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उत्तराखण्ड की तहसील भटवारी में एक गाँव है, गंगोत्री। भागीरथी नदी के किनारे बसे इस गाँव से लगभग 20 कि.मी. ही होगा गोमुख, जिससे पवित्र गंगा निकलती है।

कुछ बात तो होगी इस ग्लेशियर में या फिर इस गौमुख में जिसमें से इतनी पवित्र गंगा निकलती है। क्या मिलता होगा उस जल में, जो वह गंगा बन जाता है। गंगा, पतितपावनी गंगा, जहाँ-जहाँ से वह गुजरती है, सब कुछ हरा भरा कर देती है। जिसमें वह मिलती है, या जो उसमें मिलता है, उसे पवित्र कर देती है। जन-जन की प्यास बुझाती है, धरती को अन्न उगाने की जीवनधारा देती है, और इस तरह गांव-गांव, नगर-नगर, हर तरफ ख़ुशहाली फैलाते हुए अन्ततः सागर में मिल जाती है ।

वह गंगा, जिसने हमको सब कुछ दिया, मगर हमनें क्या दिया गंगा को? प्रदूषण अपनी गंदगी धोने व पाप छुपाने का जरिया बनाया है गंगा को। खैर, यह एक अलग विचारणीय मुद्दा है।

भटवारी पहाडी इलाका है। चारों तरफ हरे भरे पहाड, खेत और उनके बीच से निकलती जलधाराएँ- इन्हें देख कर कभी-कभी लगता है, इससे ज्यादा और क्या होता होगा स्वर्ग में ।

जमीनी क्षेत्र से आने वाले लोगों को यहाँ के लोगों का जीवन कठोर व बहुत मुशकिलों से भरा लगता है और होता भी है। मगर यहीं उनके जीवन में अति उल्लास का कारण भी छिपा हुआ है। उॅंचें पहाड पर चढ कर वहाँ पहुँचने का सुख अप्रतिम होता होगा, दुर्गम पहाडियों से लगभग दौड़ते हुए नीचे आना हर क्षण कितना रोमांच पैदा करता है; और फिर सुरक्षित पहुँचने का उल्लास । दिन में कई बार नदी को पार करना और उस पार सुरक्षित पहुँचना; इनके जीवन में तो हर क्षण एक चुनौती है और हर दिन एक नई जीत है। इसीलिए हर दिन उस जीत का उत्सव भी होता है। दुर्गम लक्ष्य और उसका वरण, शायद यहीं है इनका “वे ऑ़फ लाइफ”।

ईश्वर के भी कितने निकट हैं। हाँ बस, दो हाथ ऊपर ही तो है आसमान। इसलिए ईश्वर भी सबसे ज्यादा खेले इनके जीवन से ही खेलता है-कभी भूस्खलन, कभी बाढ तो कभी बादल फटना।

ऐसी ही एक दुर्घटना में अपने माँ बाप को खो चुका था, गुना। वैसे नाम तो गंगेश है; मगर माँ बाप गुना कहते थे क्योंकि इसका स्वभाव बहुत अच्छा है ना गरम और ना ही ठण्डा, यानी गुनगुना। ठण्डे प्रदेश में तो वैसे भी फिर बहुत महत्व है गुनगुनेपन का, सो सब भी उसे गुना ही कहते थे।

आज ऋषिकेष के प्राथमिक सरकारी स्कूल के बाहर बच्चों की लम्बी सी कतार लगी है। प्रवेश उत्सव मना रही है सरकार। बच्चों को शिक्षा मिड-डे-मील का भोजन व किताबें, सब मुफ्त। यहाँ कुछ बच्चों को उनके माता पिता पकडकर लाए हैं, तो कुछ खुद ही चले आए अपना भविष्य संवारने ।

उसी लाईन में एक लगभग पाँच-छ साल का गोरा बच्चा हाथ में कपडों की पोटली व दूसरे हाथ में स्लेट पकडे डरा सहमा सबको देख रहा था । अकेला था वो। पुराने कपड़े, मगर सलीके से पहने हुए; बाल लम्बे थे, जिन्हें वो हाथों से बार बार सिर पर व्यवस्थित कर रहा था। यह गुना ही था।

एक-एक बच्चे का नम्बर आता, उन्हें कुछ किताबें मिलती और एक छोटा लड़डू का पैकेट। बच्चे यह सब पाकर बहुत ख़ुश थे। सामने एक जमीन थी, जो स्कूल के पार्क की है; मगर फिलहाल इस पर मवेषियों का कब्जा है। एक कोने में टूटे झूले लगे हैं, बच्चे अपना-अपना पैकेट लेकर भागते हुए वहीं पहुच रहें थे। बच्चे उन टूटे झूलों में भी आनंद ढूंढ रहे हैं। गुना भी वहीं पहुँचने के इंतजार में है। मगर उसका नंबर तो आये।

कोई एक घण्टा बीतने पर गुना का नम्बर आया। “क्या नाम है ?” मास्टरजी अपनी आदत अनुसार कडक के पूछ रहे थे ।
“गुना “
“गुना ? “
ये क्या नाम?”
मास्टर ने अपना मुँह ऊपर करके लगभग झुंझलाते से देखा ।
“पिताजी का नाम …?“
“नहीं पता ………मर गए ।”
“अबे तो नाम तो होगा ?”
“माताजी का नाम ….?”
“माँ ?…….वो भी मर गई ।”
बच्चे की आवाज मानों किसी“
गहरे कुएँ से आ रही थी ।
“जा भाग …..पहले नाम पूछ कर आ। नहीं तो अनाथ आश्रम की स्कूल है सामने, उसमें जा ………।
“नेक्स्ट ….”

बच्चा लाइन से अलग होकर बहुत देर देखता रहा। सोचा, शायद मास्टरजी बुला लें, मगर जो चीजें सभी को सहज उपलब्ध थीं, उसे वो भी नहीं मिली ।

फिर वो घूमकर झूले पर खेलते बच्चों को देखने लगा । दोपहर का एक बज गया था, स्कूल लगभग खाली हो गया था । कुछ मवेशी व गुना ही बचे थे। धीरे धीरे वह भी बाहर आ गया। भूख बहुत जोरों से लगी थी, मगर वो अब वापस अनाथ आश्रम नहीं जाना चाहता था। यहीं अनाथ आश्रम ही तो लाए थे कुछ लोग, उसे उसके गाँव गंगोत्री से। मगर भाग आया था गुना वहाँ से।

तभी उसे उसी के गांव के लड़के वीर बहादुर ने आवाज लगाई-

“ओए, गुना! देख कोई तुझसे मिलने आये हैं……शहर से….. कैंम्प के साहब बुला रहे हैं”।

शहर से…? ….मुझसे मिलने….? “गुना मन ही मन बुदबुदाया और दौड़ पड़ा कैम्प की ओर।

कुछ वैसे ही, जैसे कि निर्मल निश्छल गंगा अपने उद्दात वेग के साथ पहाड़ों से कूदती-फांदती दौड़ पड़ती है नीचे मैदानों की ओर!

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