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शक्ति प्रकाश जी आपकी कहानी ‘शब्दों के तीर-इसमें नयी बात क्या है?’, को व्यंग्य कहानी प्रतियोगिता का विजेता घोषित किया गया है, कहानी के बारे में हमें विस्तार से बताएं.

ये व्यंग्य है- ‘इसमें नयी बात क्या है’, और मुझे नहीं लगता कि इसे कहानी कहा जाना उचित होगा,  व्यंग्य कथा भी नहीं । व्यंग्य कथा ‘मंगू का हिस्सा’ थी, जो हंस में छपी, ‘ग्रेशम का सिद्धॉंत’ थी जो कथादेश में छपी। ‘इसमें नयी बात क्या है, एक कथात्मक व्यंग्य है, जिसमें व्यंग्य के लिए कहानी का सहारा लिया गया है और कहानी सिर्फ इतना है कि एक व्यक्ति जिसकी बेटी से बलात्कार हुआ है वह रपट लिखाने थाने जाता है, पुलिस वाले उससे अच्छा व्यवहार नहीं करते बल्कि पैसे खा जाते हैं,  बस। बाकी व्यंग्यकार उन परिस्थितियों पर जो कहना चाहता है, जिस विद्रूप को सामने लाना चाहता है वो उसने संवाद के माध्यम से कोशिश की है । जैसा कि मैंने पहले भी कहा और लिखा है कि व्यंग्य भले साहित्य का कोई रस न हो पर व्यंग्य का भी स्थायी भाव मेरे हिसाब से तो  होता है,  जो करुणा या जुगुप्सा हो सकता है,  हास नहीं,   यानी जिसे पढने के बाद आपके अंदर करुणा या जुगुप्सा यानी घिन पैदा हो जो गुस्से में बदले. जैसे इस व्यंग्य के अंत में बलात्कृत लड़की का पिता कहता है – ‘कोई नयी बात नहीं मालिक एक लड़की से जरा सा बलात्कार हुआ है बस’ और पांच सौ का नोट मुंशी की मेज पर रखकर निकल लेता है। उस वक्त पाठक जुगुप्सा के चलते गुस्से तक न पहुंचे तो व्यंग्य व्यर्थ . किसी भी व्यंग्य में  हास हो सकता है पर वह मात्र कथ्य को रोचक बनाने के लिये हो सकता है,  व्यंग्य का उद्देश्य कभी हॅंसाना नहीं होता ।  इसमें नयी बात क्या है व्यवस्था और समाज के चरित्र पर व्यंग्य है , आम और खास का फर्क,  स्त्री और पुरुष का फर्क यही सब दिखाने की कोशिश इस व्यंग्य में है . अब बात कहानी विधा की, मुझे लगता है कहानी सभ्यता के विकास के शुरू में  ही अस्तित्व में  आ गई थी जब मनुष्य के पास भाषा आ  गई थी। भले लिपि नहीं रही  हो पर कहानी किस्सागोई के रूप में मौजूद थी।  बचपन में सुनी जाने वाली पीढ़ी दर  पीढ़ी ट्रांसफर होने  वाली कहानियां जिनको न कहीं लिखा गया था, न जिनका कोई लेखक था, हमेशा रहीं।    पुराण क्या हैं, पंचतंत्र  लेकर गंगाराम पटेल बुलाकी नाई के किस्से, तोता मैना, अलिफ़ लैला से लेकर आधुनिक कहानी तक स्वरूप बदले हैं लेकिन कथा तत्व जैसे  कथानक या फ्रेम , चरित्रों का गढ़ना ,  संवाद,  वातावरण, भाषा-शैली तथा उद्देश्य हमेशा मौजूद रहे, शुरूआती तौर पर इसका उद्देश्य दूसरे  के जीवन में झांकना ( भले काल्पनिक चरित्र हों ) यानी मनोरंजन भले रहा हो पर हमेशा  नहीं रहा अब कहानी बहुद्देशीय विधा है।  बतौर लेखक कहानी वह  आख्यान है जो दो तीन सिटिंग में लिखा जा सके और बहुत हद उतनी ही सिटिंग में पढ़ा जा सके।

व्यंग्य लेखन की आपकी यात्रा कैसे और कब शुरू हुई?

