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लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली की चिता की राख में से संजय गांधी और उनका दल मानो फीनिक्स पक्षी की तरह प्रकट हुआ, जिसमें शामिल थे बंसीलाल, आर. के. धवन, ओम मेहता,विद्याचरण शुक्ला और कुछ अन्य। इन्हें जल्द ही ‘आपातकाल की चांडाल चौकड़ी’ कहा जाने लगा। अपनी मां पर संजय का नियंत्रण अब मुकम्मिल हो गया था। मां-बेटे के संबंधों के बारे में अफवाहें उड़ने लगीं। किसी विदेशी संवाददाता ने गांधी परिवार के घर पर खाना खाने गए किसी अनाम मेहमान के हवाले से लिखा था कि संजय ने इंदिरा गांधी के चेहरे पर एक साथ छह तमाचे जड़े थे और वे ‘सन्न खड़ी तमाचे खाती रहीं। उससे, वे यमराज की तरह डरती हैं।’ अलबत्ता मेनका गांधी तमाचे के इस तमाशे का जोरदार खंडन करती हैं और लेखक वेद मेहता ने पारिवारिक सूत्र के हवाले से लिखा, ‘भगवान भी इंदिरा गांधी के चेहरे पर छह तमाचे नहीं मार सकता था।‘

यह बेसिर-पैर की अफवाहें संजय की हैसियत की विसंगतियों पर जरूर रोशनी डालती हैं। वह न तो राजनीति में और न ही सरकार में किसी पद पर था, कांग्रेस का औपचारिक सदस्य भी नहीं था फिर भी निर्णय प्रक्रिया में उसकी चलती थी और ऐसा लगता है कि इंदिरा गांधी के कामकाज में भी उसका दखल था। डॉ. माथुर कहते हैं, ‘वे स्वयं ही संजय की शिकार थीं। अपने छोटे बेटे के प्रति अपने प्यार के अतिरेक के मोहपाश में बंधी वे खुद ही छटपटाती थीं।‘

इंदिरा गांधी ने बीस सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की जिसका मकसद आपातकाल के दौरान देश का पुनरुद्धार करना था। इसके तहत जहां गांवों में बसे गरीबों का कर्ज माफ किया गया वहीं बंधुआ मजदूरी को भी अवैध घोषित कर दिया गया। दुकानों के कांच के शोकेस में उनकी तस्वीर लगाकर इस कार्यक्रम के प्रति समर्थन जताना भी अनिवार्य किया गया। विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी बेटी नयनतारा से कहा, ‘मैं परेशान थी…डरावने तौर-तरीकों से जिनमें पुरुष और स्त्रियां पकड़ कर जेल में डाले जाने अथवा अपनी नौकरी जाने के डर से रेंगने लगे थे…मेरे खुद के आत्म सम्मान को लगा कि मुझे विरोध करना चाहिए।’81

संजय का मशहूर नारा, ‘बातें कम, काम ज्यादा’ उनके कठोर, गंदगी साफ करें वाले रवैए का प्रतीक था, एक जल्दबाज, किसी स्तर पर ढीलेढाले भारत का विरोधी, ‘कर्ता’ जो अपनी ‘मां’ को दिखा देगा कि काम कैसे कराया जाता है। उसे लगता था कि झटके से और तानाशाही तौर-तरीकों से मनुष्यों की उस विशाल आबादी को ठोक-पीट कर ही निश्चित आकार में ढाला जा सकता है जिसके प्रति उसके मन में कोई इज्जत नहीं थी। नेता की इच्छा को मानने के लिए बाध्य करने को लोगों को कुचलना पड़े तो वो भी मंजूर था। आपातकाल दरअसल संजय के लिए राजनीतिक पहचान बनाने का वक्फा साबित हुआ; वही इसका चेहरा था। उसने इस दौरान अपनी मां को भी प्रभावहीन कर दिया और उसकी सत्ता, प्रभाव तथा आत्म विश्वास कुलांचे भरता चला गया। आपातकाल लागू होते समय वह मात्र उनतीस साल का था, ऐसा युवक जिसे अब यह भरोसा हो गया था कि उसकी विरासत, भारत, अंततः और उचित रूप में उसका हो गया था। इसे वह अपनी मर्जी के अनुसार सही कर सकता था क्योंकि वो, अपनी मां का पुत्र था और यह ऐसा देश था जिस पर उसका परिवार अपने जन्मसिद्ध अधिकार के तहत राज कर रहा था। संजय का राज स्थापित करने में संजय गांधी जुट गए।

