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यासिर उस्मान एक पुरस्कृत टीवी पत्रकार हैं और बेस्टसेलिंग किताब राजेश खन्ना: कुछ तो लोग कहेंगे के लेखक हैं। अभिनेत्री रेखा की चर्चित जीवनी के लेखक यासिर उस्मान बता रहे हैं फिल्मी सितारों की जीवनियां लिखने के अपने अनुभव के बारे में:

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मेरी किताब रेखा: कैसी पहेली ज़िंदगानी और इसके अंग्रेजी संस्करण Rekha: The Untold Story को प्रकाशित हुए एक साल भी पूरा नहीं हुआ है. लेकिन इस वक़्फ़े में इसके चार संस्करण और 20,000 से ज़्यादा प्रतियां बिक गईं. सिनेमा से जुड़ी एक अनधिकृत जीवनी के लिए ये आंकड़े हिम्मत बढ़ाने वाले हैं. ख़ासतौर से जब फिल्म इंडस्ट्री से वरिष्ठ लोगों और मीडिया ने इस किताब के बारे में कई हौसला बढ़ाने वाली बातें कहीं.

इस किताब को लिखते वक़्त एक लंबा अरसा रेखा से जुड़े लोगों से मिलने की कोशिश में गुज़रा. ख़ुद रेखा भी जानती थीं कि मैं ये किताब लिख रहा हूं. लेकिन कोई भी पत्रकार या फिल्म निर्माता ये बता सकता है कि उनसे मिलने की कोशिश पर भी एक किताब लिखी जा सकती है.

फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग आजकल ख़ुद अपने संस्मरण या आत्मकथा लिखने लगने लगे हैं. इस ट्रेंड से सिनेमा के कई अहम दौर डॉक्यूमेंट हो रहे हैं. ये कमाल की बात है. लेकिन अक्सर समय बीतने के साथ-साथ जब सितारे बड़े होते जाते हैं तो पुरानी घटनाओं को एक रंगीन चश्मे से देखना चाहते हैं. या उन्हें पूरी तरह नकारना चाहते हैं या फिर छुपाना चाहते हैं. इन हालात में घटनाएं अपने संतुलित रंग में नज़र नहीं आतीं. कई बार ये पीआर एक्सरसाइज़ या एक फैन लेखक के श्रद्धा भाव से सराबोर नज़र आती हैं. ये सब फॉर्मेट बाज़ार में उपलब्ध है और इनके पाठक भी हैं.

पहले राजेश खन्ना और फिर रेखा पर लिखने के बाद मेरे दिल में इन दोनों शख़्सियतों के लिए इज़्ज़त बढ़ती गई. लेकिन एक पत्रकार के तौर पर मुझे ये भी लगता है कि कई घटनाएं ऐसी हैं जिनके ज़िक्र के बिना कहानी पूरी नहीं होती. राजेश खन्ना की कहानी अमिताभ के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता और रेखा की कहानी उनके पति की ख़ुदकुशी या अमिताभ के साथ उनके कथित रिश्ते के बिना. सच के ऊपर आदर की चादर चढ़ाना यहां सही महसूस नहीं हुआ.

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मुझे उम्मीद थी कि इन कहानियों की गूंज पाठकों के दिलों में बस जाएगी. ऐसा हुआ भी. एक ऐसी महिला जो सिर्फ अकेलेपन से जूझती रही. उसे कभी किसी मर्द ने बराबरी का रिश्ता या दर्जा नहीं दिया. लेकिन फिर भी उसने हार नहीं मानी. हर बार दोगुने साहस के साथ उठी, निजी ज़िंदगी में भी और करियर में भी. उमराव जान  बनाने वाले मुजफ्फर अली ने मुझे बताया  था, ‘वो बहुत बड़ी अभिनेत्री तो नहीं थीं लेकिन रेखा की आंखों में गिरकर उठने की एक कैफ़ियत थी इसलिए हमने उन्हें उमराव जान बनाया’.

वो औरत जिन्हें अपनी भव्य कांजीवरम साड़ियों और डीवा  इमेज लिए ज़्यादा जाना जाता है, उनके यादगार प्रदर्शनों के लिए कम. जिनकी मांग में भरा सिंदूर तो गॉसिप में रहता है, लेकिन बचपन में मिले गहरे घावों की बात नहीं होती. मेरा प्रयास ईमानदारी से उनकी पूरी कहानी को संतुलित, निष्पक्ष तरीके से एक सूत्र में पिरोने का था, ताकि इसे एक नए परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके. मुझे ख़ुशी है कि पाठकों ने इसके नए आयाम को समझा.

पहले से कहीं ज्यादा, ऐसी कहानियां कहने की ज़रूरत हैं, क्योंकि शोषण की प्रवृत्ति पुरानी है, लेकिन जीत की कहानियां बहुत कम. किसी भी आम इंसान की तरह ये सितारे भी जूझते हैं – नाकामी से, रिश्तों की उलझन से, अकेलेपन से. इन हालात से लड़कर कामयाबी के शीर्ष तक पहुंचने की दास्तान पाठकों को खुशी भी देती हैं और उम्मीद भी. यही वजह है कि रेखा की किताब के साथ पाठकों ने ज़बरदस्त जुड़ाव महसूस किया. कई पाठकों के ख़त आज भी मेरे मेलबॉक्स का पता ढूंढ़ ही लेते हैं.

एक टीवी प्रोड्यूसर और पत्रकार के तौर पर मुझे सालों से फिल्मस्टार्स के इंटरव्यू करने का मौक़ा मिलता रहा है लेकिन ये किताबें लिखते समय मुझे उनकी एक अलग ही तस्वीर नज़र आयी. वो सबकुछ जो किसी फिल्म में होता है, इनकी असली ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है.

अब ये बेस्टसेलर किताब जगरनॉट प्रकाशन के एप पर हिंदी में उपलब्ध होने वाली है. मुझे उम्मीद है कि फोन के ज़रिए अब ये और हजा़रों नए पाठकों तक पहुंचेगी. मुझे आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा.

आप पाठकों की पसंद और नापसंद दोनों सिर आंखों पर. आप हैं तो हम हैं.

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यासिर उस्मान की किताब रेखा: कैसी पहेली ज़िंदगानी  यहां उपलब्ध है: https://goo.gl/39cQIN

 

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