व्यंग्य वर्तमान की विधा है सदैव जीवित  व्यक्ति या प्रवृत्ति पर ही होता है,  यानी जीवित के द्वारा, जीवित पर, जीवित के लिए,  इसलिये इसमें खतरे भी अधिक हैं क्योंकि जीवित व्यक्ति या प्रवृत्ति प्रतिक्रिया भी देती है। इसीलिये व्यंग्य के लिये हिमाकत या सरकशी ज्यादा जरूरी है, जो अपेक्षाकृत छोटे शहरों या कस्बे वालों में होती भी है. मैं हाथरस में पला बढ़ा, हास्य, अन्योक्ति,  कटोक्ति, कटाक्ष हाथरस के चरित्र में है बल्कि मैं कहूँगा जहाँ भी गम्मत, बैठक या अगिहाने की परम्परा जीवित है वहां ये सब है लेकिन उसमे देशीपन है, उसमें हास्य तो है पर वह अपने अंजाम यानी करूणा या जुगुप्सा तक नहीं पहुँचता  इसलिए उसे प्राथमिक पाठशाला ही कहा जा सकता है. तो ये थी शुरू होने की बात जिसके लिए मेरा एक शेर भी है –“सहर जहाँ से शुरू हुई थी, सफर जहाँ से शुरू हुआ था. ये तंग गलियां हैं मेरा मकतब असर जहाँ से शुरू हुआ था”  अब सवाल ये कि अगर ये हाथरस के पानी में था तो पूरे हाथरस को व्यंग्यकार होना चाहिए तो जवाब ये कि वो प्राइमरी स्कूल है,  जहाँ से यात्रा शुरू होती है, बाज लोग प्राइमरी के बीच  में घर बैठ जाते हैं कुछ प्राइमरी के बाद, कुछ जूनियर तक जाते हैं, कुछ सेकंड्री, कुछ ग्रेज्युएशन तक, कुछ डॉक्टरेट भी करते हैं. मैं कहाँ तक पहुंचा  ये निर्णय आप बेहतर कर सकते हैं. तो प्राइमरी के बाद आगे बढे, हाथरस में कोई ठीक ठाक साहित्यकार नहीं था, अपने सामने काका जी थे, निर्भय जी थे. साहित्यक कार्यक्रमों के नाम पर कवि सम्मेलन थे, जिसमें अशोक चक्रधर, शैल चतुर्वेदी, माणिक वर्मा वगैरा सुनने को मिलते थे और अपनी व्यंग्य की दुनिया इससे बड़ी नहीं थी ।गद्य व्यंग्य के नाम पर इन्हीं कवि  सम्मेलनों में के.पी.सक्सेना को सुना जिसमें हास्य अधिक था बल्कि जगदीप टाइप का हास्य, मजा तो आता था।  परसाई का नाम सुना था बस और एकाध व्यंग्य कोर्स में था सो पढ़ा था बल्कि बाँचा था।  शौकिया हाथरस में बहुत लोग लिखते थे जिनमें अपन भी थे लेकिन सब शौकिया था। फिर बेरोजगारी आई तो कुछ कमाने के उद्देश्य से उसी तरह का लिखना शुरू किया जैसा सुना था। निर्भय जी के साथ मंचों पर व्यंग्य कविताऐं पढ़ीं, जब मंचों पर जाने लगे तो घर में पता चला, घर के लोगें ने गंभीरता से सुना तब बड़े भाई साब ने परसाई और शरद जोशी को पढ़ने की राय दी। खास परसाई को पढ़ने के बाद पता चला अब तक समय खराब ही किया और खुद ही अपना काम दोयम दर्जे का लगने लगा। लेकिन उसके बाद नौकरी लग गई तो जो कुछ हल्का फुलका मंचीय मामला था वह भी खतम। आठ साल भोपाल रहना हुआ , ज्यादातर वक्त नौकरी और उसके साथ की टुच्ची सियासतों से बचाव करने में बीता, साहित्यक उपलब्धि बस इतना थी कि रेलवे की एक कहानी प्रतियोगिता के लिये बेरोजगारी में लिखी एक शुरूआती कहानी और एक हफ्ते में लिखी गई कुछ कहानियों को मिलाकर एक संग्रह बनाया और प्रतियोगिता जीती । फिर आगरा तबादला हुआ, यहॉं काम कम नहीं पर सियासत भी नहीं थी तब कुछ गंभीर लिखने का निश्चय किया और उपन्यास शह की जीत लिखा जो हाल में प्रकाशित हुआ। एक और व्यंग्य उपन्यास ‘हजारों चेहरे ऐसे’ लिखा जो 2013 में वाणी से आया।इसी दौरान अखबारों में भी नियमित कालम लिखे। लेकिन जिसे पहचान कहते हैं वह हंस में प्रकाशित  ‘मंगू का हिस्सा’ से मिली, उसके बाद सिलसिला चल निकला, ग्रेशम का सिद्धान्त, कौए की जुबान, कान्दू कटुए, फायनल डेस्टीनेशन कहानियॉं काफी पढ़ी और सराही गईं, इधर ग्यारह साल से रखा 600 पेज का उपन्यास ‘शह की जीत’ भी छपा और यात्रा जारी है । ये कुल सफर है जो हाथरस से शुरू हुआ था इसे नहीं भुलाया जा सकता ।

आपकी आने वाली कहानियां कौन कौन सी हैं और किन विषयों पर आधारित हैं?

