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आज से कई वर्ष पहले जब इंटरनेट की लहर भारत में अपने पैर जमा रही थी, तब एक बड़े स्तर पर हिंदी भाषा और उसके अस्तित्व को लेकर चिंता की जाने लगी थी.

इस भाषा से जुड़े लेखकों, बुद्धिजीवियों को लगने लगा था कि बाज़ार के दबाव के कारण हिंदी साहित्य और ज़बान दोनों ही हाशिए पर धकेल दिए जाएंगे.

लेकिन हम देखते हैं कि ये सभी चिंताएं काफ़ी हद तक ग़लत साबित हुईं, इंटरनेट ख़ासकर सोशल मीडिया पर हिंदी ने भी अपनी पैठ उतनी ही बनाई, जितनी अन्य भाषाओं ने.

एक अरब सत्ताईस करोड़ आबादी वाले भारत में हिंदी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है, ऐसे में इतनी बड़ी जनसंख्या को बाज़ार भी दरकिनार नहीं किया सकता था, यही वजह रही कि गूगल, याहू जैसे सर्च इंजन, फेसबुक जैसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफार्म इस भाषा से जुड़े एक बड़े तबक़े को अपने साथ लेकर चलने का काम कर रहे हैं, साथ ही साथ, हिंदी समाचार चैनल, वेबपोर्टल, ई-पेपर्स भी इस ज़बान की आबादी को साथ लेकर चलना चाहते हैं.

हिंदी ज़बान और इसके साहित्य के बारे में कहा जाने लगा था इन्हें पढ़ने वाले लोगों की संख्या कम होती जा रही है, क्योंकि नौजवान इनसे किनारा कर रहे हैं. लेकिन यहां पर भी हम देखते हैं सोशल मीडिया पर युवा वर्ग के बीच पिछले 3-4 सालों में ज़बरदस्त रेस्पॉन्स मिला है.

इंटरनेट ने नई नस्ल को हिंदी में लिखने का एक ऐसा प्लेटफार्म मुहैया कराया, जो इससे पहले शायद ही उनको मिला था. इसने अब तक आबादी के वंचित रहे हिस्सों और तबकों, ख़ासकर औरतों और पिछड़े और दलित समुदायों से आने वाले लोगों को अपनी आवाज उठाने का जरिया मुहैया कराया है. और इस नज़रिए ने इन युवाओं के पास समाज को देखने, लिखने की भरपूर आज़ादी दी है, जिसके बिना आज के समाज की कल्पना करना बेमानी होगा.

दूसरी तरफ, ई-बुक्स, बुक ऐप्स, हिंदी पोर्टलों आदि ने हिंदी साहित्य को फ़िर से जीवंत कर दिया है. यहां पर एक ही समय में, पुस्तक समीक्षाएं, कविता लेखन, ग़ज़ल, लघु, कहानियां पढ़ने को मिलता हैं, और हम पाते हैं कि हिंदी प्रकाशन अपने पारंपरिक रूप से आगे बढ़ रहे हैं.

हिंदी जबान में ही उर्दू के कवियों, साहित्यकारों को पढ़ने वाले पाठक आज भी बड़ी संख्या में हैं. यही वजह है कि जगरनॉट के मोबाइल ऐप और वेबसाइट पर जितनी ई-बुक्स डाउनलोड कर के पढ़ी गईं उनमें अल्लामा इक़बाल की ‘अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमां तेरा है या मेरा’ और सआदत हसन मंटो की ‘खुशिया’ शामिल रहीं.

साथ ही जगरनॉट ऐप पर शहीद भगत सिंह की ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ को सबसे अधिक डाउनलोड किया गया. बेहद लोकप्रिय कहानियों में सोनम गुप्ता की लिखी कहानी ‘हवा हवाई’ और देवयानी खोब्रागढ़े की ‘लाहौर इश्क़ का शहर नहीं’ को सबसे ज़्यादा सराहा गया.

एक सर्वेक्षण के अनुसार इस समय भारत भर में 800 मिलियन लोग सोशल मीडिया का किसी रूप में उपयोग कर रहे हैं, जिसमें हिंदी भाषा में लिखने वाले काफ़ी तादाद में हैं. इसमें पढ़े-लिखे और शहरी तबके से लेकर दूर दराज के गांवों-कस्बों में रहने वाले लोग शामिल हैं और इस पूरे समुदाय में लैंगिक, जातीय, भाषाई, आर्थिक, सामाजिक और आयु संबंधी काफी विविधताएं हैं.

 

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