जेएनयू से जगरनॉट: एक किताब की कहानी सुनिए चिकी सरकार से

चिकी सरकार बता रही हैं कन्हैया कुमार से अपनी पहली मुलाकात के बारे में

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उस शुक्रवार की रात मेरे ट्विटर फीड में कन्हैया कुमार ही छाए हुए थे – वो हर कहीं थे और ज़मानत पर रिहा होने के बाद जो रोमांचक भाषण उन्होंने दिया था, उसे ट्विटर पर बार बार शेयर किया जा रहा था और बार बार उसे लोग सुन रहे थे. मैं खुद को इन सबके बारे में सोचने से रोक नहीं पा रही थी और फौरन मैंने अपने एक कलीग को फोन किया, जो उन्हें जानते थे, यह पता लगाने के लिए कि क्या एक किताब के सिलसिले में उनसे मिला जा सकता है. इसी को लेकर मैंने अपने एक दूसरे लेखक दोस्त को भी कॉल किया.

आखिरकार मैं उनसे एक इतवार की दोपहर मिल सकी – मुझे जेएनयू के भीतर ब्रह्मपुत्र होस्टल के उस छोटे से, मद्धिम रोशनी वाले कमरे में ले जाया गया, जिसके बाहर खूब सारी हलचल थी. करीब के टेबल पर कुछ नौजवान टेबल टेनिस खेल रहे थे और ऐसा लग रहा था कि वे इसे हमेशा से खेलते आ रहे थे. आखिरकार कन्हैया आए. वे कुछ दूसरे नौजवानों से घिरे हुए थे. कमरे के बाहर टेबल टेनिस का खेल जारी था. हमने थोड़ी सी बात की – मैं अपनी टूटी-फूटी हिंदी में उनसे बातें करने की कोशिश कर रही थी; वे बेबाक और धाराप्रवाह जबान में अक्सर बड़े लेखकों को उद्धृत करते हुए बोल रहे थे – इस दौरान मैंने उन्हें बताया कि जगरनॉट क्या है और क्यों हम चाहते हैं कि वे हमारे लिए लिखें. उन्होंने मुझसे कहा कि वे इसके बारे में सोचेंगे; उम्मीद रोशन हुई.

हमारी दूसरी मुलाकात में उन्होंने सीधे सीधे कहा, ‘किताब आपकी है.’ उन्हें लगता था कि एक युवा (और डिजिटल) प्रकाशक होने के नाते हमारा नजरिया एक दूसरे से मिलता-जुलता था. एक युवा छात्र नेता होने के नाते वे चाहते थे कि पूरा युवा भारत इस किताब को पढ़े – जिसमें वे जेल के अपने अनुभव को लिखने जा रहे थे जिसे उन्होंने बिहार से तिहाड़ नाम दिया था और जिसमें वे अपने आदर्शों के बारे में बताने जा रहे थे. और उनका नजरिया भी हमसे मिलता-जुलता था. उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने वाल्टर बेंजामिन को हिंदी में पढ़ा था और मुझे बताया कि वे अपनी छोटी उम्र से ही राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे हैं; वे अपनी गांव की जिंदगी की तस्वीर अपने पाठकों के लिए खींचना चाहते थे और ये बताना चाहते थे कि बिहार के एक गांव में युवा आदर्शवादी इंसान होने का मतलब क्या था. उन्हें यकीन है कि भारत में और दुनिया में इन्कलाब आएगा और उनका जोश से भरा आदर्शवाद बस रोमांचित कर देने वाला था.

कन्हैया की टीम गजब की है: बाहर एक युवा कार्टूनिस्ट खड़े थे जो जेएनयू की दीवारों पर नारे लिख रहे हैं. हमने उनसे किताब का कवर डिज़ाइन कराने का फैसला किया. उनके एक दूसरे दोस्त हैं जो सोशल मीडिया में डूबे रहते हैं और वे भी किताब में अपना योगदान देंगे. मैं उन बातों के बारे में सोचने लगी थी जो हम किताब के साथ करने वाले थे – और इस पूरे दौरान बाहर टेबल टेनिस का खेल आज भी जारी था.

आखिरी बार जब मैं कन्हैया से मिली, वे बेहद थके हुए थे (वे अभी अभी हैदराबाद से लौटे थे). हमने दूध पत्ती चाय पी और फिर उनका चेहरा खिल उठा. वे अपनी सारी थकान भूल चुके थे.

 

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