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प्रिय श्रीमती गांधी,

वास्तविकइंदिरा गांधी को ढूंढ़ने की जिज्ञासा क्या बेकार है? दोनों तरफ प्रबल अभिप्रेरणाओं द्वारा संतुलित होती हुई आप अंतर्विरोधों की खान थीं। आपने घृणा और प्रेम को आहूत किया, आपने विमुख किया और आकर्षित भी किया, आपने कुछ को निराश किया और अन्य को आनंदित भी किया।1 आपने प्रबुद्धों और विचारकों से नियमित विचारविमर्श किया, फिर भी आप भारत को साहसिक, नई बौद्धिक दिशा देने में नाकाम रहीं? आप खुद को परिवर्तन दूत समझती रहीं मगर अपने पिता की विरासत से बुरी तरह चिपकी रहीं। आप भारत को अपना परिवार जताने का दावा करती रहीं, फिर भी राजनीति के केंद्र में अपने ही परिवार को लाती रहीं। आपने आपातकाल लगाया और आपने ही उसे हटाया भी। आपने उत्तराधिकार परम्परा वाले राजाओं को उनके विशेषाधिकारों से वंचित किया लेकिन लोकतंत्र में उत्तराधिकावादी विशेषाधिकार के सिंद्धांत को लागू किया। बांग्लादेश में लोकतंत्र को बचाने के लिए आपने युद्ध किया, फिर भी आपने भारत से लोकतंत्र को छीन लिया। आपका दावा था कि आप स्त्रीवादी नहीं थीं, फिर भी लाखों के अपनाने के लिए आधुनिक भारतीय स्त्री की छाप छोड़ दी। आपको सुंदरता से प्यार था और पारंपरिक कलाओं को आपने बढ़ावा दिया मगर राजनीति में अब तक जारी विरूपता की परिपाटी डाली। आपने अपने सिख अंगरक्षकों को ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद भी हटाने से इन्कार कर दिया, जिससे यह पता चला कि धर्मनिरपेक्षता के प्रति आप कितनी शिद्दत से समर्पित थीं लेकिन आपकी मौत के बाद छिड़े दंगों में वही आदर्श भस्म हो गया। आप, अपनेजन्म के संयोग के अलावा खुद को आम आदमी कहती थींलेकिन आप विलक्षण महिला थीं जिसने मुख्तलिफ विरासत छोड़ी।

आपने भारत की स्त्रियों के लिए क्या विरासत छोड़ी? क्या आपने स्त्रीवादी होने से कड़ाई से इन्कार इसलिए किया, क्योंकि आपको डर था कि कहीं आप हाशिए पर पड़े जनाने डिब्बे में फंसकर रह जाएं, जबकि आपकी महत्वाकांक्षाएं तो निश्चित रूप में मुख्यधारा से संबंधित थीं? आपने आधुनिक स्त्रीवादी उपलब्धि के आदर्श को स्थापित किया, जिससे हजारों प्रोत्साहित हुए, अनेक महिलापुरुषों ने आपके उदाहरण को अनजाने में ही अपनाया और जीवन में आगे बढ़े। इंदिरा का विचार आज के भारत में भी आधुनिक महिलाओं को परिभाषित कर रहा है। आपने कहा था, ‘महात्मा गांधी ऐसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने महिलाओं के राजनीतिक अस्तित्व के बारे में भी सोचा’, और आप पहली ऐसी स्त्री थीं, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत को यह दिखाया कि भारतीय स्त्री क्या कुछ हासिल कर सकती थी और कितने गर्वोन्नत दृढ़ तरीके से वह अपना सिर, उपलब्धिपरकअनुभवी लोगों के बीच, देश और विदेश में भी ऊंचा रख सकती थी। कटे बालों वाली साड़ीधारी, सार्वजनिक रूप में सक्रिय महिला जिनकी झलक हम आज अनेकानेक अध्यापकों, वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिज्ञों में इंदिरा के आदर्श से कोई कोई प्रेरणा लेते हुए देखते हैं। स्त्रियों का हिंसक उत्पीड़न आज भी व्यापक रूप में जारी है, लेकिन कोई सक्रिय महिला, मामूली ही सही मगर आजादी की जो सांस ले पाती है और भारतीय समाज के कमोबेश सीमित क्षेत्रों में ही सम्मानित पेशेवर की तरह स्वीकार की जाती है, उसमें आपके प्रतीक बने रहने का बहुत बड़ा योगदान है।

इंदिरा के आदर्श ने भारत की स्त्रियों को अपने पर गर्व करने का मौका दिया। ऐसे विषम समाज में जहां आप शक्तिशाली मर्दवादियों से उत्पीड़ित एवं उनकी विजेता दोनों ही भूमिकाओं में रहीं तथा गांवों और कस्बों में आप आज भी शक्ति के अवतार के रूप में पहचानी जाती हैं।

