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मैं सही आदमी को कैसे पहचानूंगी? उसकी आंखों में देखकर। मैं चेहरा बहुत अच्छा पढ़ती हूं। मेरी नज़र कभी धोखा नहीं खाती। जिस पल मैं सही आदमी को देखूंगी, मुझे पता चल जाएगारेखा

बदलाव समय का संस्कार है। एक कमला (इल्ली) वक़्त के साथ ख़ूबसूरत तितली में बदल जाता है; मद्रास, कॉस्मोपॉलिटन चेन्नई बन जाता है, बंबई, मुंबई में तब्दील हो जाता है और भानुरेखा गणेशन, ग्लैमरस रेखा बन जाती है। कहने को सब अपनी जड़ों से दूर, लेकिन फिर भी मूल रूप से मानो सबकुछ वहीं थमा हुआ, मानो कुछ भी बदला न हो। हम इन सब शहरों में जाएंगे क्योंकि यहां अतीत की कहानियां क़ैद हैं। कहानियां उस शख़्सियत की, जिसकी ज़िंदगी और जिसके प्यार के चर्चे पिछले चार दशक से थमने का नाम नहीं लेते। मगर सबसे पहले हम चलेंगे दिल्ली, क्योंकि यही वो शहर है जहां से वो अमरपक्षी की तरह राख से उठ खड़ी हुई थी।

ये उसकी कहानी है। ये देश में उदारीकरण से कुछ साल पहले की बात है। दिल्ली के धनाढ्य वर्ग ने दक्षिण दिल्ली के छत्तरपुर की तरफ़ अपने पांव पसारने शुरू कर दिए थे। 80 के दशक के आख़िर के सालों में अगर आप क़ुतुब मीनार से आगे बढ़कर गदईपुर की तरफ़ ड्राइव करते, तो एक सुनसान सड़क से होते हुए आपकी नज़रें कई फार्महाउसों से गुज़रतीं। ज़मीन के बड़े-बड़े टुकड़ों पर बनी कई महलनुमा कोठियां- फार्महाउस। इन्हीं में से एक फार्महाउस का नाम था-बसेरा।

इसका गेट खुलते ही आप मानो एक दूसरी दुनिया में पहुंच जाते थे। ये सपनों का घर था। खूबसूरत पत्थर और शीशे की कारीगरी से लबरेज़, पहाड़ पर बना हुआ ये आलीशान फार्महाउस चारों तरफ़ से घने पेड़ों से घिरा हुआ था। ये घर मुकेश अग्रवाल का था।

एक मध्यवर्गीय बनिया परिवार में जन्मे मुकेश ने 13 साल की उम्र में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। कई साल तक वो छोटे-मोटे काम करता रहा। फिर 1970 के दशक के अंत में, 24 साल की उम्र में मुकेश ने अपनी एक कंपनी की नींव रखी। ये कंपनी हॉटलाइन ब्रांड के नाम से किचन का सामान बनाती थी। मुकेश के अतीत के पन्ने पलटते हुए मेरी मुलाक़ात मुकेश के दोस्त रहे रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर नीरज कुमार से हुई। नीरज कुमार दिल्ली के पुलिस कमिश्नर रह चुके हैं। मुकेश और नीरज कुमार की मुलाक़ात उस वक़्त हुई थी जब हॉटलाइन ब्रांड ने उत्तर भारत में धूम मचाई हुई थी। नीरज कुमार बताते हैं, ‘मुकेश अग्रवाल अपनी मेहनत के बल पर उस दौर में कामयाब उद्यमी बना जब आजकल की तरह स्टार्टअप परिदृश्य सामने नहीं आए थे।’

एक साधारण पृष्ठभूमि से आए मुकेश को हमेशा से दिल्ली का अभिजात वर्ग बेहद आकर्षित करता था। उसके दिल में इस वर्ग का हिस्सा बनने की गहरी चाहत थी। इस समाज में अपना सिक्का जमाने के लिए मुकेश ने अपने फार्महाउस में भव्य पार्टियों का आयोजन शुरू कर दिया। दिल्ली के बड़े-बड़े रईस इन पार्टियों की रौनक़ बढ़ाते नज़र आते थे। दिल्ली में बॉलीवुड की कोई भी हस्ती आई हो, मुकेश उसे अपनी पार्टी में बुलाना नहीं भूलता था। उसे याद करते हुए नीरज कुमार कहते हैं, ‘वो बहुत अच्छा इंसान था, बेहद भला, लेकिन उसमें हीन भावना थी। वो दिखाना चाहता था कि उसने ज़िंदगी में बहुत कुछ हासिल किया है। वो अपनी कामयाबी का डंका पीटना चाहता था।’ इसी सनक में मुकेश अक्सर अजीबोग़रीब हरकतें भी करता था ताकि किसी तरह बड़े लोगों की नज़र में आ जाए। ‘उसने एक घोड़ा ख़रीदा जिसे वो अपने फार्महाउस में रखता था। जब किसी मेहमान के आने की ख़बर होती तो वो गेट के पास घोड़ा सजा कर उसके ऊपर बैठ जाता और मेहमान का इंतज़ार करता। ये घोड़ा भी कोई मामूली घोड़ा नहीं था बल्कि महंगी नस्ल का घोड़ा था। शायद इसका फायदा भी हुआ क्योंकि बॉलीवुड की कई हस्तियां उसकी दोस्त बन गई थीं। वो संजय ख़ान और फ़िरोज़ ख़ान को भी जानता था। ये घोड़े वाली अदा शायद उसने फिरोज़ ख़ान से ही सीखी थी,’ नीरज कुमार याद करते हैं।

