कारगिल से आए खत

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16 जुलाई 1998

मेरी प्रिय नेहा और दीक्षा

मैं यहां कुशलता से हूं और तुम लोग भी अच्छे होंगे, ऐसी आशा है। मुझे अब तक तुम लोगों का कोई पत्र नहीं मिला पर मैं जानता हूं कि यह डाकघर की हड़ताल की वजह से है। बहुत जल्द तुम लोगों के सारे पत्र मुझे औेर मेरे पत्र तुम्हें मिल जाएंगे।

तुम जानते हो कि मैं अपना समय कैसे काटता हूं? मैं तुम लोगों के बारे में ही सोचता रहता हूं, जब तुम नन्हे बच्चे थे और बोलना तथा चलना भी नहीं सीख पाए थे। -फिर धीरे-धीरे बडे़ हुए और वहां पहुंच गए, जहां आज तुम लोग हो। तुम लोगों के बारे में सोचना बहुत अच्छा लगता है। अगर तुम पुरानी बातें याद करना चाहते हो तो अलबम देखो तुम्हें बहुत सी बातें याद आएंगी।

तुम लोगों की पढ़ाई और हां लड़ाई कैसी चल रही है?

अपना ध्यान रखो और बढ़िया से जियो।

बाकी अगले पत्र में।

प्यार सहित

तुम्हारा डेडी!

इन पत्रों के ज़रिए उन्होंने हर कदम पर हमारा हाथ थामे रखा। उन्होंने, हमें याद करना और जब वह दूर रहे तो उन यादों को संजोए रखना सिखाया। अब मम्मी मुझे और नेहा दी को उसी सुरक्षा का अहसास करा रही हैं। उन दिनों वो रात को डैडी की मढ़ी हुई तस्वीर अपने सीने से लगाए बैठक में जागती रहती थीं। मानो कोइ्र्र सोचा-समझा फैसला करने के लिए वे, उनका मार्गदर्शन मांग रही हो।

भारतीय सेना की कारगिल युद्ध में विजय चार वजहों से हुई। ये थीं -पराक्रम….संकल्प…. कनिष्ठ नेतृत्व…और भाग्य। इनमें से हर बात, समय, काल और परिस्थिति उनके विपरीत थी। मेरे पिता जैसे सैनिक यदि देश के लिए बलिदान नहीं होते तो क्या ये संभव हो पाता?  इस युद्ध को ऑपरेशन विजय का नाम दिया गया था पर क्या वह सफल हो सकता था ? हमसे ज़्यादा अपने देश को चुनने के लिए मैं अपने पिता को कोसती रहती थी पर मुझे हाल में लगा कि उनके बलिदान को मुझे, उनका आशीर्वाद समझना चाहिए।

अब 18 साल गुज़र चुके हैं। उनकी राख बह चुकी है और उनकी बहादुरी के किस्से भी भुलाए जा चुके हैं। देश के लिए जान न्योछावर करने वाले इन 527 शहीदों में से ज़्यादातर को अब कोई नहीं जानता। इन वर्षां में मुझे किसी ऐसे शख्स का इंतज़ार था जो मेरे पिता के बारे में लिखता पर अफसोस ऐसा हुआ नहीं।

मैंने डैडी का बैज अपनी पढ़ाई की मेज़ के ठीक सामने नोटिस बोर्ड पर लगा रखा था। समय-समय पर मैं अपना कुछ वक्त इसे देखते हुए गुज़ारती थी और मैं काम करते हुए इसी पर टकटकी लगाए रहती थी। मैं जब भी इसे देखती थी,  बेचैन और क्रोधित हो जाती थी। मुझे हैरत होती थी कि क्या मेरे पिता का बलिदान उन लोगों से कम था, जिनका इंटरनेट पर ज़िक्र है। पर यह सोचकर कि वे अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं थे, मुझे और परेशानी होती है। वह अकेले नहीं थे, जिनकी कहानी, अनकही रह गई। कारगिल के ऐसे पांच सौ हीरो यानी नायक हैं जिनकी कहानी सुनाई जानी बाकी है।

