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“अगर संजय को इस बात का पता रहा होता कि उनकी मां के लिए कितने कठिन दिन आने वाले थे तो शायद उन्होंने कुछ अलग तरह से बर्ताव किया होता। नरगिस को हमेशा थकान महसूस होती रहती थी और उनका वज़न भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा था। पहले पहल दत्त परिवार को ऐसा लगा कि काम का बोझ बहुत अधिक होने के कारण और सांसद होने के कारण उनको दिल्ली बार-बार जाने के कारण ऐसा हो रहा था, लेकिन डॉक्टरों के यहां कुछ बार जाने के बाद यह पता चला कि नरगिस को डायबिटीज़ हो गया था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी बेहद व्यस्त दिनचर्या को बदलने से साफ़ इन्कार कर दिया और पहले की तरह ही काम में डटी रहीं।”

29 जुलाई 1980 के दिन मुंबई के प्रसिद्ध सी रॉक अस्पताल में संजय के लिए जन्मदिन की पार्टी का आयोजन किया गया, जहां उनकी दूसरी फिल्म की घोषणा की गई-रॉकी अभी रिलीज़ भी नहीं हुई थी और संजय को दूसरी फिल्म युद्ध का प्रस्ताव भी मिल गया था, जिसका निर्देशन गुलशन राय के बेटे राजीव राय द्वारा किया जाना था। नरगिस इस बात से तो खुश थीं कि उनका बेटा अगली फिल्म साइन कर रहा था, लेकिन दिल्ली में होने के कारण वह पार्टी में शामिल नहीं हो पाईं।

संजय की पार्टी के चार दिन के बाद नरगिस की हालत बिगड़ गई। उनको तत्काल मुंबई लाया गया। मुंबई हवाई अड्डे पर उनकी हालत इतनी खराब हो गई थी कि वह चल भी नहीं पा रही थीं। नरगिस को जल्दी से ब्रीच कोडी अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने आशंका यह जताई कि उनको पीलिया हो गया था। जिस समय नरगिस को अस्पताल में भर्ती करवाया गया, उस वक्त संजय ड्रग्स के नशे में थे, उनको अपनी मां की बिगड़ती सेहत के बारे में कुछ भी नहीं पता था।

अगले पंद्रह दिन नरगिस ने ब्रीच कोडी अस्पताल में बिताए, एक के बाद एक उनके टेस्ट हो रहे थे। डॉक्टरों को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि उनको क्या हुआ था। नरगिस की हालत बिगड़ती जा रही थी और उनका वज़न लगातार गिरता जा रहा था। वह दुखी थीं और निरुत्साहित लग रही थीं।

अंत में, एक शाम डॉक्टरों ने कुछ ऐसा समाचार सुनाया जो सुनील दत्त को तोड़ कर रख देने वाला था। नरगिस को अग्न्याशय का कोसर था। उनको जल्दी से जल्दी मेमोरियल स्लोआन केटरिंग कोसर सेंटर ले जाया जाना था, जो न्यूयॉर्क सिटी में कोसर के इलाज और उसके बारे में शोध से संबंधित जाना-माना अस्पताल है।

सुनील खामोश थे। जब वे घर लौटे तो उनका दिल मानो डूबा हुआ था। उन्होंने अपने तीनों बच्चों को पास बुला लिया। उस पल को संजय कभी नहीं भूल सकते। ‘उस शाम डैड ने मुझे दोनों बहनों के साथ बिठाया और हमें यह बताया कि हमारी मां को कोसर था।’ 58 पाली हिल आने वाली किसी बड़ी अनहोनी की आशंका से घिर गया।

‘नगरिस दत्त फाइटिंग फॉर लाइफ, सुनील दत्त शैटर्स’ (नरगिस दत्त ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रही है, सुनील दत्त टूट चुके हो) फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन इंडिया में यह सुर्खी थी। ‘हम आतंकित थे,’ संजय ने याद करते हुए कहा। ‘हमें यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हमारे साथ यह सब हो रहा था। वह पागल कर देने वाला दुस्वप्न था। कुछ उस तरह का जो उपन्यासों में या फिल्मों में किसी और को हो जाता है…जब डैड ने डॉक्टरों को मां का ऑपरेशन करने की अनुमति देने वाले कागज़ात पर दस्तखत किए, तो मैं इस बात से डर गया कि इसका मतलब यह भी हो सकता था कि डैड ने उनकी मृत्यु के कागज़ पर दस्तखत किए थे। सब कुछ बहुत भयानक था!’5

