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यूं तो प्रेम इनसान के भीतर की सतह पर एक यूनिवर्सल सा अहसास है, मगर इज़हार से लेकर व्‍यवहार के स्‍तर पर जाटलैंड में यह अलग होता है. इसे न तो आम बोलचाल की जबान में इश्‍क- मुहब्‍बत कहते हैं, ना प्रेम, ना ही अमूमन प्‍यार. अब पिछले कुछ सालों में ज़रूर ये बदलाव पूरी हिंदी पट्टी के साथ आए हैं कि इस तरह के कुछ शब्‍द इस्‍तेमाल में आने लगे हैं, पर जाटलैंड में उनका बर्ताव भी थोड़ा मुख्तलिफ ही मिलता है. जाटलैंड में शायद अंदाज़े बयां कुछ यूं हो:

  • फलाना लड़का उस लड़की के साथ फंसा हुआ है.
  • लड़की उससे सैट हो रखी है.
  • दोनों आजकल पतंग उड़ा रहे हैं.
  • मोहन की छोरी और सुरजे का छोरा आजकल हिंडे ले रहे हैं. मतलब झूले झूल रहे हैं
  • वो देो, आशिक जा रहे हैं, भाई रास्‍ता देणा जी उनको.
  • उनका चक्‍कर सा चल रहा है.
  • शरमा मत, बहुत घुमा रहा है आजकल, पूजा को, हमको भी खबर रहती है, आर्य समाज की जरूरत होवै या कोर्ट में गवाह बनना हो तो हमीं काम आएंगे बेट्टे! सुण, भाइयों से बना के रख!  
  • पूरी मंडी में ऐसे आशिक ना देखे भई.   
  • जाट की खाट पर ठाट ले रही है वो तो आजकल.
  • जवानी में हमने भी लव किए हैं, फेर घरआले जाटणी ले आए तो तीन फूल से टाबर कर लिए लव के चक्‍करां में.

बहरहाल, इजहार के लिहाज से जाटलैंड का प्रेम औपचारिक शायद ही कभी होता हो, तार जुड़ने लगते हैं तो यह रस्‍मी लगता है, ‘बात करने का जी करता है’ से लेकर ‘अब तो बात किए बिना रहा ही नहीं जाता’, ‘जी सा नहीं लगता तेरे बिना’ शायद बेस्‍ट एक्‍सप्रेशंस है जिनके जरिए सारा प्रेम उंडेल दिया जाता है और पहुंच भी जाता है.

अभी भी यानी इक्‍कीसवीं सदी में भी जाटलैंड में प्रेम और प्रेमविवाह आम बात नहीं है, लगभग तीन चौथाई विवाह तो अब भी शुद्ध रूप से अरेंज ही होते हैं, लोग मजाक में कहते हैं कि भाई हमने तो लव शादी के बाद ही किया और इसका नतीजा और सबूत ये दो तीन बाल गोपाल हैं, देख ले.

प्रेम करना यूं भी आसान नहीं. छोटे कस्‍बों और गांवों में बात करने और फिर मिलने जुलने के अवसर अब भी जुगाड़ने पड़ते हैं. छड़ों यानी अकेलों के लिए तभी एक जोक बन गया कि उनकी प्रार्थना सुब‍ह- सुबह यही होती है कि हे भगवान! हमको भी कोई मिसकॉल मारने वाली दे दे, हमें कौनसा मोबाइल में इतना बैंलेंस छाती पर धर के लेके जाणा है. और ज्यादातर कोई मिलती भी है फोन का बैलेंस कम करने वाली तो वो अक्सर जान पहचान के दायरे से आती है. दोस्‍त की बहन, सहेली के भाई की प्रेम के पात्र के रूप में संभावना ज्‍यादा होती है क्‍योंकि उसमें मिलने के अवसर आसानी से मिलते हैं. मजेदार बात है कि ऐसा भी इस जाटलैंड में ही हो सकता है कि सैटिंग होने के बाद लड़की लड़के के सबसे प्रिय दोस्‍त को भाई बनाले या लड़का प्रेमिका की सहेली को बहन, और राखी बांधने वाले भाई बहन के रिश्‍ते होते हैं, कई बार जिंदगी भर भी निभाए जाते हैं, प्रेमी, प्रमिका की शादी हो जाए तो भी, और प्रेम टूट जाए तो भी ये भाई बहन का प्‍यार बना रहता है.

समान गोत्र यानी कहने को समान जाति में प्रेम पर तो इधर दंगे हो ही जाते हैं, पंचायतें बैठ जाती हैं, अंतरजातीय, अंतरधार्मिक प्रेम भी आसान और कतई आम नहीं है. पर प्रेम तो सदियों से दिलों का सौदा है, पींगे आसमान में भरता है, हो जाए तो मरने-मारने की नौबत आ जाती है, दो लोगों के आपस मिलने के लिए, और दूसरी तरफ से उनको ना मिलने देने के लिए. प्रेम के बैरी चाहे हो हज़ार पर दिल है कि मानता नहीं.

तो ‘वाया गुड़गांव’ मुहब्‍बत जिंदाबाद!      

अगर आपने अभी तक यह उपन्यास नहीं पढ़ा है तो यहां पढ़ सकते हैं.

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