सीद्धे ऑफिस…’

‘ऐ लो! कर दी न पैसे की बर्बादी. मैंने सुना था चुड़ैलें झाड़ू पर बैठकर अपना सफ़र तय करती हैं. तू तो फ्लाइट पकड़कर दिल्ली से वापस आ गई. कितना लगा, टिकट का…?’

‘ये हुई न बात! अब लग रहा है कि नीरव कांत से मुलाक़ात हो रही है. क्या चूतियों की तरह एटीएम का कांच देखकर बाल बना रहा था? आवारा लौंडों वाली हरकतें न किया कर, सूट नहीं करती तेरे पे.’

‘बेड़ा गर्क… इस चुड़ैल की नज़र पड़ गई. अब हमारी तरफ़ कोई देखने से रही। तूने आते ही नज़र लगाना शुरू कर दिया.’

नीरव की बात सुनकर अर्पिता हंस पड़ी. नीरव भी हंसा, लेकिन अर्पिता को अपने मन में उठे सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला था. दोनों बातें करते हुए अपने क्यूबिकल्स तक आ गए. दूर बैठे रहकर भी दोनों में बातें होती रहीं. यह सब अर्पिता को नीरव की पर्सनेलिटी का बिल्कुल नया रूप लग रहा था. दिमाग़ नीरव में आए बदलाव पर अटका था. नई बाइक के साथ ही क्यों सामने आया नीरव का ये नया रूप? महंगी बाइक आते ही कोई इतना कैसे बदल सकता है? आमतौर पर इतनी बातें कहां करता था नीरव… अक़्सर चुप ही रहता था. नौकरी के लिए ऐसी सीरियसनेस जैसे साल-दो साल में सीईओ बनने का टारगेट हो. बस काम से काम. हालांकि नीरव से ऐसे खुलकर बातें करने के लिए वह ख़ुद तरसती रही थी, पर अब जबकि नीरव ख़ुद उससे ढेरों बातें किए जा रहा था तो न जाने क्यों उसके मन में शक-सा उभर रहा था. रही बात ख़ुद उसके अपने बातूनी स्वभाव की तो अर्पिता का यही स्टाइल था. वह आस-पास हो और बक-बक सुनाई ना दे! ये तो हो ही नहीं सकता. जब तक कोई टेंशन वाला काम सिर पर न आ पड़े, उसकी बातें ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेतीं. पूरा ऑफ़िस जानता है कि उसे ख़ाली छोड़ने का मतलब लास्ट फ्राइडे रिलीज पर कॉमेन्ट्री या फिर किसी पसंदीदा टीवी सीरियल की बात. सास- बहू का ड्रामा उसका फेवरिट था.

अक़्सर कहती कि ऐसे घर में दुल्हन बनकर जाऊंगी, जहां सास नाम की डायन का साया ही न पड़े. एक दिन लंच के वक़्त नीरव के मुंह से ग़लती से निकल गया था कि उसकी मां नहीं हैं. खाना मेड बनाती है. बस उसके बाद से तो मैडम जी का सारा फोकस नीरव पर सिमट गया. नीरव जब भी ऑफिस में दाख़िल होता, उसकी धड़कनें बढ़ जातीं. उससे पहले अर्पिता जब भी लाइफ पार्टनर की बात सोचती थी तो कोई न कोई सुपरहीरो ऊंची-ऊंची इमारतें फ़ांदता हुआ आता और उसे बांहों में उठाकर ले जाता. पता नहीं कितने स्पाइडरमैन, बैटमैन और न जाने कौन-कौन से मास्क वाले हीरो उसकी जागती आखों के सामने तैर जाते थे. इंसानों के लिए मानो उसके सपनों में ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा था. ऐसा नहीं कि उसे अपनी निर्दयी सोच पर लानत महसूस नहीं हुई… थोड़ा-बहुत गिल्ट ज़रूर फील होता था, पर किसी दुष्ट सास के चक्रव्यूह में फंसकर चांस लेने के डर के सामने यह अपराधबोध बेहद मामूली था. अब का सीन तो ये है कि बिना सास वाले घर की आस में वह नीरव की तरफ़ खिंचती चली गई.

सीरियल और हॉलिवुड ही नहीं, बॉलीवुड का मसाला रोमांस भी उसे ख़ूब मज़ा देता था. हिंदी फिल्मों के पागलपन का भूत तो कुछ ऐसा सवार रहता कि अक़्सर वह अपनी नॉर्मल बातचीत भी फिल्मों के

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