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जगरनॉट को यह घोषणा करते हए खुशी हो रही है कि हिंदी के अग्रणी प्रकाशकों में से एक वाणी प्रकाशन की किताबें अब हमारे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हो रही हैं. अशोक वाजपेयी, सलमान रुश्दी, उदय प्रकाश, तस्लीमा नसरीन, विक्रम सेठ, अनामिका, संजीव और निर्मल वर्मा जैसे अनगिनत पुरस्कृत और प्रतिष्ठित लेखकों को प्रकाशित करते हुए वाणी प्रकाशन पिछले कई दशकों से हिंदी साहित्य की दुनिया में उल्लेखनीय भागीदारी निभाता आ रहा है. भारतीय भाषाओं के साथ ही, यहां से अंग्रेजी और दूसरी विदेशी भाषाओं से श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद प्रकाशित होता रहा है.

जगरनॉट बुक्स की रेणु अगाल कहती हैं, ‘वाणी प्रकाशन के साथ साझेदारी करके हमें बेहद खुशी हो रही है, जो हिंदी के अग्रणी प्रकाशकों में से एक हैं और जिनके प्रकाशन में प्रतिष्ठित, पुरस्कृत और सम्मानित लेखकों की एक व्यापक सूची शामिल है. यह साझेदारी अब इस विशाल साहित्य को भारत के डिजिटल पाठकों तक लेकर आएगी.’

वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी का कहना है, “वाणी प्रकाशन का हस्ताक्षर उद्देश्य है- ‘सदा समय के साथ’. हिंदी साहित्य को दुनिया भर में फैले पाठकों तक पहुंचाना हम अपना दायित्व समझते हैं. इस मुहिम में जगरनॉट बुक्स के साथ यह सांझा कार्यक्रम इस उम्मीद से शुरू कर रहे हैं कि युवा पीढ़ी और डायस्पोरा उत्तम हिंदी साहित्य को रुचिकर रूप में पा सकेगी.”

वाणी प्रकाशन की स्थापना 55 वर्ष पूर्व प्रसिद्ध विद्वान, शिक्षाविद्, अध्यापक, लेखक, चिंतक व प्रकाशक स्वर्गीय डॉ. प्रेमचन्द्र ‘महेश’ ने की थी. तब से आज तक वाणी प्रकाशन निरन्तर भारतीय इतिहास, साहित्य, कला, संस्कृति, विचार व चिन्तन, सामाजिक-राजनीतिक विमर्श और अनुवाद के आधारस्तम्भ पर क़ायम चिरप्रासंगिक नैतिक मूल्यों को संवारता, सहेजता और उनका प्रचार-प्रसार करता रहा है. वाणी प्रकाशन 32 से भी अधिक विधाओं में बेहतरीन हिंदी साहित्य का प्रकाशन कर रहा है. हम देश के 3,00,000 से भी अधिक गांव, 2,800 क़स्बे, 54 मुख्य नगर और 12 मुख्य ऑनलाइन बुक स्टोर में उपस्थित हैं. वाणी प्रकाशन भारत की प्रमुख पुस्तकालय प्रणालियों, संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन और मध्य पूर्व से भी जुड़ा हुआ है.

जगरनॉट पर वाणी प्रकाशन की किताबें अब उपलब्ध हैं.

इनको पढ़िए

अंधकार काल: भारत में ब्रिटिश साम्राज्य

इस धमाकेदार पुस्तक में लोकप्रिय लेखक शशि थरूर ने सटीकता, प्रामाणिक शोध एवं अपनी चिर-परिचित वाक-पटुता से यह उजागर किया है कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए कितना विनाशकारी था. यह पुस्तक भारतीय इतिहास के एक सर्वाधिक विवादास्पद काल के संबंध में अनेक मिथ्या धारणाओं को सही करने में सहायता करेगी. यहां पेश है पुस्तक का पांचवां अध्याय.