दिल्ली में ये वो दौर था जब हिंदी फिल्मों की ग्लैमरस स्टार रेखा और मशहूर फ़ैशन डिज़ायनर बीना रमानी की अक्सर मुलाक़ात होती थी। ऐसी ही एक मुलाक़ात  में रेखा ने कहा कि वो शादी करके सेटल होना चाहती हैं। तलाश थी तो बस एक अदद हमसफ़र की जिसके साथ वो पूरी ज़िंदगी गुज़ार सकें।

1990 का आगाज़ ही हुआ था कि बंबई में, जो अभी मुंबई नहीं बना था, एक शाम रेखा के घर के फोन की घंटी बज उठी। फोन पर दिल्ली से बीना रमानी थीं। वो रेखा की बात उनके एक ‘दीवाने फैन’ से कराना चाहती थीं। बीना ने बताया कि ये दीवाना फैन दिल्ली का एक जाना-माना बिज़नेसमैन है और बेहद अच्छा इंसान है, ‘इसका नाम मुकेश अग्रवाल है। क्या मैं इसे तुम्हारा नंबर दे दूं?’ रेखा ने अपना नंबर देने से मना कर दिया लेकिन ख़ुद बीना से मुकेश का नंबर ले लिया।

उन लम्हों में शायद रेखा को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि ये फोन कॉल उनकी ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल कर रख देगी।

रेखा की ज़िंदगी की तरह ही मुकेश के जीवन की कहानी भी फिल्मी थी। रेखा की ही तरह मुकेश को भी कभी एक सही हमसफ़र नहीं मिल सका था।

वाकए को याद करते हुए रेखा ने बाद में एक इंटरव्यू में कहा, ‘बीना रमानी ने मुझे मुकेश से मिलवाया उस था। शुरू में मुझे उसमें ज़रा भी दिलचस्पी नहीं थी। बीना के बार-बार कहने पर मैंने मुकेश को फोन किया।’

दोनों के बीच पहली बातचीत बेहद औपचारिक थी लेकिन कहते हैं मुकेश पूरी तरह से रेखा की ख़ूबसूरत आवाज़ का दीवाना हो गया था। वो फिल्मस्टार जिसपर लाखों लोग फ़िदा हैं, उस रेखा ने उसे फ़ोन किया था, ये सोचकर ही मुकेश के पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। रेखा ने पहला क़दम उठा लिया था।

आख़िरकार जनवरी, 1990 में रेखा और मुकेश की पहली मुलाक़ात बंबई में हुई। फिल्म इंडस्ट्री के झूठे दिखावे और पाखंड से थक चुकी रेखा के लिए मुकेश ताज़ा हवा के झोंके की तरह था। उसकी सरलता और ईमानदारी में रेखा को एक सच्चाई का अहसास हुआ।

उसने रेखा को दिल्ली आने के लिए भी मना लिया। जल्द ही छतरपुर में ‘बसेरा’ रेखा की मौजूदगी से दमक रहा था। लेकिन ये चमक शायद रेखा को बंबई फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध से अलग लग रही थी। जो तारीफें, सम्मान और स्वागत यहां मिला, उसने रेखा का दिल जीत लिया। दोनों के बीच एक अजीब बंधन था और एक दूसरे की तरफ़ आकर्षित होने की अपनी-अपनी वजह: मुकेश को रेखा की स्टार वाली छवि से प्यार थे और रेखा अपने प्रति उसके दीवानेपन को पसंद करने लगी थी।

बंबई में मुकेश की एक क़रीबी दोस्त थीं अभिनेत्री दीप्ति नवल। दोनों की मुलाकात 1981 में दिल्ली में एक पार्टी में हुई थी। तब से वो अच्छे दोस्त थे। दीप्ति ने बताया, ‘जबसे मुकेश की रेखा से फोन पर बात हुई और फिर दिल्ली और बंबई में मुलाकातें हुई थीं, तबसे मुकेश बस उसी का ज़िक्र करता रहता था। मुझे लगता है वो रेखा का दीवाना हो गया था।’

रेखा और मुकेश ने एक दूसरे के अतीत में झांकने की ज़रूरत नहीं समझी। दोनों ने भविष्य के बारे में भी ज़्यादा नहीं सोचा। जो कुछ था वो बस ये पल थे, जब वो साथ थे। प्यार में डूबे हुए।

रेखा: कैसी पहेली ज़िंदगानी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

ब्लॉग में लगी फोटो किताब से ली गई है.

 

 

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