आपने कांग्रेस पार्टी को 1969 में तोड़ कर उसका नाष कर दिया, लेकिन उसके साथ ही अपूर्व पैमाने पर आपने लोकतांत्रिक शक्तियों को जगा भी दिया। आपने भारतीय जनता को ऐसा जागरूक किया, जैसा आपसे पहले कोई भी अन्य राजनेता नहीं कर पाया था। फिर भी आप इसी जागरूकता की शिकार बन गईं, क्योंकि इसने अंततः आपकी तरह की राजनीति को खारिज कर दिया।2

अपने पिता से आप इतनी अधिक भिन्न कैसे हो गईं, उनकी सबसे प्रखर रक्षक के रूप में स्वयं को आंकने के बावजूद आप उनकी राजनीति से लगभग पूरी तरह कैसे कट गईं? जब घर के प्रबंधन अथवा सम्मोहक स्वागत कार्यक्रमों एवं राजकीय भोजों के आयोजन की नौबत आती थी तो आपके मिज़ाज में अत्यधिक सुरुचि और नाज़ुकता परिलक्षित होती थी, लेकिन जब आप सड़क की राजनीति करती थीं, तो आपका यह परिष्कृत रवैया कहां गायब हो जाता था? क्या ऐसा इसलिए था कि आपके चारों ओर जोक्षुद्र व्यक्तिथे उनके लिए आपमें मन ही मन वितृष्णा भरी हुई थी? क्या आप उन्हें सामान्य सम्मान का भी हकदार नहीं समझती थीं? क्या आप रुढ़िवादी आभिजात्य में फंसी लोकवादी थीं, जिनके नजदीक के लोगों के अलावा अन्य सभी को सामान्य समझने के बजाय उन्हें अपनी मर्जी से चलाने अथवा उनकी आकांक्षाओं पर हावी होने को ही ठीक माना जाता था?

आप पारिवारिक संबंधों का मूल्य गहराई तक समझती थीं और अपने घर, बेटों, पुत्रवधुओं और पोतीपोतों में बहुत खुश रहती थीं। आप कहेंगी, ‘मेरा जीवन इतने अधिक उतारचढ़ाव और घटनाओं से लबालब रहा है, लेकिन मैं ये कहना चाहूंगी कि सबसे खूबसूरत लम्हा मुझे तभी लगा, जब मैंने अपने पहले बच्चे को अपनी गोद में लिया।लेकिन क्या आपने कभी रुक कर यह सोचा कि राजनीति में परिवार की क्या भूमिका होनी चाहिए? अपने पिता के विपरीत क्या आप अपनी माता की भूमिका को अपनी राजनीतिज्ञ और नेता की भूमिका से अलग नहीं रख पाईं? वंशवादी उत्तराधिकार आपकी सोच में गहरा पैठा हुआ था। अपने पिता के विपरीत आपने राजनीति में वंशवाद पर कभी भी उंगली नहीं उठाई। आपके पक्ष में यह कहा जा सकता था कि आप भीषण कठिनाइयों से लोहा ले रही थीं और आपको नेहरू की तरह अभूतपूर्व अधिकार हासिल होने का लाभ नहीं था। शायद आपके परिवार के अलावा आप और किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकती थीं।

जगदीश शुक्ला कहते हैं, ‘इंदिरा गांधी को लोग इसी रूप में जानते हैं कि वे हमेशा धर्मनिरपेक्ष रहीं, लेकिन वे धार्मिक आस्था में भी लिप्त थीं।जगदीश के पिता जी.पी. शुक्ला रायबरेली में इंदिरा गांधी के दफ्तर में काम करते थे। शुक्ला याद करते हैं कि वे जब भी रायबरेली आती थीं तो हमेशा बालेश्वर मंदिर और देवी का मंदिर में दर्शन करने ज़रूर जाती थीं।4

साल 1977 के चुनाव में अपनी पराजय के बाद के वर्षों में इंदिरा ने वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर में अनुष्ठान किए थे। उन्होंने वहां अन्नपूर्णा और संकटमोचन मंदिरों में भी दर्शन किए थे। मध्य प्रदेश में सतना जिले में उन्होंने कमलानाथ मंदिर और रामसीताहनुमान एवं सती अनुसूया के मंदिरों में भी दर्शन किए थे। सतना में वे जानकीकुण्ड सरोवर के दर्शन करने भी गई थीं, जहां पुराणों के अनुसार कभी सीता नहाया करती थीं। उन्होंने हेलीकॉप्टर से वैष्णो देवी की भी तीर्थ यात्रा की थी और हेलीपैड से मंदिर तक दो किलोमीटर की यात्रा पैदल की थी।’5 उन्होंने अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाई थी औरदेश के कल्याण के लिए इबादत की थी।उन्होंने अम्बा जी के मंदिर मेंआंख मूंद कर ध्यानकिया था औरसाष्टांग प्रणाम की मुद्रा में एक मिनट तकदंडवत भी किया था।6

