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बंटवारे के उनहत्तर साल बीतने के बाद यह यकीन करना मुश्किल है कि गांधी बंटवारे के बाद पाकिस्तान को अलग हुए भाई की तरह मानना चाहते थे, वहीं जिन्ना पाकिस्तान के गवर्नर जनरल पद से रिटायर होने के बाद भारत में अपनी बाकी ज़िंदगी गुज़ारना चाहते थे। उपमहाद्वीप की ज़्यादातर जनसंख्या जैसे 94 फीसदी भारतीय और 95.5 फीसदी पाकिस्तानी ऐसे हैं जिनका जन्म 1947 की आज़ादी के बाद हुआ।

बावजूद इसके गुस्से और बंटवारे को लेकर दिए गए दोनों तरफ के भाषणों ने बंटवारे की यादों को ज़ख्म बना दिया है। जबकि गांधी या जिन्ना के बयान किसी को याद नहीं।

पटेल और नेहरू से लेकर आज तक भारतीयों ने पाकिस्तान को अलग होने के लिए सज़ा देने का रास्ता चुना है ना कि उसे लुभाने का। ऐसा करके उन्होंने जिन्ना के बाद आने वालों की उन कोशिशों को ताक़त दी है जिसके तहत वो पाकिस्तान को सैन्यीकृत और कट्टर इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहते हैं। इस नए देश में बड़ी सेना का बोझ अर्थव्यवस्था से कहीं ज़्यादा है। यही वजह है कि पाकिस्तान अपना वजूद भारत विरोध में देखता है। पाकिस्तानियों ने सदियों पुराने ऐतिहासिक हिंदू मुस्लिम वैमनस्य की दास्तान को कुछ इस तरह ईज़ाद किया है जिससे दोनों समुदाय एक दूसरे को कभी ना मिल सकने वाले दुश्मनों की तरह नज़र आते हैं। कश्मीर विवाद आतंकवाद और परमाणु शस्त्रों ने उपमहाद्वीप की इस वैमनस्यता को और गहरा कर दिया है।

पाकिस्तान के नज़रिए से भारत को सिर्फ एक पड़ोसी मुल्क की तरह स्वीकार करना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि भारत की नज़र में हमेशा से पाकिस्तान उनसे अलग हुआ एक देश है। भारतीय हमेशा सोचते हैं कि दोनों देशों के बीच की समानता को उकेरना दोनों देशों के लिए लाभदायक है वहीं उनकी यह सोच ही पाकिस्तान को और ज़्यादा डराती है। भारत का एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में विकास और पाकिस्तान के बराबर जनसंख्या में मुसलमानों का होना भी संदेह को हवा देता है जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच की खाई और गहरी हो जाती है और अलग नज़र आने पर ज़ोर दिया जाने लगता है।

पाकिस्तान के संशय को दर्शाने के लिए एक तथाकथित उदार पाकिस्तानी अधिकारी का 1980 में अमेरिकी रिपोर्टर को दिया गया यह बयान काफी है जिसमें उसने कहा था, ‘अगर हम मुसलमान नहीं हैं, तो क्या हैं, सिर्फ एक दोयम दर्जे के भारतीय?’ भारतीय ना होने की चाहत का इतिहास बहुत पुराना है। यह चाहत पाकिस्तान के इतिहास और संस्कृति पर आयोजित पहली कांग्रेस के कार्यकलापों पर भी 1973 में भारी दिखी थी। इस्लामाबाद विश्वविद्यालय़ में बांग्लादेश की हार के बाद हुई इस कांफ्रेंस की रिपोर्ट क्वेस्ट फार आइडेंटिटी के नाम से प्रकाशित की गई। पाकिस्तान के प्रमुख शिक्षाविद वहीदउज़ज़मां ने अपनी संपादकीय टिप्पणी में लिखा था, ‘अल्लाह ना करे अगर अरब, तुर्क, ईरानी इस्लाम छोड़ दें तो अरब अरबी रहेगा, तुर्क तुर्की, ईरान का बाशिंदा ईरानी लेकिन अगर हमने इस्लाम छोड़ दिया तो हम क्या होंगे?’