लज्जा

लज्जा’ की शुरुआत होती है 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद तोड़े जाने पर बांग्लादेश के मुसलमानों की आक्रामक प्रतिक्रिया से. वे अपने हिंदू भाई-बहनों पर टूट पड़ते हैं और उनके सैकड़ों धर्मस्थलों को नष्ट कर देते हैं. लेकिन इस अत्याचार, लूट, बलात्कार और मंदिर ध्वंस के लिए वस्तुतः जिम्मेदार कौन है? कहना न होगा कि भारत के वे हिंदूवादी संगठन, जिन्होंने बाबरी मस्जिद का ध्वंस कर प्रतिशोध की राजनीति का खूंखार चेहरा दुनिया के सामने रखा, भूल गए कि जिस तरह भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, उसी तरह पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं. लेखिका ने ठीक ही पहचाना है कि भारत कोई विच्छिन्न जंबूद्वीप नहीं है. भारत में यदि विष फोड़े का जन्म होता है, तो उसका दर्द सिर्फ भारत को ही नहीं भोगना पड़ेगा, बल्कि वह दर्द समूची दुनिया में, कम से कम पड़ोसी देशों में तो सबसे पहले फैल जाएगा. अतः हम सभी को एक-दूसरे की संवेदनशीलता का ख़याल रखना चाहिए और एक ऐसे सौहार्दपूर्ण समाज की रचना करनी चाहिए जिसमें हिंदू, मुसलमान तथा अन्य सभी समुदायों के लोग सुख और शांति से रह सकते हैं.

लता सुर-गाथा

उनकी आवाज़ से चेहरे बनते हैं. ढेरों चेहरे, जो अपनी पहचान को किसी रंग-रूप या नैन–नक्शे से नहीं, बल्कि सुर और रागिनी के आइने में देखने से आकार पाते हैं. एक ऐसी सलोनी निर्मिति, जिसमें सुर का चेहरा दरअसल भावनाओं का चेहरा बन जाता है. कुछ-कुछ उस तरह, जैसे बचपन में परियों की कहानियों में मिलने वाली एक रानी परी का उदारता और प्रेम से भीगा हुआ व्यक्तित्व हमको सपनों में भी खुशियों और खिलोंनों से भर देता था.

कुछ तो कहिए

मशहूर और मकबूल शायर गुलज़ार की गजलें और त्रिवेणियां

बस इतनी सी थी कहानी

“जब एअरपोर्ट पर सीआरपीएफ के जवान किसी आधी सुनी कहानी का अन्त पूछने लग जायें, जब कोटा के प्रतियोगी परीक्षाओं के छात्र कहें कि कहानियां सुनते-सुनते उनकी गणित की पढ़ाई अच्छी हो जाती है, जब दादियां पोतियों-पोतों के साथ टीवी छोड़ के रेडियो पे कहानियां सुनें, जब डिप्रेशन के मरीज कहें कि कहानियां सुन के उनका इलाज हुआ…तब सर झुका कर कुदरत की इस करवट का इस्तकबाल करना चाहिए. क्योंकि कहानियों का मौसम आ गया.”

कायांतर

जयश्री रॉय के चौथे कहानी-संग्रह की कहानियों में स्थान, समय और संवेदना के समुच्चय का सघनतम स्वरूप मौजूद है. नितान्त अलग परिवेश और पर्यावरण की कहानियों को रचनात्मक संवेदना की समान तीव्रता के साथ कथात्मक विस्तार देना जयश्री की विशेषता है. अबूझ और चौंकाऊ शिल्प-विन्यास के फैशन से अलग कहानीपन के ठाठ को जिन्दा रखते हुए ये कहानियाँ लिंग, जाति और वर्ग के जटिलतम अन्तर्द्वन्द्वों से लेकर बाज़ार और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के गूढ़तम यथार्थ तक को बहुत ही सहजता से उद्घाटित करती हैं.

 

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