इंदिरा की धर्मनिरपेक्षता में कमी थी। इसका कारण यह नहीं था कि उनकी, इसमें आस्था नहीं थी। बल्कि इसकी वजह ये थी कि वे अपने सार्वजनिक और निजी जीवन को आत्मसात अथवा उनमें तालमेल नहीं बैठा पा रही थीं। धार्मिकतापूर्ण निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन में धर्म से दूरी बनाने के संवैधानिक कर्तव्य के बीच जो टकराव हो रहा था उसे दूर करने में नाकाम उनके बीच संतुलन नहीं बैठा पा रही थीं। वे एक तरफ अपने निजी दर्शन और दूसरी तरफ व्यावहारिक शासन की आवश्यकताओं से पैदा हुए द्वैत के बीच सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रही थीं। भारत के सभी पंथों को अपनाने के लिए उन्होंने भरपूर कोशिश की। फिर भी यह बिना जाने कि उसकी कैसी कीमत चुकानी पड़ेगी, उन्होंने राजनीतिक रणनीति के तहत एक धर्म को दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल किया।

धर्म से मुंह चुराते हुए फिर भी उसकी ओर आकर्षित होते हुए और ऊंचे पदों पर मुसलमानों को नियुक्त करने के अलावा धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक रूप में पालन करने की समझ पैदा कर पाने के फेर में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को भ्रमित धर्मनिरपेक्षता के गर्त में धकेल दिया, जिसमें वहहिंदू कार्ड और मुसलमान कार्डको बारीबारी से आजमाने लगीं। कांग्रेस आज तक ऐसा दल बना हुआ है, जो धार्मिक भूमि पर धर्मनिरपेक्ष राज्य के कामकाज की आधुनिक प्रणाली अथवा राजनीतिक दर्शन में धर्म के मानववादी, समावेशी मूल्यों को अपनाने में नाकाम रहा है। उन्होंने किसी साक्षात्कार में कहा था, ‘हमारी संस्कृति और समाज में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। हमारी राजनीति में उसकी कोई जगह नहीं हैहमारी धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म से बैर नहीं है, इसका अर्थ है सभी धर्मों को समान मान्यता मिलेगी। किसी स्थापित धर्म अथवा धर्म द्वारा अधिकृत सरकार का विचार हमारे यहां निषिद्ध है।

मोनी मल्होत्रा कहते हैं, ‘उनमें भारतीयता कूटकूट कर भरी थी, लेकिन वे अपने पिता से अधिक पश्चिमी रंगढंग में ढली हुई भी थीं।उन्होंने मात्र आठ वर्ष की उम्र में स्विट्ज़रलैण्ड के जेनेवा शहर में अकेले अपनी राह ढूंढ़ी थी। उन्होंने स्विट्ज़रलैंड में स्कीइंग की और पेरिस में प्रेम किया। धाराप्रवाह फ्रेंच भाषा बोली, लैटिन भाषा पढ़नी सीखी, ब्लिट्ज़ के दौरान लंदन की खाक छानी, इंग्लैंड में स्कूल की पढ़ाई की; उनके अंतरंग मित्रों में अमेरिकी डोरोथी नॉर्मन शामिल थीं; अपनी इतालवी बहू से उनका जुड़ाव अपनी भारतीय बहू के मुकाबले कहीं अधिक था। उनकी कूटनीति पश्चिम के अंध विरोध से परहेज, महाशक्तियों के सामने बेझिझक अपनी बात कहने और नवउपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष में भारत को सबसे आगे रखने आदि पर आधारित थी। इसके बावजूद उनकी बौद्धिक प्रेरणा में अधिकांश योगदान पश्चिमी जगत का ही था। अमेरिका और युनाइटेड किंगडम में ओपेरा और थिएटर देखने जाना उनके लिए किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं था। साल 1981 में अपनी पेरिस यात्रा के दौरान उन्होंने जॉर्ज पॉम्पिदु सेंटर जाकर वास्तुविदों और विचारकों से मिलने पर खास ज़ोर दिया। उसी दौरे में वे पेरिस के किसी रेस्तरां में घुसीं और वहां मौजूद अन्य मेहमानों का उन्होंने झुककर अभिवादन और खूब मुस्कुरा कर स्वागत किया तथा सटीक फ्रेंच भाषा में अपने खाने की वस्तुओं का चुनाव किया। भारत उत्सव के आयोजन के दौरान लंदन में उन्होंने कैट्स ओपेरा की नई संरचनाओं का मनोयोग से आनंद लिया। वे, न्यूयॉर्क फिलहार्मोनिक ऑर्केस्ट्रा की संगीत संध्याओं में शामिल हुईं। रॉयल बैले में रुडोल्फ न्यूरेयेव का नृत्य देखा और फुक्किनी के ला बोहेमे को सुनने के लिए न्यूयार्क के मेट्रोपोलिटन ओपेरा में गईं। डॉक्टर जिवागो और ब्लैक ब्यूटी उनकी पसंदीदा फिल्में थीं।

