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डाल्टनगंज की पहाड़ी पर घने जंगलों के बीच एक गांव है, नाम है कामकी. कामकी के उत्तर में एक नदी बहती है, जिसे कोइल कहते हैं. गांव के दक्षिण में जो नदी बहती है, उसका नाम है कन्हार. कन्हार का रास्ता पहले अलग था, दिशा दूसरी थी. वह जाकर सोन नदी में मिल जाती थी, किंतु कालांतर में जनसंख्या बढ़ी, लोगों की आवश्यकताएं बढ़ीं तो उनका लोभ भी बढ़ा. लोगों ने पेड़ काटे, नदी के रास्ते को रोका, उसपर अपना अधिकार जमाया, अपना घर बसाया. कन्हार ने वर्षों तक सब कुछ देखकर भी अनदेखी की. फिर एक रात कुछ सोचकर उसने अपनी दिशा बदली, सैकड़ों-हज़ारों गावों को रातों-रात डुबो दिया. लोगों से उनकी धरती छीनकर उनका जीवन तबाह करते हुए जाकर कोइल में मिल गई.

कामकी बच गया. वहां के लोग नदी को मैया मानते हैं. जंगल उनका देवता है. कन्हार ने उन पर दया कर दी, अपनी धारा ऊपर-ही-ऊपर लिए उत्तर-पश्चिम की ओर मुड़ी और आगे जाकर कोइल में मिल गई. तब से कन्हार कामकी को दक्षिण और पश्चिम में घेरकर बहती है, बहुत सटकर नहीं, पांच-दस गांव छोड़कर बहती है.

गांव के लोग दोनों ही नदियों को कोइल मैया कहते हैं. आज से नहीं, पुरखों के काल से ही. कामकीवासी ख़ुश थे कि कोइल उन्हें घेरकर बहती है, उन्हें अपने आंचल में समेटकर बहती है. चारों ओर कोइल से घिरे थे. बस एक पतला-सा भू-खंड उन्हें बाक़ी दुनिया से जोड़ता था. कोइल देवी की कृपा थी! छोटा-सा तो गांव था, जिसमें कुल तीस से चालीस परिवार बसते होंगे. कुछ तो रोज़गार की खोज में शहर चले गए, फिर कभी लौटकर नहीं आए. कामकी के अतिरिक्त उसके आसपास दस और गांव रहे होंगे. सब एक जैसे ही थे.

सुधानी कुम्हार उसी कामकी गांव का रहनेवाला था. वह दयालु हृदय का था और बहुत मधुर स्वभाव था उसका. राह चलते यदि किसी चींटी पर भी नज़र पड़ जाती तो पैर इतनी सावधानी से ज़मीन पर रखता कि चींटी कहीं दबकर मर न जाए. बचपन में ही बाबा ने उसे समझाया था कि‍ चप्पल पहनकर चलना ठीक बात नहीं है. नंगे पैर चलने से छोटे-छोटे जीव-जंतु भी सुरक्षित रहते हैं. गांव के बाक़ी लोगों की तरह सुधानी भी मानता था कि इस संसार में सबकुछ भगवान की इच्छा से घटित होता है. उसकी इच्छा हो तो नदियों और नहरों का जल पलभर में सूख जाए, धरती खंड-खंड होकर अभी तुरंत बिखर जाए, अग्नि अपनी दाह खोकर एकदम ठंडी पड़ जाए, वायु से उसकी गति छिन जाए और ऊपर फैला अनंत आकाश चरमराकर धरती पर आ गिरे.

