By

रेखा से शादी के करीब सात महीने बाद 2 अक्तूबर 1990 के उस रोज़ मुकेश काफी खुश नज़र आ रहे थे। उस दिन को याद करते हुए मुकेश के बड़े भाई अनिल गुप्ता ने कहा, ‘वो सुबह-सुबह जल्दी उठ गया और मेरे कमरे में आकर लेट गया। हमने साथ नाश्ता किया। उसने मेरी पत्नी से कहा कि वो लंच बनाकर रखें क्योंकि वो डेढ़ बजे वापस आएगा।’घर से निकलकर मुकेश आकाश बजाज से मिलने गए। दोनों में सामान्य बातचीत हुई। कुछ देर में वहां से निकल कर वो अपने फार्महाउस बसेरा की तरफ़ बढ़ चले। फार्महाउस में उन्हें सामने ही अपना कुक नज़र आया। मुकेश ने मुस्कुराते हुए उससे कहा कि उन्हें बहुत भूख लगी है और वो उनकी सारी पसंदीदा चीज़ें बनाए। ‘मैं अपने कमरे में सो रहा हूं। जब तक खाना तैयार न हो जाए मुझे मत जगाना,’ ये कहकर मुकेश अपने कमरे में आराम करने चले गए।

अंदर कमरे में रेखा की यादें थीं। आज सुबह से अपनी मुस्कान के पीछे, वो शायद इन यादों का दर्द छुपाए हुए थे या फिर शायद…अपना इरादा। मुकेश ने कमरे में ही रखा रेखा का दुपट्टा उठाया और उसका फंदा तैयार किया। फिर वो अपने बेड पर चढ़ गए। उस फंदे के सिरे को अपने डबल-बेड के ऊपर पंखे से बांधा और उस फंदे से झूल गए। पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक मुकेश चाहते तो खुद को बचा सकते थे। उन्हें बस अपने पैर वापस बेड पर रखने थे। लेकिन उन्होंने अपनी टांगों को मोड़ लिया और तब तक मोड़े रखा जब तक उनके जिस्म से आखिरी सांस नहीं निकल गई और उनका शरीर बेजान नहीं हो गया।

कई बार खुदकुशी और रिश्तों में नाकामी के बाद इस बार मानो उनके इरादे में एक संकल्प था कि वो हर हाल में मौत को गले लगाकर रहेंगे।

नीरज कुमार उन दिनों दक्षिण दिल्ली के डीसीपी पद पर तैनात थे। छतरपुर इलाक़ा, जहां मुकेश ने ख़ुदकुशी की थी, उन्हीं के कार्यक्षेत्र में आता था। शाम तक जब उन्हें मुकेश की मौत की खबर मिली तो वो अपने घर पर थे। उन्हें ये पता चला कि मुकेश की लाश को उनका परिवार फ्लैगस्टाफ रोड, सिविल लाइन्स में उनके भाई के बंगले पर ले गया है। ‘मुझे ये बात सुनकर बहुत चिंता होने लगी क्योंकि आत्महत्या महरौली में हुई थी और लाश को सिविल लाइन्स ले जाया गया। और मेरे अलावा मेरी डिस्ट्रिक्ट या महरौली पुलिस स्टेशन में इस घटना के बारे में किसी को पता भी नहीं है।’ डीसीपी होने के नाते वो एक अजीब उलझन में पड़ गए। अगर मुकेश की लाश का पोस्टमॉर्टम के बिना अंतिम संस्कार कर दिया गया तोविवाद खड़ा हो सकता था। ‘मैं सिविल लाइन्स पहुंचा और उनके भाई अनिल गुप्ता कोअलग ले जाकर बात की,’ नीरज बताते हैं। उन्होंने अनिल से कहा कि वो लाश को ले जाने आए हैं। अनिल को ये बात सुनकर झटका लगा। वो बोले कि इससे उनके परिवार को औरज़्यादा दुख होगा। ‘ये आपकी समस्या है लेकिन मुझे तो लाश को ले जाना होगा। इसका पोस्टमॉर्टम कराना ज़रूरी है क्योंकि ये एक असामान्य मौत है। ये एक आत्महत्या है,’ नीरज बोले। उन्होंने ये भी कहा कि ये केस पेचीदा है क्योंकि मुकेश की पत्नी एक मशहूर हीरोइन हैं। रेखा भले ही यहां मौजूद नहीं थीं लेकिन जो घटनाएं घटी थीं उनके भंवर में वो भी बहुत जल्दी फंसने वाली थीं।

1986 में आई एक फिल्म नगीना में अभिनेत्री श्रीदेवी ने एक इच्छाधारी नागिन का किरदारनिभाया था। ये फिल्म ब्लॉकबस्टर रही थी। इस फिल्म ने श्रीदेवी को सुपरस्टार बना दियाथा। नगीना इस दौर की पहली बॉलीवुड फिल्मों में से एक थी, जिनका सही मायनों में एक सीक्वल बना था। कई मौकों पर श्रीदेवी ने ये माना कि रेखा ने उन्हें उनके बोलने के तरीके,और मेकअप वगैरह को लेकर जो सलाह दी थी उससे उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में अपने कैरियर के शुरुआती दौर में काफी मदद मिली।