अंबिका सोनी याद करती हैं, ‘उन्हें फूहड़पन पसंद नहीं था, भले ही वे चुनाव प्रचार कर रही हों अथवा विदेश में हों। उनके कपड़ों पर सिलवट नहीं होनी चाहिए थी। वे कहती थीं कि राजनीति में होने का मतलब यह तो नहीं है कि आप अपनी पसंद के अनुरूप जी सकें।उषा भगत याद करती हैं, ‘उनकी साड़ियां और अन्य समानात बहुत सोच समझकर तय किए जाते थे और चार्ट के विभिन्न खानों में भरे जाते थे।इंदिरा कभी भी ढीलीढाली नहीं रहीं और हमेशा ढंग के कपड़ों से सुसज्जित और तरोताज़ा चेहरेमोहरे के साथ दिखाई देती थीं। वे अपनी साजसज्जा का मनोयोग से ध्यान रखती थीं और हल्काफुल्का मेकअप एवं पारदर्शी नेल पॉलिश का प्रयोग करती थीं। हबीबुल्ला याद करते हैं, ‘वे अपनी त्वचा पर अनेक किस्म की क्रीम एवं लोशन आदि लगाती थीं तथा अपने हाथों और पांवों का खूब ख्याल रखती थीं। अपने सुंदर होने पर उन्हें बड़ा गर्व था। मैंने उन्हें जब नंगे पांव देखा तो उनके पांवों की त्वचा भी इतनी पारदर्शी थी कि उसमें से नीली नसें झलक रही थीं।

लंदन में भारत उत्सव, साल 1982 में खूब धूमधाम से आयोजित किया गया। एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी ने रॉयल फेस्टिवल हॉल में गायन प्रस्तुति दी और रविशंकर ने सितार बजाया। अंत में जुबिन मेहता संचालित लंदन फिलहार्मोनिक ऑर्केस्ट्रा पर ऊंचे ओहदे वाले अंतरराष्ट्रीय श्रोता के लिए भारत का राष्ट्रगान बजाया गया। ऑर्केस्ट्रा जबजन गण मनकी धुन निकाल रहा था और प्रिंस ऑफ वेल्स उसके सम्मान में सावधान मुद्रा में खड़े थे, तभी पुपुल जयकर ने कनखी से देखा तो आंसुओं से डबडबा आने के बावजूद इंदिरा गांधी की आंखें चमक रही थीं। इंदिरा ने कभी याद किया था, ‘युवाओं को तो याद नहीं मगर विदेशी शासन की सबसे बुरी बात थी लगातार अपमान।यह सचमुच दुखद था कि आप अपने देश में ही लगातार अपमानित होते थे।इंगलैंड के युवराज की उपस्थिति में भारतीय संगीतज्ञ द्वारा अपनी मातृभूमि को आर्केस्ट्रा के माध्यम से श्रद्धासुमन अर्पित किया जाना इंदिरा गांधी के लिए अपने बहुमूल्य देश द्वारा विशिष्ट मुकाम हासिल कर लेने जैसा था, अपने पूर्वजों के प्रति प्रखर देशभक्त का अभिकथन कि वे अभी तक तो देशरूपी जहाज को सुरक्षित चलाने में कामयाब रहीं। साल 1982 के मार्च महीने में लंदन में भारत उत्सव के सुखद अहसास के दौरान घरेलू परेशानियां अल्पावधि के लिए ही सही नगण्य और भुला देने लायक लगी होंगी। भारत उत्सव दरअसल उनकी वांछित शख्सियत देशभक्ति और कलात्मक प्रफुल्लता के मिलेजुले व्यक्तित्व के प्रतिबिंब थे।

नटवर सिंह याद करते हैं, ‘उनके व्यक्तित्व के दो पहलू थे। एक पहलू गर्मजोश, मित्रतापूर्ण और एकदम अनौपचारिक था जब हम राजनीतिक चर्चा नहीं कर रहे होते थे। अलबत्ता राजनीतिक चर्चा के दौरान वे एकदम भिन्न व्यक्ति बन जाती थीं। लेकिन जब वे गुस्से में आती थीं तो वे किसी भी हद तक गिर सकती थीं। आपसे इंदिरा गांधी नाराज हो जाएं तो उससे बुरा अनुभव कुछ नहीं था, लेकिन अगले ही क्षण वे तपाक से कह देती थीं, मुझे खेद है, इसे भूल जाओ।

