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शोध के आधार पर एक नई मनोवैज्ञानिक बीमारी सामने आई है- सेल्फ़ाईटिस. सेल्फ़ाईटिस यानि सेल्फ़ी लेनी की अनियंत्रित चाहत. दुनिया भर में फैली एक मनोवैज्ञानिक ख़लबली- फ़ोमो (FOMO- Fear of missing out) यानि एक स्थायी अहसास कि आप हर वक़्त किसी चीज़ से महरूम हैं.

कुछ ऐसा है जिसमें आप शामिल हो सकते थे पर ऐसा नहीं हो रहा. फ़ोन में मौजूद कैमरा एक ऐसा यंत्र बन चुका है जो लोगों पर यह दबाव बना रहा कि वह दुनिया के सामने ये साबित करें कि वह हर पल का पूरा लुत्फ़ उठा रहें. हालांकि असल में लोग रोजमर्रा की अपनी ज़िंदगी जीने की बजाय दुनिया के सामने यह साबत करने के लिए परेशान हैं कि वह हर पल का मजा ले रहें हैं. अजीब विडंबना है! हर पल की तस्वीर उतारने को लोग ‘यादों को सहेजने’ से जोड़ रहें हैं. पर तुर्रा यह कि याद बनने के लिए आपको उस पल को जीना होता है. दोनों में काफ़ी अंतर है. इसे समझने की बजाय लोग अपनी ज़िंदगी का हर पल दुनिया के साथ साझा करने में रत हैं.

दुर्भाग्य से आज यही सच है. हमारे ध्यान की अवधि  घट गयी है. लंबे समय तक हम किसी एक विषय पर टिके रहने की आदत भूल चुके हैं. ऐसे में तस्वीरों के माध्यम से हम यादों को ताज़ा रखने लगे हैं. हालांकि कोई भी तस्वीर बस कुछ देर के लिए ही प्रभावी हो सकती है. अगर सच में हम किसी पल को अपने ज़ेहन में उतारना चाहते हैं तो यह बिना कैमरे के करना होगा. अगली बार जब आप किसी शाम सूर्यास्त की ख़ूबसूरती में उलझ जाएँ तो उसे पकड़ने के लिए कैमरा ना उठाएँ बल्कि सूरज का डूबना महसूस करें. कुछ इस तरह जैसे कि आपका एक दिन डूब रहा और उस दिन कि यादें सदा के लिए आपके अंदर क़ैद हो गयी हैं.

इंटरनेट की दुनिया का शर्त यही है कि अगर आपने कोई तस्वीर नहीं लगायी तो आपकी बात पर भरोसा नहीं किया जाएगा. तस्वीर देखने के बाद ही लोग आपके सच को मंजूरी देते हैं. इस पूरी प्रक्रिया के मनोवैज्ञानिक असर पर बात करते हैं.

हम किसके सामने ख़ुद को साबित करना चाहते हैं? या इस से इतर हमें कुछ साबित करने की ज़रूरत ही क्यों है? हर पल तस्वीर साझा कर के लाइक, हार्ट या दूसरी अभिव्यक्ति बटोरने की चाहत दिमागी कैंसर का रूप ले चुकी है. इस से आत्मविश्वास पर भयानक असर पड़ता है. मन में हर पल अपनी क्षमता और धीरे-धीरे अपने अस्तित्व पर ही संदेह उत्पन्न होने लगता है. खरा उतरने की यह चाहत कहीं से भी ख़ुशनुमा ज़िंदगी का लक्षण नहीं है.

क्या आपने कभी ऑब्सेसिव-कंपल्सिव फोटोग्राफी डिसऑर्डर का नाम सुना है? नाम से ही ज़ाहिर है कि  यह बीमारी हर पल, हर चीज़ की तस्वीर उतारने से संबंधित है. प्रकृति की गोद में लुत्फ़ उठाना और उसकी दर्जनों तस्वीरें खींचकर हैशटैग के साथ सोशल मीडिया पर डालने में फ़र्क है. कैमरा को हमारी आँखों पर तरजीह हासिल हो चुका है. दुनिया के बारे में हमारा नजरिया अब सोशल मीडिया के फिल्टर्स के पीछे दब चुका है. हमें एक लत लग चुकी है परफेक्ट बनने की. हमसे संबंधित हर चीज़ एकदम दुरुस्त होनी चाहिए. फिल्टर्स के पीछे अपनी खामियों को छुपाकर हम अपनी आदर्श तस्वीर पेश करते जा रहें हैं. इसके जड़ में ख़ुद के प्रति एक निराशा छुपी है. प्रकृति ने हम में से किसी को भी पूर्ण नहीं बनाया है. कुछ छोड़ दिया है ताकि वही अपूर्णता देखने वाले की नज़र से हमें पूर्ण बनाए.

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