सुधानी के पास दो चाक थे, वे पुरखों के समय से चलते आ रहे थे. चाक को नचाकर, उसपर मिट्टी रखकर, अपने हाथ से अलग-अलग आकार में ढालकर बर्तन बनाना उसका पुश्तैनी काम था. उस मिट्टी से वह तरह-तरह के बर्तन बनाता… छोटी-सी लुटिया, गोलाकार थाली, पानी पीने के लिए ग्लास, छोटी-सी चम्मच, पानी रखने के लिए मटका… और भी बहुत कुछ. और बर्तन बनाते-बनाते मिट्टी के इस खेल को देखकर वह दो पंक्तियां गुनगुना उठता-

‘‘मन का मटका फूटि के, ओहि घाट चलि जाए

ज्यों यह मटका फूटि के, माटी संग मिल जाए.’’

उसने बचपन में ही ये पंक्तियां अपने बाबा के मुंह से सुनी थीं. बाबा कहते थे कि जिसने बर्तन को सही ढंग से ढालना सीख लिया, समझो उसने सीखने लायक सबकुछ सीख लिया. सुधानी इस बात का अर्थ कभी नहीं समझ पाया.

कामकी के लोग सुधानी की बनाई थाली में खाते थे और उसकी बनाई लुटिया में ही पानी पीते थे. कोइल मैया की बहती हुई जलधारा में मिट्टी की लुटिया डुबाकर, उसमें लबालब पानी भरकर, उससे प्यास बुझाने में जो तृप्ति मिलती है, उसमें जो आनंद है, वह तो कामकी के लोग ही जानते थे.

सुधानी की पत्नी का नाम था माया. मितभाषी, व्यवहार-कला में कुशल और सुधानी की तरह ही करुणा की बहती हुई दरिया थी माया. गांव के लोग उसकी बुद्धि और परख के कायल थे. दोनों की शादी हुए दो वर्ष बीत चुके थे, लेकिन संतान के बिना घर अभी तक सूना था. सुधानी की मां को दिन-रात बस इसी बात की चिंता खाए जा रही थी. उसके पति तो लगभग पांच साल पहले ही उसे छोड़कर देवलोक विदा हो गए थे. बस बहू की गोद भर जाए तो उसका जीवन भी पूर्ण हो जाए. फिर ख़ुशी-ख़ुशी वह भी इस संसार से विदा हो जाएगी. बस इसी एक बात की चिंता थी उसे. उसने सुन रखा था कि कोइल मैया की बहती हुई जलधारा में पेड़ से झड़कर धरती पर बिखरे हुए फूलों की भेंट चढ़ाने से मैया ख़ुश होती हैं.

एक दिन उसने माया से कहा, “बेटी, मेरे पैरों में अब ताक़त नहीं कि इतनी दूर जाकर कोइल मैया को फूल चढ़ा सकूं. तू चाहे तो कर सकती है, तीन महीने, सूरज के उगने से पहले.”

“किसलिए मां जी?” बहू ने पूछा.

“मेरी बात मान ले बेटी, कल से यह नियम साध ले, तीन महीनों के लिए, सूरज के उगने से पहले. मैया ख़ुश होती है, कृपा होती है,” मां ने समझा दिया. माया समझ गई और फिर तपश्चर्या प्रारम्भ हो गई.

मां ने सुधानी से कहा, “बेटा, तू भी सुन, सुबह उठकर सबसे पहले जंगल देवता के भजन गा.”

सुधानी ने कोई उत्तर नहीं दिया.

“तू ज़िद्दी है. कब तूने अपनी मां की बात सुनी है, जो आज सुनेगा!” मां ने जैसे नाराज़ होते हुए कहा.

कोइल मैया प्रसन्न हुई. माया के गर्भ ने सांस ली. मां ने अपने हाथ से लड्डू बनाए, उसे हर घर में बांटा. फिर नवें महीने की प्रतीक्षा में एक-एक दिन गिनना शुरू कर दिया.

सुधानी का जीवन पहले की तरह चलता रहा. माया की दिनचर्या में भी कोई अंतर नहीं आया. पहले की तरह भोर होते ही उठकर दिन का खाना बना लेती. फिर पति के साथ बैठकर, मिट्टी गूंधकर, उसे चाक में नचाकर बर्तन बनाना शुरू कर देती.