हबीबुल्ला याद करते हैं, ‘हम में से जब भी कोई उनके कमरे में घुसता था, वे कहती थीं, ‘‘बैठ जाओ, बैठ जाओ’’ किसी बड़ी चाची अथवा बुआ के समान। उनकी निगाह बहुत पैनी थी मगर हमेशा स्नेहमयी रहती थीं, लेकिन कभीकभी वे क्रोधित भी हो जाया करती थीं।वे याद करते हैं कि कैसे मद्रास में हुई किसी बैठक से वे गुस्से में भरी हुईं हाथ में कागजों का पुलिंदा लिए हड़बड़ा कर बाहर निकली थीं। वे जैसे ही बाहर निकलीं उन्होंने पास में डॉक्टर माथुर को खड़े पाया और उनके हाथों में कागजों का वह पुलिंदा थमाते हुए गुस्से में बोलीं, ‘पकड़िए, आप इन्हें रखिए!’ फिर हबीबुल्ला याद करते हैं, ‘उनका व्यक्तित्व बहुत स्नेहमय था

नटवर सिंह कहते हैं, ‘नेहरू खानदान के लोग सज्जनता की हद तक शिष्ट थे। इसीलिए कट्टर प्रतिद्वंद्वी होने के बावजूद मोरारजी ‘‘मोरारजी भाई’’ थे; जगजीवन राम ने भले ही उन्हें छोड़ दिया हो मगर उनके लिए वे हमेशा ‘‘बाबूजी’’ ही रहे। अपने पिता की तरह उनका शिष्टाचार निर्द्वंद्व था।

मोनी मल्होत्रा याद करते हैं, ‘उनके घर में खाना हमेशा सादा मगर स्वादिष्ट बनता था। वे मछली खाने की शौकीन थीं। मुझे याद है कि स्मोक्ड पॉम्फ्रेट बहुधा उनके खाने में शामिल रहती थी।मल्होत्रा को याद है कि वे नए व्यंजन चखने से भी गुरेज नहीं करती थीं, जैसे ऑस्ट्रेलिया के अपने दौरे में वे केकड़े की एक किस्म मोरेटन बे बग्स को चखने पर अड़ गईं थीं। भुना हुआ वील, भाप में बनी मछली और सूफले आदि उनके पसंदीदा यूरोपीय व्यंजनों में शामिल थे।

मल्होत्रा की पत्नी लीला ने जब उत्तर प्रदेश के किसी कस्बे में सुरुचिपूर्ण यूरोपीय शैली के रात्रिभोज का आयोजन किया तो इंदिरा बेहद प्रभावित हुईं क्योंकि उन्होंने व्यंजनों की सूची भी भोजपत्र पर बनाई थी और मिठाई में हॉट लेमन सूफले खिलाया था। डॉक्टर माथुर याद करते हैं, ‘उन्हें बढ़िया खाना खाने का शौक था लेकिन अमूमन वे सादा और मात्रा में बहुत कम भोजन करती थीं, क्योंकि वे मोटे होने के प्रति बहुत जागरूक थीं। वे नियमित योगासन करती थीं और आजीवन उन्होंने अल्कोहल के किसी भी पेय को छुआ भी नहीं।माथुर बताते हैं कि इसके बावजूद वे बेहतरीन व्यंजनों की जानकार थीं, खुद भी बेहतरीन खाना पकाती थीं और हमेशा स्थानीय स्वाद के नए खाने बनाने को उत्सुक रहती थीं।दक्षिण भारत के दौरे में एक बार उन्होंने यह शिकायत की कि उन्होंने मुझे यह तैयार कॉफी कैसे दी जब यहां इनके पास इतनी बढ़िया ताजा पिसी हुई स्थानीय कॉफी उपलब्ध है।

मैरी सैटन ने लिखा, ‘वे अंतरंग, आराम की मुद्रा और उतेजक रूप में बुद्धिमान हो सकती थींदूसरा पक्ष यह था कि वे काम में मशगूल सहज दिख रही हों मगर अचानक क्रोधित हो जाएं।’12 उनके लिए किसी को माफ करना कठिन था और अपमान का बदला लेने से कभी नहीं चूकती थीं, पीड़ित होने की याद उनके दिमाग में हमेशा रहती थी जैसा उनकी बुआ विजयलक्ष्मी पंडित से उनके तनावपूर्ण रिश्तों का लम्बा इतिहास गवाह है। वे जब प्रधानमंत्री बन गईं और उदारमना आसानी से हो सकती थीं तब भी वे अपमान से जुड़ी भावनाओं और अपनी बुआ के प्रति गुस्से से पार नहीं पा सकीं।