मेरा मानना है कि  कहानी लम्बे समय तक लिखने की चीज़ नहीं होती, जब भी कोई  विषय मिल जाये और उस पर मन भी करे तो दो या तीन सिटिंग में हो जाती है  उस तरह  कोई कहानी नहीं लिख रहा हूँ  एकाध  प्रकाशनाधीन अवश्य है. हां, उपन्यास लम्बे समय की चीज़ है अप्रकाशित ही तीन रखे  हैं, चौथा अधूरा है, सौ सवा  सौ व्यंग्य, तीन चार सौ ग़ज़लें हैं. उपन्यासों का बता देता हूँ , एक उपन्यास है “सत्य बोलो मुक्ति है” जो गांधीवाद की प्रासंगिकता और उसके अंधानुकरण  पर है।  दूसरा अंतहीन है जो स्त्री की समग्र दुर्दशा पर है, तीसरा व्यंग्य उपन्यास है – गैंडे की खाल जो हमारे तंत्र की मोटी  चमड़ी पर है, पत्रकार, नेता, अफसर, डॉक्टर, आर-टी-आई, उपभोक्ता फोरम किस तरह आम आदमी का मजाक उड़ाती हैं इस उपन्यास में है।

हिंदी साहित्य में आपके पसंदीदा लेखक/लेखिकाएं कौन हैं और क्यों?

सच कहूं  तो  विज्ञान  विद्यार्थी होने  के कारण मैं बहुत अधिक नहीं पढ़ पाया, मेरे कई पाठक मुझसे अधिक साहित्य पढ़े होंगे। अधिक नहीं पढ़ पाया न इसका गर्व है न शर्म।  जहां तक मैं समझता हूँ पढ़ना लेखन के लिए आवश्यक शर्त है लेकिन पढाई दो तरह की होती है किताबें और समाज।  ये तुलसी और कबीर का फर्क है, मेरे हिसाब से दोनों ने खूब पढ़ा था एक ने किताबें दूसरे ने समाज।  मैंने भी किताबें कम  कमी समाज  पढ़कर दूर करने की कोशिश की है।  इसका मतलब ये भी नहीं कि कतई अंगूठा ब्रांड हूँ , प्रेमचंद और परसाई मेरे प्रिय हैं, मंटो और इस्मत आपा भले उर्दू से हों पर हिंदी में ही इन्हें पढ़ा है।  सवाल ये कि क्यों पसंद हैं तो ये सब के सब एक  जैसे हैं, आसान भाषा, आम आदमी की कहानी, अद्भुत कहन, स्वाभाविक चरित्र, सरकश होकर रुला देने वाले – अब चाहे प्रेमचंद की सिलिया हो, हामिद हो, नमक का दरोगा हो, परसाई का रामदास, इस्मत की बिच्छू फूफी या मंटो की खोल दो या टोबा टेकसिंह।

डिजिटल, सोशल मीडिया के आने से हिंदी लेखकों को कितना लाभ हुआ है?

पहले कागज़ और कलम प्रकट में हुआ करते थे, अब सिर्फ मुहावरों में हैं।  लेखन सीधा कम्प्यूटर पर होने लगा।  लेकिन अभी भी लेखक का मोह कागज़ की किताब से भंग नहीं हुआ है ये भी सच है। प्रिंटेड बुक्स खास  हिंदी में महंगी हैं क्योंकि कम मात्रा में छपती हैं, दूसरा अब लोग  मोबाइल या लैप टॉप में भी पढ़ना चाहते हैं उस लिहाज से डिजिटाइज़ेशन जरुरी तो था और कई  प्रकाशन सामने भी आये हैं। अब बात सोशल मीडिया की उससे लेखक लाभ तो हुआ है क्योंकि सम्पादक,  प्रकाशक नाम के बैरियर हट गए,   नए लेखक जो बेहतर लिख रहे हैं उन्हें जानना सम्भव हुआ।  उदाहरण के लिए पंकज मिश्रा जी हैं जिनकी कोई किताब नहीं आयी उन्हें मैंने फेसबुक पर ही जाना और पढ़ा और  मेरा  आकलन है कि मौजूदा वक्त में उनसे बेहतर व्यंग्य यदि कोई लिख भी रहा हो तो मैंने तो नहीं पढ़ा, और भी कई हैं जो अच्छा लिख रहे हैं और जिन्हें मैंने फेसबुक पर ही जाना। वहीं नुकसान भी हुआ है बैरियर हटने के कारण कोई भी लेखक बन गया,  कॉपी पेस्ट एक राष्ट्रीय  समस्या बन गई , खुद मेरा एक व्यंग्य एक बार कम से कम पचास लोगों ने अपना बना लिया। दूसरा लेखक की ऊर्जा इसी में नष्ट हो जाती है वह इससे इतर कुछ ठोस नहीं कर  पाता जैसे खुद मैंने आखिरी कहानी दो साल पहले लिखी थी उसके बाद लेखन तो जारी है पर वही  रोजाना के कॉलम की तरह।  तो फायदे नुक्सान दोनों हैं, पाठक बतौर फायदे अधिक हैं।

शक्ति प्रकाश का व्यंग्य पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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