नाग-नागिन के सब्जेक्ट पर आधारित शेषनाग (1990) के साथ ही रेखा भी नगीना जैसी कामयाबी की उम्मीद कर रही थीं। जीतेंद्र के साथ उनका गाना ‘हमें आसमां ने भेजा इस जहां में’ काफी हिट हो चुका था। रेखा को उम्मीद थी कि ये फिल्म कामयाब होगी और इंडस्ट्री में उनकी शानदार वापसी होगी। शेषनाग एक बड़े बजट की फिल्म थी जिसमें ऋषि कपूर, अनुपम खेर और माधवी जैसे सितारे भी अहम रोल निभा रहे थे।

मगर इस फिल्म के रिलीज़ होने के कुछ समय बाद ही हर तरफ़ मुकेश की मौत की खबर सुर्खियों में छा गई। समाज ने मानो फैसला सुना दिया कि इस मौत की ज़िम्मेदार रेखा ही हैं। जगह-जगह लोगों ने शेषनाग के पोस्टरों पर छपे रेखा के चेहरे पर कालिख पोतनी शुरू कर दी। कुछ जगह पर तो उसपर गोबर भी फेंका गया।

और इस तरह से देशभर में उन्हें डायन बताकर उनपर निशाना साधा जाने लगा।

नीरज कुमार याद करते हैं, ‘रेखा मुकेश के अंतिम संस्कार में नहीं आईं। मुझे लगता है वो पहले ही इस रिश्ते से आगे बढ़ चुकी थीं।’ रेखा को मुकेश की मौत की ख़बर न्यूयॉर्क में मिली जहां वो एक स्टेज शो के लिए गई हुई थीं। उन्होंने फौरन अनिल गुप्ता की पत्नी को फोन किया जिन्हें वो मिट्ठो भाभीजी कहती थी। उन्होंने रेखा से कहा, ‘तुम अपना ध्यान रखना, हमसब तुम्हारे साथ हैं।’ लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

मीडिया के लिए मुकेश की आत्महत्या की खबर सबसे बड़ी सनसनी थी। इसकी कवरेज मेंइस्तेमाल की गई हेडलाइन्स भी मानो चीख़ती हुई सी थीं- ‘द ब्लैक विडो’ (शोटाईम, नवंबर1990) और ‘द मकाबर ट्रुथ बिहाइंड मुकेश सुसाइड (सिने ब्लिट्ज़, नवंबर, 1990)। दिल्ली की हाई सोसाइटी और बंबई फिल्म इंडस्ट्री ने भी मुकेश अग्रवाल की ‘हत्या’ के लिए रेखा कीज़बरदस्त निंदा की। मुकेश की मां ने बेटे की मौत के बाद बिलखते हुए कहा, ‘वो डायन मेरे बेटे को खा गई। भगवान उसे कभी माफ नहीं करेगा।’2 मुकेश की मां के ये शब्द सुर्खियां बने और रेखा को पूरी तरह मुकेश की मौत का ज़िम्मेदार ठहरा दिया गया।

भाई की मौत से गुस्साए अनिल गुप्ता ने कहा, ‘मेरे भाई ने रेखा से सच्चा प्यार किया। उसके लिए प्यार ज़िंदगी और मौत का सवाल था। रेखा ने उसके साथ जो किया, उसे वो बर्दाश्तनहीं कर सका। अब उसे क्या चाहिए। क्या वो हमारा पैसा लेना चाहती है?’3

आकाश बजाज भी गुस्से से भरी हुई थीं, ‘मैं मुकेश की मौत से बेहद गुस्से में हूं और उससे सवाल करना चाहती हूं जिसकी वजह से ये हुआ। मैं उससे पूछना चाहती हूं कि उसने ऐसा क्यों किया?’

इस घटना पर दीप्ति नवल भी खुलकर बोलीं, ‘उसे (रेखा को) ये अहसास भी नहीं है कि मुकेश को खोकर उसने दुनिया का वो इकलौता शख्स खो दिया है जिसने उसे उसके अतीत के जानते हुए भी, हर हाल में उसे कबूल किया था। वो शख़्स जो उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करता था,’ कहते-कहते दीप्ति रो पड़ी थीं। ‘मैंने देखा था कि मुकेश किस तरह फोन पर फरज़ाना से गुज़ारिश कर रहा था कि वो उसकी रेखा से बात करा दे। वो एक बच्चे की तरह रो रहा था कि ‘प्लीज़…प्लीज़ मेरी उससे बात करा दो’ और पता है फरज़ाना ने क्या कहा था? ‘सॉरी, उनके वकीलों ने उनसे कहा है कि वो आपसे बात ना करें।’ मैं ये नहीं कह रही कि सारी गलती रेखा की ही थी। मुझे तो कुछ भी नहीं पता। लेकिन रेखा को उनकी तरफ थोड़ा-सा संवेदनशील होना चाहिए था।’

वक़्त ने उन्हें ऐसे मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर दिया था जहां अमर पक्षी (फ़ीनिक्स) की तरह अब उन्हें एक बार फिर राख से उठकर खड़ा होना था। ऐसे हालात उन्होंने पहले भी देखे थे,ऐसी मुश्किल डगर से वो पहले भी गुज़र चुकी थीं। वो लड़ना जानती थीं। जीतना जानती थीं।

पूरी किताब पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

 

 

Leave a Reply