मेरी सेटन लिखती हैं, ‘वे भले ही कभीकभी कितनी भी उचाट अथवा पस्त जान पड़ें मगर जब उनके पिता की हितरक्षा का प्रश्न आता था तो उनके लिए वे लावा कांच का सरासर अभेद्य सुरक्षा कवच बन जाती थीं।’14 विदेश में उनके संबंध, विश्व मंच पर भारत को गंभीरतापूर्वक समझा जाए ऐसी उनकी इच्छा और भारत के नैतिक मकसद को पहचाना जाए यह भावना उनके भीतर नेहरू की अंतरराष्ट्रीयता की विरासत को हर कीमत पर संरक्षित करने की जिद से निकली थी। धवन कहते हैं, ‘वे इस बात की हमेशा बहुत परवाह करती थीं कि उनके एवं भारत के बारे में अंतरराष्ट्रीय राय क्या बनेगी, वह उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण बात थी।वह चाहे निर्गुट आंदोलन का नेतृत्व हो अथवा सोवियत नेतृत्व से उनकी निकटता हो, इंदिरा गांधी मानती थीं कि वे दुनिया में भारत के विशिष्ट स्थान की प्रतीक थीं। उनकी विदेश नीति के विचारधारात्मक आधार स्पष्ट थेः वे वैश्विक मंच पर नेहरूवादी उपस्थिति को बरकरार रखेंगी। उनके लिए निर्गुट आंदोलन किसी की आस्था की तरह पवित्र था। इससे उनका परिचय चूंकि उनके पिता ने ही कराया था इसलिए उसके आदर्श उनके मन में रचबस गए थे। वे हमेशा अपनी अलग राह चुनने के भारत के अधिकार को बड़ी शिद्दत से सही ठहराती थीं जो दो परस्पर विरोधी वैश्विक धड़ों से निरपेक्ष था। निर्गुट आंदोलन को आजकल सोवियत समर्थक क्लब कहकर उसका मखौल उड़ाया जाता है लेकिन इंदिरा के लिए यह संप्रभु संस्था का प्रतीक था, औपनिवेशिक शासकों से छीनी गई राजनीतिक स्वतंत्रता की स्वाभाविक परिणति।

मेनका याद करती हैं, ‘वे हम सभी के लिए कुछ कुछ सिखाने वाली मां थीं। मैंने जो पहली पुस्तक लिखी वह पौधों और वृक्षों से संबंधित थी। और यह सब उन्होंने ही शुरू किया था। वे यह हमेशा कहती थीं कि क्या तुम्हें पता है कि यह कौन सा पौधा है और क्या करता है?’ उन्हें जो भी फूल भेंट किए जाते थे उन्हें वे कभी भी फेंकती नहीं थीं, हमेशा ये ध्यान रखती थीं कि उन्हें या तो गुलदानों में सजाया जाए अथवा अन्य लोगों में बांट दिया जाए। उन्होंने कुल्लू घाटी के बारे में लिखा थाःकुल्लू घाटी उन लोगों को आकर्षित करे जो प्रकृति की सुंदरता को सराह सकें और उससे आध्यात्मिक, मानसिक और षारीरिक शक्ति प्राप्त कर सकेंमानवता स्वयं को अप्राकृतिक परिवेश में डुबोती जा रही है क्योंकि अब वह सीधे प्रकृति से अपनी शक्ति प्राप्त नहीं करती।प्रकृति, वन्य जीवन तथा कलाओं का संरक्षण एक मत में समाहितः उन्होंने दिल्ली अर्बन आर्ट्स कमीशन के समान ही बाघ परियोजना पर भी ध्यान दिया क्योंकि यह भारत की सभ्यता और पर्यावरण संबंधी भारत की थाती की रक्षा करने के उनके दृढ़ निश्चय में शामिल था।

इंदिरा के लिए परिवार ही उनका स्वर्ग था। धवन याद करते हैं, ‘वे दोपहर का खाना खाने के लिए जब घर जाती थीं तो इस बारे में बहुत सख्त थीं कि वहां उनके परिवार के अलावा और कोई भी हो वे कर्तव्य की उसी भावना के साथ जीती थीं जो उन्होंने सबसे पहले अपनी मां के प्रति जताई थी, उनकी लगन से देखभाल और ससुरालियों से कमला की रक्षा करने में। उन्हें परिस्थिति की कमान संभालने का अभ्यास था जैसे परिवार का कोई मर्द मुखिया संभालता होगा। मात्र 43 साल की अल्पायु में पति को खो देने के कारण क्या उन्हें मर्द की भावनात्मक उपस्थिति का अभाव खटकता था? साल 1966 में यह अफवाह उड़ी कि काला कांकर के सुदर्शन राजा और उनके मंत्रिमंडल में मंत्री दिनेश सिंह उनके प्रेमी थे और वही उनकी सत्ता का संचालन भी करते थे। उनके ऊपर धीरेंद्र ब्रह्मचारी से उनकी युवावस्था में अंतरंग संबंधों के आरोप भी लगे थे। यह आरोप एम.. मथाई से उनके प्रेमप्रसंग की अफवाहों के अतिरिक्त थे। नटवर सिंह कहते हैं, ‘उनके लिए किसी से प्रेम संबंध बनाना संभव ही नहीं था। पलंग के नीचे भी सुरक्षाकर्मी घुसे रहते थे! उनके साथ अपनी कथित अंतरंगता की अफवाह दरअसल दिनेश सिंह ने खुद ही उड़ाई थी ताकि उन्हें, उसका फायदा मिल सके लेकिन वे जल्द ही किनारे बिठा दिए गए। जाहिर है कि आप कोई लकड़ी के तो बने नहीं होते लेकिन आपको ऐसी ही कीमत चुकानी पड़ती हैआपकी निजी जिंदगी चौपट हो जाती है।