नरगिस का आंतरिक रक्तòाव तेज़ हो रहा था, तो डॉक्टरों को उसे रोकने के लिए उनका ऑपरेशन खोलना पड़ा। लेकिन उनका शरीर यह सहन नहीं कर पाया और नरगिस बेहोश हो गईं। डॉक्टरों ने और अधिक ऑपरेशन की सलाह दी लेकिन उनको इस बात का डर था कि कहीं ऑपरेशन टेबल पर ही नरगिस की मौत न हो जाए। सुनील दत्त असहाय महसूस कर रहे थे। वह अकेले थे और यह नहीं चाहते थे कि सारे फैसले वे अकेले ही लें। उन्होंने अपने तीनों बच्चों को तत्काल अमेरिका आने के लिए कहा।

इस बात को जानते हुए कि उनकी मां की हालत कितनी नाज़ुक थी, संजय ने कुछ दिनों के लिए अपने ड्रग्स की आदत को छोड़ने की कोशिश की। लेकिन छोड़ने के कारण उनकी हालत बहुत दर्दनाक हो जाती थी और जिसको सह पाना मुश्किल हो जाता था। इसलिए जब दत्त परिवार उस नारकीय पीड़ा के दौर से गुज़र रहा था, संजय तब मादक द्रव्यों का सेवन कर रहे थे। ड्रग्स ने उनको पूरी तरह से अपने वश में कर लिया था, जिसके कारण वे लापरवाहियां किया करते थे। जब उनको अपनी बहनों के साथ अमेरिका जाना था तब वे यह सोच रहे थे कि वहां किस तरह से ड्रग्स हासिल करेंगे। वे ड्रग्स न मिलने पर होने वाली दर्दनाक स्थिति में नहीं पड़ना चाहते थे। उसके बाद संजय ने जो किया उसको याद करके संजय आज भी कांप उठते है। ‘जब मैं इसके बारे में सोचता हूं तो मुझे इसपर यकीन नहीं होता है। मैंने करीब 30 ग्राम हेरोइन अपने जूते में रख लिया, और मेरी बहनें मेरे साथ थीं,’ उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में याद किया।संजय को ठीक से यह याद नहीं है कि वे सुरक्षा जांच से किस प्रकार पार हुए। कहा जाए तो एक तरह से वो ड्रग्स स्मगल करके अमेरिका ले गए थे। अगर वे पकड़े जाते तो? उस संकट के दौर में वह दत्त परिवार के लिए असहनीय होता।

"Sanjay Dutt, Prime Minister Indira Gandhi, Namrata, Priya Dutt, Nargis and Sunil Dutt in New Delhi. Express archive photo"

“नई दिल्ली में संजय दत्त, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, नम्रता, प्रिया दत्त, नरगिस और सुनील दत्त। एक्सप्रेस संग्रह फोटो।”

परिवार महीनों न्यूयॉर्क में रहा, लेकिन संजय को रॉकी का काम पूरा करने के लिए वापस आना पड़ा, ‘मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मुझे रॉकी को पूरा करने के लिए वापस आना पड़ा…गाना गाने के लिए तथा इस तरह के दूसरे कामों के लिए, जबकि मेरी मां कोमा में थीं। लेकिन काम को तो चलते रहना ही होता है,’ संजय ने उन दिनों को याद करते हुए कहा। रॉकी के निर्माता गुलशन राय को इस बात की आशंका थी कि वह फिल्म फंस गई थी और फिल्म के लिए उन्होंने दूसरे अभिनेताओं से जो डेट्स लिए थे वे सब बर्बाद हो जाने वाले थे। सुनील दत्त को अपने फिल्मकार दोस्त राज खोसला से यह कहना पड़ा कि वे फिल्म का निर्देशन संभाल लें। धीरज के साथ उन्होंने राज खोसला को फोन पर सभी सीन एक-एक शॉट करके समझाए और उनसे यह आग्रह किया कि जहां उन्होंने उस फिल्म को छोड़ा था, वो वहां से आगे फिल्म को संभाल लें।

