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शायरी एक अहसास का नाम है, जो हमें एक अलग दुनिया में ले जाने का काम करती है. लेकिन, अगर आपने कभी शायरी लिखने में हाथ अज़माया होगा तो आप यह जानते होंगे कि यह आसान नहीं होता है! अपने लिखें हुए शब्दों को एक अलग तरीके से एक साथ पिरोने का हुनर सीखना भी काफी मज़ेदार और दिलचस्प हो जाता है, जब हम यह हुनर ग़ज़ल के जानकार से सीखें!

इस विषय को ध्यान में रखते हुए हमने बीते शनिवार लेखन मंच पर कुछ शायरी कुछ गुफ्तगु कार्यशाला का सफल आयोजन किया. इस प्रोग्राम में शायरी से जुड़ी फाउंडेशन सुखनगोई  सहयोगी संस्था रही.

वर्कशॉप के मेहमान उर्दू के शायर,लेखक, संचालक  हाशिम रज़ा जलालपूरी ने  मीरा बाई की शायरी का उर्दू शायरी में अनुवाद करके साझा संस्कृति की अनूठी मिसाल पेश की है| मीरा बाई के 209 पदों को 1510 अशआर में ढाल कर अत्यन्त सराहनीय कारनामा अंजाम दिया है जिससे साहित्य जगत को हाशिम रज़ा जलालपुरी से काफी उम्मीदें जुड़ गयी हैं|हाशिम ने मीराबाई के पदों को उर्दू और हिंदी में अनुवाद किया है इस महान काम को करने में उनको लगभग तीन साल लगे. उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अगर आज के दौर में मुहब्बत, प्रेम करना सीखना है तो हम सभी को मीरा को पढ़ना चाहिए.

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वर्कशॉप में मौजूद सभी प्रतिभागियों ने अपने लिखी हुई रचनाएं पढ़ी. हाशिम ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए, ग़ज़ल लेखन पर चर्चा की.

ग़ज़ल को लिखने के लिए किन किन बारीकियों को ध्यान में रखना चाहिए इस पर भी विस्तार से बात हुई.

वर्कशॉप का संचालन जगरनॉट की संपादक प्राची और सलीमा ने किया.

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