प्रियंका गांधी कहती हैं, ‘उनका सबसे महत्वपूर्ण गुण साहस था। वे असाधारण रूप में साहसी थीं। और सत्ता के प्रयोग में कतई हिचकती नहीं थीं। उन्होंने सत्ता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझा और उसका प्रयोग किया। सोनिया गांधी के विपरीत जो स्वयं को सत्ता का रखवाला समझती हैं और उसके प्रयोग में हिचकती हैं।उनकी पुण्यतिथि पर 2016 में राहुल गांधी ने फेसबुक पर अपनी टिप्पणी में लिखाःमेरी जानकारी में मेरी दादी सबसे बहादुर स्त्री थीं।उनके सभी जीवनी लेखकों ने उनकेकिंवदंतियों जैसे साहस’, ‘अप्रतिम हिम्मतऔरजबरदस्त नायकत्वको इंगित किया। उनकी फुफेरी बहन तथा कट्टर आलोचक नयनतारा सहगल स्वीकार करती है, ‘बांग्लादेश में दखल उनका सबसे श्रेष्ठकाल था।इतिहास में वह सबसे सफल सैन्य दखल था, लेकिन भारत ने ऐसे विशाल स्तर पर मानवीय संकट से भी धैर्य और साहसपूर्वक निपटने में सफलता पाई जैसा दुनिया में कभी नहीं देखा गया था।सिंडिकेट से सींग भिड़ाने, पाकिस्तान पर सैन्य विजय हासिल करने, आपातकाल की आंधियों से निपटने और अंत में भारत की एकता के लिए सबसे निर्णायक हमला करने से सिद्ध होता है कि इंदिरा गांधी जोखिम उठाने के मामले में सचमुच बेहद कड़े दिल की थीं, फिर उनके परिणाम भले ही कितने भी घातक निकलें। स्वाभाविक, दुर्दम्य साहस उनकी विशेषता थी और उन्होंने जब गलतियां कीं तो वो भी पूरी धमक और दुःस्साहसी रवैये से कीं। दुख में वे दक्ष एवं दार्शनिक थीं और कर्तव्य एवं जिम्मेदारी की गहरी भावना से ओतप्रोत थीं। वे सुसंस्कृत सामाजिक महिला होने के साथ ही सड़क पर मुकाबले में माहिर राजनेता, खूबसूरती से संवरने, आकर्षक मेहमाननवाज, संदेहास्पद रूप में परपीड़क गुप्त षड्यंत्रकारी, दृढ़ देशभक्त तथा बेहद दोषपूर्ण लोकतांत्रिक शख्सियत थीं।

वजाहत हबीबुल्ला कहते हैं, ’वे भारत के सभी प्रधानमंत्रियों में सबसे महान थीं। वे ऐसे संकटकाल में भारत की प्रधानमंत्री थीं जब भारत की एकता खतरे में थी। उनके हाथ में नेतृत्व होने के कारण ही देश अखंड रह पाया और अपेक्षाकृत स्थिर भी रहा।वे अपने पिता और पति की तरह लोकतांत्रिक नहीं थीं बल्कि बहुधा लोकतंत्र को अपने मिशन की बाधा समझती थीं। इसके बावजूद वे भारत की कट्टर संरक्षक, देश की सीमाओं और संप्रभुता की अपने प्राणों के बलिदान तक रक्षक रहीं।

प्रिय श्रीमती गांधी

यह पत्र क्यों? यह सारे प्रश्न किसलिए? आपके जीवन और विरासत की ये जांचपड़ताल क्यों? आप सादा थीं मगर पेचीदा भी, कड़क मगर भंगुर भी, न्यारी, राजसी और अहंकारी लेकिन गर्मजोश, परिचित और गहन अंतरंगता से ओतप्रोत भी; आप एकाकी आत्मा थीं जो उत्सव प्रेमी थी, अकेली जिसने मित्रों, रिश्तेदारों और संपर्कों की विशाल शृंखला बनाने के लिए संबंधों को पालापोसा; संवदेनशील लेकिन उदार नहीं, गरीबों की मसीहा मगर मोतीलाल की तरह बड़े दिल वाली नहीं; सार्वजनिक रूप में आप स्त्री से कहीं बढ़चढ़कर थीं, मगर पोषणीयजनानाबल शायद ही, घर में हालांकि आप निश्चित ही समर्पित माता एवं दादी थीं; आप राजनीति में पुरुष और घर पर स्त्री थीं। ऐसी अक्खड़ राजनीतिक योद्धा जिसे घरेलू साजसज्जा में दिलचस्पी थी, प्रधान सेनापति जिसे मेहमाननवाजी में आनंद आता था; आपके भीतर लौह संकल्पशीलता थी जिसने आपके उथलपुथल भरे जीवन में आपकी रक्षा की, आप हमेशा शिष्ट थीं, फिर भी आपने अधिकतर से दूरी का निर्वाह किया। आपको रोमांच से गहरा लगाव था और ऐसी खुरदरी आत्मा जिसने कभी हार नहीं स्वीकारी फिर भी आप अपने आवरण में छुपकर शंकालु एवं डरपोक भी बन जाती थीं। आपने डोरोथी नॉर्मन को लिखा था, ‘अधिकतर लोग क्या द्विव्यक्तित्ववादी ही नहीं बल्कि अनेक व्यक्तित्ववादी नहीं होते? मैं सोचती हूं कि मैं ऐसी ही हूंलेकिन अभी तक मैं यह नहीं समझ पाई कि उन्हें दुनिया के सामने कैसे पेश करूं, अलगअलग लोग मुझे अलगअलग रूप में देखते हैं!’18