इसीलिए मैंने यह किताब लिखने का निश्चय किया। मैं आपको खाकी वर्दी पहने उन निस्वार्थ लोगों के दिमाग की थाह देना चाहती हूं जो तड़के उठ जाते थे ताकि आप रात में चैन से सो सकें। इसका सबसे बढ़िया तरीका ये है कि इसे सैनिकों के शब्दों और आवाज़ में समझा जा सके। यही सोचकर मैंने उनकी डायरी और पत्रों की खोज शुरू की है।

शुरू में मुझे हिचक हो रही थी। मैं कैसे उनके नाम जानूंगी..कैसे उनसे संपर्क करूंगी। पता नहीं उनके परिवार वाले मेरी बात सुनेंगे या नहीं। शहीदों के परिवारों को अपने पिता, पु़त्र, पति या भाई के बारे में याद कराना उनके जख्मों को कुरेदने जैसा है। उन्हें याद दिलाना आसान नहीं होता। मैं यह जानती हूं क्योंकि मैंने ये झेला है। उन पत्रों को पढ़ कर आपका मन करता है अठारह साल की अवधि को चीर कर मई-जून 1999 की उन दुर्भाग्यपूर्ण गर्मियों में पहुंच कर उन्हें रोक लिया जाए।

जुलाई 2016 में कारगिल विजय दिवस पर मैं कारगिल गई थी । मेरा यह शोध तभी शुरू हुआ। द्रास के मेमोरियल हॉल में मुझे यह अहसास हुआ कि कारगिल के शहीदों के बारे में हम किस चीज़ से महरूम हैं-उनकी आवाजों से। मैं ऊर्जा और संकल्प के साथ वहां से लौटी। मैंने इंटरनेट पर मौजूद कारगिल से जुड़ा हर लेख पढ़ डाला। मैंने उस दौरान लिखी गई किताबें खरीदने की कोशिश की पर उनमें से कोई भी स्टॉक में नहीं थीं। 18 साल में युद्ध पर पर्दा पड़़ गया था। ऐसा लगा जैसे यह कोई भूली हुई घटना है। फिर मेरे हाथ ‘हीरोज़ ऑफ कारगिल’ नामक पुस्तक लगी जिसे थल सेना मुख्यालय ने संग्रहीत किया और अन्य किताब मिली डेटलाइल कारगिल  जिसे गौरव सी सावंत ने लिखा है।

उसके बाद मैं अपनी मां से मदद लेने गई। आर्मी में उनके संपर्क बहुत बढ़िया थे। यह किताब लिखना उनके बिना संभव नहीं थी। फोन दर फोन, कहानी दर कहानी। एक नाम से दूसरे का सुराग मिलता। मुझे बहुत से नाम और सूचनाएं मिल गईं थीं। पर मै जितनी गहराई में उतरती उतनी ही चुनौतियां भी थीं। उन 527 शहीद परिवारों में से बहुत से गांवों में रहते थे। उनके पास इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। इसलिए उन तक पहुंचना असंभव जैसा ही था। एक वक्त ऐसा भी आया जब मैंने काम की व्यापकता की परेशानी से घबराकर हथियार डालने का मन बना लिया।

और तभी मेरी नज़र उस पत्र पर गई जिससे मुझे याद आया कि यह काम मैंने क्यों शुरू किया था। उस पत्र में डैडी ने मुझे बहादुर लड़की कहा था। मैंने बहुत गर्व महसूस किया पर उसी समय मुझे पिता के अंतिम संस्कार के वक्त अपने व्यवहार की याद आई और बड़ी शर्मिंदगी हुई। पर वो सही थे और अपने वैसे व्यवहार के बावजूद मै बड़ी साहसी थी। और यह मेरे लिए मौका था-यह साबित करने का मौका।

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