पाकिस्तानी विचारधारा के दो मज़बूत स्तंभ इस्लाम और भारत विरोधी भावनाएं हैं जो वर्तमान पाकिस्तानी राज्य और रणनीतिकारों को खुद को दिल्ली सल्तनत या फिर मुग़ल साम्राज्य के वंशज के तौर पर दावा पेश करने को प्रेरित करती हैं। 1965 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विदेश मंत्री के तौर पर जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारतीय नेताओं पर पाकिस्तान कोदुश्मन नंबर एकबताकर इसे भारत की सांप्रदायिक नीति का केंद्र बिंदु बताया था। उस समय सभी देशों के प्रतिनिधि भौंचक्के रह गए थे जब उन्होंने कहा था, ‘सात सौ साल से हमने दो प्रमुख समुदायों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है,’ गौरतलब है कि तब पाकिस्तान को वजूद में आए सिर्फ 18 साल हुए थे।

इतिहास की इस ग़लत पेशकश को सही करने और पाकिस्तानी दहशत को कम करने के बजाए कुछ भारतीयों ने इस आग में घी डाल दिया। इस प्रक्रिया में भारत में पाकिस्तान द्वारा भारतीय संप्रभुता के टुकड़ेटुकड़े करने का संदेह जन्म लेने लगा। नेहरू के रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन ने एक बार ब्रिटिश पत्रकार को बताया था, “पाकिस्तान के दृष्टिकोण से बंटवारा तो सिर्फ आगाज़ था, उसका मकसद तो पूरे भारत पर कब्ज़ा कर लेना था।कृष्णा मेनन ने दावा किया कि वह पाकिस्तानी दिमाग को अच्छी तरह पढ़ सकते हैं और कहा, ‘ब्रिटिश ने मुग़लों से भारत की कमान ली थी और पाकिस्तानी यह मानते हैं कि अब जब ब्रिटिश जा चुके हैं तो फिर से मुग़लों का राज वापस आना चाहिए।  भारत एक एकीकृत राज्य नहीं बन सकता, इस तरह के पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के बयानों ने इस दहशत और संदेह को और बढ़ा दिया।

पाकिस्तान को लेकर भारत के इस कटु दृष्टिकोण को भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश सचिव जे.एन. दीक्षित के इस बयान से समझा जा सकता है: ‘ब्रिटेन ने भारत का बंटवारा इसलिए किया क्योंकि वह चाहता था कि हिंदू क्षेत्रों को राजनैतिक वजूदों में बांटकर बिखरा दिया जाए जिससे पाकिस्तान इस महाद्वीप की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत के रूप में उभर सके। पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य भारत के टुकड़ेटुकड़े करना है। कश्मीर में 1948 में हुआ पाकिस्तानी आक्रमण और तब से लगातार कई युद्ध इस प्रक्रिया के उदाहरण हैं। कारगिल युद्ध और जम्मूकश्मीर में चल रहा पाकिस्तान समर्थित छद्म युद्ध इसी दबाव और प्रक्रिया की सबसे नई बानगी है। पाकिस्तान के इस विनाशकारी दृष्टिकोण को लेकर भारत कभी भी निर्णायक और कठोर कदम नहीं उठा सका है। भारत ने हमेशा से हर बड़े युद्ध में जीत के बावजूद स्वेच्छा से पाकिस्तान को रियायतों पर रियायतें दीं। पाकिस्तान का दूरगामी रणनैतिक लक्ष्य दक्षिण एशियाई क्षेत्र में भारत को सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में ना उभरने देना है। पाकिस्तानी सत्ता केंद्रों में भारत की हिंदू बहुसंख्यक नागरिक सोसायटी के खिलाफ़ ज़बरदस्त वैमनस्य भाव है।  पाकिस्तान ने बहुत से मुस्लिम देशों और पश्चिमी ताकतों (चीन और अमेरिका) का सहारा सिर्फ इसलिए लिया क्योंकि भारत को बैकफुट पर रख सके। भारतीय धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर जो सवाल लगातार पाकिस्तान उठाता है वह उसकी एक सोची समझी रणनीति है जिससे भारतीय समाज में अंदरूनी दरारें पड़ सकें। जम्मूकश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर की अलगाववादी हिंसा और विद्रोही ताकतों का पाकिस्तान को दिया गया समर्थन इस बात की तस्दीक करता है।

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