महीने गुज़रे जा रहे थे, नरगिस का कुल मिलाकर सात बार ऑपरेशन हुआ। डॉक्टर परिवार वालों से अकसर कहते थे कि वे ‘उनको शांति से जाने दें’। लेकिन सुनील दत्त और बच्चे नरगिस को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे।

और फिर एक चमत्कार हुआ।

सुनील दत्त प्यार से घंटों नरगिस का हाथ थामे रहते थे। एक दिन सुनील दत्त को ऐसा महसूस हुआ कि नरगिस उनके हाथ को दबा रही थीं। बेहोश होने के करीब तीन महीने बाद नरगिस ने अपनी आंखें खोलीं। अस्पताल में सभी लोग उनको ‘स्लोआन केटरिंग की चमत्कारी महिला’ बुलाने लगे।

जब वह बेहोशी से बाहर आईं, तो उन्होंने जो बात सबसे पहले पूछी वह थी, ‘संजू कहां है?’ सुनील दत्त ने बहाना बनाया और संजय दत्त को फोन करके कहा कि वे मुंबई से पहली फ्लाइट ले लें। संजय जब अंततः पहुंचे तो सुनील दत्त ने नरगिस से कहा कि उनके लिए एक सरप्राइज़ है। ‘उनकी आंखें बंद थीं और मैंने अंदर घुसते हुए ‘मां’ कहा?’ संजय ने याद करते हुए कहा। ‘उनके चेहरे का रंग एकदम बदल गया। वह इतनी खुश हो गईं वह मुझे पकड़ कर रो रही थीं। उनके हाथ कांप रहे थे। वह बस घर वापस आना चाहती थीं।’ नरगिस बहुत बेचैन थीं और वह यह जानना चाहती थी कि संजय के जीवन और उनके करियर में क्या कुछ चल रहा था। सबसे ज़्यादा वो अपने बेटे की फिल्म रॉकी देखने के लिए बेचैन थीं।

नरगिस : कि मैं जल्दी से अच्छी हो जाऊं…मैंने न अपने बच्चों की ख़ुशी देखी…(रोती हो) कितना अरमान था कि अंजू (नम्रता) की शादी होगी। और मैं भी वैसे ही करूंगी जैसे हर मां करती है।

स्लोआन केटरिंग में डॉक्टर इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि नरगिस का कोसर ठीक हो गया था। लेकिन नरगिस की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर थी और कोई छोटा सा संक्रमण भी खतरनाक हो सकता था। उनको अस्पताल से निकालकर दत्त परिवार के किराए के अपार्टमेंट में ले जाया गया। एक समय ऐसा था जब नरगिस को भारत की सबसे सुंदर अभिनेत्री माना जाता था। उनकी तस्वीरें पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ पर छाई रहती थीं। अस्पताल के कमरे में तो सुनील दत्त ने सारे शीशे हटवा दिए थे। लेकिन अपार्टमेंट में जाने के बाद नरगिस ने जब अपना चेहरा आईने में देखा तो वो फूटफूटकर रो पड़ीं। उनका चेहरा बीमारी और कोसर की दवाइयों से काला पड़ चुका था, उनकी झुर्रियां लटक आई थीं और उनके बाल उड़ चुके थे। नरगिस अपने दुस्वप्नों को अमेरिका में ही छोड़कर वापस घर जाना चाहती थीं।

आख़िरकार 6 मार्च 1981 के दिन, मुंबई से जाने के क़रीब छह महीने बाद, ‘स्लोआन केटरिंग की चमत्कारी महिला’ घर वापस जा रही थी। संजय की ख़ुशी की कोई सीमा नहीं थी : ‘मैं पूरी दुनिया को उनके क़दमों में बिछा दूंगा। मैं अब उनको कभी परेशान नहीं करूंगा। मैं इस बात का ध्यान रखूंगा कि मेरी बहनों की शादी जल्दी हो जाए। हम रॉकी के लिए खूब भव्य प्रीमियर का आयोजन करेंगे…मैं उनको अब फिर से खोना नहीं चाहता।’

संजय ने अपने आंसुओं से लड़ते हुए कहा, ‘भगवान का शुक्र है कि परीक्षा की घड़ी पूरी हुई!’

 

अभिनेत्री नर्गिस दत्त की पूण्यतिथि पर, यासिर उस्मान की लिखी किताब से एक अंश.

 

 

 

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