साल 1975 के अगस्त महीने की भेद खोलती एक घटना जताती है कि इंदिरा संजय से कितना ज्यादा डरती थीं और उसे नियंत्रित करने के लिए वे शायद ही कुछ कर सकती थीं। एक बेधड़क इंटरव्यू में संजय ने, जिन्हें हमेशा ही अपनी मां के वाम झुकाव वाले मित्रों और सलाहकारों से नफरत थी, सर्ज पत्रिका की उमा वासुदेव से कहा कि समाजवादी अर्थव्यस्था, भारत के लिए सिरे से गलत थी। उन्होंने साम्यवादियों पर लानत भेजते हुए कहा कि जहां तक साम्यवादियों की बात थी, ‘मुझे नहीं लगता कि आपको उनसे अधिक अमीर और भ्रष्ट लोग और कहीं मिलेंगे,’  कहा कि सार्वजनिक उद्योगों को अपनी स्वाभाविक मौत मरने देना चाहिए।

आपातकाल के दौरान राजनीतिक कार्रवाई के लिए संजय का मंच युवा कांग्रेस बनी। चंडीगढ़ में (कोमागाटा मारू नगर) 1975 के दिसंबर महीने में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में संजय ने राजनेता का औपचारिक चोला पहन लिया। कांग्रेस के किसी सत्र में वो पहली बार मंच पर नमूदार हुए। गगनभेदी नारों और तालियों की गड़गड़ाहट ने उन्हें, अपनी मां के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित कर दिया।

आपातकाल में युवा कांग्रेस की तो पौ-बारह हो गई। युवा नेता, जिन्हें संजय ने ही शामिल किया था, उनकी परछाईं बन गांवों का दौरा करने लगे लेकिन कभी गांधी और नेहरू की तरह विनम्रतापूर्वक उसे खोजने के मिशन पर नहीं बल्कि रोब दिखाने और आदेश देने के लिए, वो भी सर्वशक्तिमान गांधी पुत्र की प्रतिबिंबित सत्ता के मद में चूर होकर। युवा कांग्रेस में कुछ बेहद ऊर्जावान राजनीतिक व्यक्तित्व मौजूद थे, उनमें से अनेक राजनीति में संजय द्वारा छांटे गए छापामार दस्ते में शामिल थे लेकिन उसी संगठन ने कुछ ऐसे लोगों को भी आसरा दिया जिन्हें ठग माना जाता था, जिनकी पहचान दुकानदारों को चमका कर उनसे पैसा वसूलने वालों और बाहुबलियों के रूप में स्थापित थी। इंदिरा गांधी खड़ी-खड़ी देखती रहीं। शायद संजय के संगठनात्मक कौषल पर मुग्ध होकर उन्होंने उसे ‘सोचने वाला नहीं बल्कि करनेवाला’ बताया .

साल 1975 के आखिरी महीनों में अब इंदिरा के दरबार में भीष्म पितामह बन चुके, भारत के दौरे पर आए बी. के. नेहरू ने पी. एन. हक्सर से कुबूल किया कि वे इंदिरा गांधी से बात करना चाहते थे और उनसे ये कहना चाहते थे कि यह, ‘बेहद खतरनाक और घोर आपत्तिजनक था कि कानून के राज को संजय गांधी के राज में बदला जा रहा था, वह भी तब जबकि पार्टी अथवा सरकार में वह किसी भी औपचारिक पद पर नहीं था। उसकी सत्ता का एकमात्र आधार इतना ही था कि वो अपनी मां का लाड़ला था।’

अलबत्ता हक्सर ने उन्हें इंदिरा से एक शब्द भी कहने की हिमाकत नहीं करने की सलाह दी क्योंकि वे संजय को ‘श्रद्धायुक्त भय, सराहना, सम्मान के विचित्र मिश्रित भाव’ से आंकती थीं, उसे, वे परिपूर्ण मानती थीं, और उनकी नजरों में वो गलत कभी हो ही नहीं सकता था। संजय के बारे में संदेह की मामूली अभिव्यक्ति पर भी एतराज किया जाता था। हक्सर ने उनसे कहा कि यदि इंदिरा से उन्होंने कुछ भी कहा तो इंदिरा तक उनकी पहुंच खत्म हो जाएगी। ‘बब्बूभाई [हक्सर] अपने अनुभव से प्रेरित होकर बोल रहे थे क्योंकि उनकी बर्खास्तगी की वजह भी तो…संजय ही था।’

 

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