“ये बर्तन-वर्तन अभी छोड़, समय अनुकूल नहीं है, अनुभव से कह रही हूं,” माया को मां समझाती.

सांझ होते-होते सुधानी नीचे तराई में बर्तन बेचकर लौट आता. ख़रीदने वाले अब पहले से कम थे, लेकिन जेठ में जमकर बिक्री होती. सूरज के डूबने से पहले माया भी बकरी का दूध बेचकर लौट आती. फिर अंधेरा होने के पहले तीनों खाना खाकर आराम करते. जैसे सरल लोग, वैसी ही सुलझी हुई दिनचर्या.

दिन बीते, रातें बीतीं, समय किसी अक्लांत राही की तरह अनवरत आगे बढ़ता गया. देखते-ही-देखते नवां महीना भी पूरा होने को आया.

उस रात माया ने नींद में एक स्वप्न देखा. घने जंगल के एक हिस्से में आग लगी थी. गांव के लोग जंगल छोड़कर भाग खड़े हुए. कोहराम मच गया. जानवर प्राण-रक्षा के लिए दौड़े. धुआं चारों ओर फैल गया. पक्षीगण उड़कर दूर चले गए. लोग दूर खड़े हताशा से देख रहे थे. तभी जंगल के दूसरे हिस्से से दस वर्ष का एक बालक अंदर घुसा. उसके चेहरे पर एक अद्भुत शांति थी. माया के मन में ममता उमड़ आई. बालक को आग की ओर बढ़ते देखकर उसे रोकने के लिए वह एकदम से भागी. लेकिन बालक उससे बहुत दूर था, तेज़ क़दमों से चलता हुआ वह आग के पास जाकर खड़ा हो गया.

लोग दम साधकर देख रहे थे. कौन है यह लड़का? पहले तो कभी नहीं देखा इसे? क्या बाहर का है? बाहर का है तभी मूर्ख की तरह आग की ओर बढ़ रहा है. जंगल की आग है यह, इसकी लपटें बड़ी भयावह होती हैं. पलभर में राख कर देती हैं, लेकिन इसका चेहरा तो देखो. कैसी दृढ़ता है! और कैसी शांति छाई है! लोग दम साधकर देखते रहे. लेकिन माया व्याकुल थी. कितना मासूम है बच्चा! कहीं उसे कुछ हो गया तो? नहीं, उसका तो जीवन तबाह हो जाएगा. अधिक सोचने का समय नहीं था. झट-से वह बच्चे की ओर दौड़ पड़ी.

तभी सबने देखा कि आग की लपटें बालक के ठीक सामने आकर अचानक शांत हो गईं. बालक ने जिधर-जिधर दृष्टि डाली, आग उधर शांत होकर तुरंत बुझ गई. पलभर में चारों ओर शांति छा गई. जो वृक्ष आग से जल गए थे, उनमें प्राण लौट आए. उनकी टहनियां फिर से हरी-भरी हो गईं, उन पर पत्तियां निकल आईं. जंगल फिर से हरा-भरा हो गया. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उस बच्चे ने घूमकर एक बार माया की ओर देखा, मुस्कुराया, फिर टहलता हुआ जंगल के दूसरी ओर चल पड़ा. माया सम्मोहित-सी उसके पीछे खिंची जा रही थी. तभी उसकी नींद टूटी. उसे रोमांच हो आया. उसने देखा प्राची के क्षितिज से ऊपर आकर सूर्यदेव अपनी सुनहरी किरणों से जीवन का संचार कर रहे थे.

उस दिन सुधानी बैठकर चाक चला रहा था. माया खाट पर पड़ी देख रही थी. मां ने भांप लिया कि अब समय बहुत कम है. गांव में महिलाओं को सूचना दे दी गई. गांव की पालकी भी धो-पोंछकर तैयार कर ली गई.

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