मैंने आपको सिर्फ एक ही बार देखा था जब मैं सत्रहवां वर्ष पूरा करने के दौरान स्कूल में पढ़ती थी। तब हम तत्कालीन निराडंबर कलकत्ता हवाई अड्डे पर थे, खाली हॉल, दूधिया बत्तियों से नीचे मैलीकुचैली प्लास्टिक की कुर्सियों पर बिखरती रोशनी के बीच। आप सत्ताच्युत हो चुकी थीं और तब प्रधानमंत्री नहीं थीं। मुझे याद है कि छरहरी, एकाकी, कटे बालों वाली साड़ी पहने महिला दूर से अपने किसी साथी के साथ अंदर आती दिखीं और अन्य यात्रियों से थोड़े फासले से कुर्सी पर बैठ गईं।

वहां कानाफूसी होने लगीःवो इंदिरा गांधी है ना?’ आप एकदम अकेली थीं, आपकी अगवानी करने कोई नहीं आया था, ज्यादातर लोग आपको नहीं पहचानने का ढोंग कर रहे थे, अथवा शायद वे बेहद डरे हुए थे, कुछ लोग तो वहां से हट भी गए थे। मुझे इस सीधीसादी महिला तथा मैंने तस्वीरों में जिस महान प्रधानमंत्री को देखा था उनके बीच में अंतर देखकर झटका लगा। मैं आपसे मिलने के लिए तड़प रही थी और ऑटोग्राफ लेने के लिए आपकी ओर लपकीक्योंकि तब सेल्फी नहीं ऑटोग्राफ ही ले सकते थेजिसे देने से आपने मना कर दिया, आपने पट्टी बंधी अपनी उंगली दिखाई और उदास आवाज में कहा कि आपको उंगली में चोट लगी होने के कारण लिख नहीं पाने का अफसोस है।

आपके पत्रों में बहुधा ऐसे विषयों संबंधी बातचीत होती थी जो पुराने मित्रों के बीच भी मौखिक रूप में उद्धृत करने कठिन थे। आपके भीतर ऐसा लगता है कि नेहरू की तरह मुख्यमंत्रियों के साथ किसी सार्वजनिक मकसद के लिए पत्रों के प्रयोग की क्षमता अथवा इच्छा नहीं थी, ही खुलेआम अपनी आत्मालोचना करने की, क्योंकि आप स्वसीमित एवं संयत थीं फिर भी आपके पत्र आत्मविश्लेषण के दस्तावेज थे, आत्मचेतना की झलकियां, मित्रों के साथ बातचीत जिसमें आपसी समझदारी की अलिखित याचना अंतर्निहित थी। इतिहास से अपना पल्लू बंधे होने की चेतना के कारण आपने अपने पत्रों को आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ा था।

प्रधानमंत्री के रूप में आपकी पहली अमेरिका यात्रा के मौके पर लाइफ पत्रिका ने आपका इंटरव्यू छापा जिसमें आप ऐसा कह रहीं थीं कि आपको मादाम प्राइम मिनिस्टर यानी सम्माननीय श्री प्रधानमंत्री के रूप में संबोधित करना नापंसद था। राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने आपका इंटरव्यू पढ़कर जब भारतीय राजदूत से यह पूछते हुए संदेश भेजा कि आप कैसे संबोधित होना पसंद करेंगी, आपका उत्तर आपकी स्वाभाविक इंदिरा गांधी शैली में ही था।

आपने राजदूत से कहा, ‘आप राष्ट्रपति से कह सकते हैं कि मेरे मंत्रिमंडल के साथी मुझेसर’ (श्रीमान) संबोधित करते हैं। चाहें तो वे भी करें।

इसलिए शायद मुझे भी आपको वही कहकर संबोधित करना चाहिए जब मैंने उतने सारे वर्ष पूर्व दूधिया रोशनी में नहाए कलकत्ता हवाई अड्डे पर आपसे ऑटोग्राफ मांगा था।

इंदिरा गांधीः प्राइम मिनिस्टर सर (श्रीमान प्रधानमंत्री)

ये अंश सागरिका घोष की किताब ‘इंदिरा: भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री’ से लिया गया है. किताब पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

 

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