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इतिहास की किताबों में भले ही इसे एक मिथ्या क़रार दिया गया हो लेकिन अप्रैल 1994 में मुझे बंगाली अपवाद के बारे में जानने को मिला. एक कट्टर मुंबईकर यानी मेरी अभी-अभी शादी हुई थी और अचानक मैं उस दुनिया में था जिसका बंगाल से दूर का मगर काफ़ी बड़ा रिश्ता था. मेरी सास, चित्रा घोष बंगाल की आब-ओ-हवा की कायल थीं. वो बेहद स्वादिष्ट खाना पकाती थीं. उन्होंने अपने जमाई बाबू यानी मेरी मुलाक़ात अव्वल दर्जे के खाने से करवाई. हिलसा, माछर-झोल और प्रॉन मलाई करी. वो मुझे लगभग चिढ़ाते हुए पूछती थीं, “ये जो भी तुम मुंबई में खाते हो उससे तो कितना अच्छा लगता होगा ये, नहीं?” मैं देश के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच कोई जंग नहीं चाहता था इसलिए चुप ही रहता था. लेकिन इसके साथ-साथ मैंने बंगाली थाली में मिलने वाली वेरायटी और उनके मन में बंगाल को लेकर एक अलग गर्व को पसंद करना शुरू किया. एक औसत बंगाली के मन को अगर पढ़ें तो मालूम पड़ेगा कि मिष्टी-दोई श्रीखंड से बेहतर होता है, पार्क स्ट्रीट कोलाबा के फुटपाथ से कहीं ज़्यादा कॉस्मोपॉलिटन है, सत्यजीत रे वी शांताराम से काफ़ी ऊपर थे, सुचित्रा सेन नूतन से ज़्यादा ख़ूबसूरत थीं और टैगोर अम्बेडकर से बड़े बुद्धजीवी थे.

लेकिन एक ऐसा क्षेत्र था जिसमें मेरी सास को महाराष्ट्र को बेहतर कहे जाने पर कोई ऐतराज़ नहीं था – क्रिकेट. वो एक क्रिकेट फैन थीं और हमेशा ये कहती थीं कि मुंबई देश के क्रिकेट की राजधानी है. आज़ादी के बाद पहले 70 सालों में मुबई ने देश को 60 टेस्ट क्रिकेटर दिए हैं. देश का टेस्ट क्रिकेट में प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों में 20% से ज़्यादा. दूसरी तरफ बंगाल ने मात्र 16 टेस्ट प्लेयर दिए जिसमें से मात्र चार प्लेयर्स ने दस से ज़्यादा टेस्ट खेले. ये चार प्लेयर थे – पी सेन, पंकज रॉय, सौरव गांगुली और रिद्धिमान साहा. इनमें से सौरव गांगुली और रिद्धिमान साहा ने इंडिया के लिए मेरी शादी के बाद खेलना शुरू किया था. दो और बंगाली प्लेयर थे दत्तू फाड़कर और अरुण लाल. इन्होने भी दस से ज़्यादा टेस्ट मैच खेले थे लेकिन इनमें दत्तू की क्रिकेट की तालीम मुंबई में और अरुण लाल की दिल्ली में हुई थी. इनके अलावा एक तीसरे भी थे – दिलीप दोशी. दिलीप गुजराती परिवार से आते थे जो कोलकाता में आकर रहने लगे थे. ये सच था कि ईडेन गार्डन में एक लाख क्रिकेट फैन्स एक साथ मैच देख सकते थे लेकिन क्रिकेट के मैदान पर तो मुंबई ही राज कर रही थी. मुंबई ने 41 बार रणजी ट्रॉफी जीती है जबकि बंगाल ने मात्र दो बार.

बंगाल कैसे और कहां मुंबई से पीछे रह गया? कलकत्ता क्रिकेट क्लब दुनिया में दूसरा सबसे पुराना क्रिकेट क्लब है. इसकी स्थापना एमसीसी की स्थापना के मात्र छे साल बाद 1792 में हुई थी. शुरूआती 19 वी सदी से ही कोलकाता के जिमखाना और क्लबों में लगातार क्रिकेट खेला जाता रहा. लेकिन फिर भी भारत में इंडियन क्रिकेट का पहला ढांचा मुंबई में तैयार हुआ. यहां पारसी समाज अगुवाई कर रहा था. एक तरफ जहां व्यापार पर आंख लगाए अग्रेज़ीदां पारसी समाज ने क्रिकेट को अपने सामाजिक ओहदे को बढ़ाने के साधन के रूप में देखा, बंगाल ने फ़ुटबॉल को अपने खेल के रूप में अपनाया. रोनोजॉय सेन ने अपनी किताब ‘नेशन ऐट प्ले: अ हिस्ट्री ऑफ़ स्पोर्ट्स इन इंडिया’ में बताया कि बंगालियों ने फ़ुटबॉल को इसलिए अपनाया क्यूंकि अंग्रेज़ उन्हें आलसी और सुस्त मानते थे. वो अपने उपर लगाये इस आरोप से पीछा छुड़वाना चाहते थे. क्रिकेट एक संजीदा, महंगा दिखने वाला और अपर क्लास वालों का खेल था जबकि फ़ुटबॉल वर्किंग क्लास का. सेन ने होरेशियो स्मिथ के 1850 में कलकत्ता रिव्यू में छपे लेख की लाइनें लेते हुए कहा, “बंगालियों को जानने-समझने वालों को ये मालूम होना चाहिए कि उनके खेल बहुत ही सुस्त हैं. वहां के सिद्धांत के मुताबिक़, चलना दौड़ने से बेहतर है, खड़े रहना चलने से बेहतर है और लेटे रहना सबसे बेहतर है.” मज़ेदार बात ये है कि बंगाली हिन्दू राष्ट्रवाद की प्रेरणा के स्रोत स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “गीता पढ़ने के बजाय आप फ़ुटबॉल के ज़रिये स्वर्ग के नज़दीक पहुंच सकते हैं.”

1911 में मोहन बागान ने फैज़ाबाद की ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट को हराया था और इंडियन फुटबॉल असोसिएशन शील्ड जीती थी. ये भारतीय खेलों के लिए एक बहुत बड़ा मौका था. इसने खेलों में बंगाली कल्चर की लहर शुरू कर दी थी. ‘द बंगाली’ अखबार में इस उत्सव के बारे में सबसे मारक चीज़ छपी थी – “बंगाली अब उस सुस्त और ढीली जमात में नहीं गिने जाएंगे जैसा कि उन्हें मैकाले ने बहुत ही आसानी से लेबल कर दिया था.” इसके साथ ही एक दूसरे अख़बार ‘द इंग्लिशमैन’ ने लिखा था “मोहन बागान ने वो कर दिखाया है जो इतने वक़्त से कांग्रेस और स्वदेशी का राग अलापने वाले नहीं कर पा रहे थे. उन्होंने इस मिथ्या को तोड़ कर रख दिया था जिसके अनुसार किसी भी क्षेत्र में अंग्रेज़ों को हराया नहीं जा सकता था.”

मोहन बागान ने जो कोलकाता के फ़ुटबॉल के मैदान में कमाया वो मुंबई में इंडिया के पहले क्रिकेट सुपरस्टार सीके नायडू ने अपने बल्ले से कर दिखाया. दिसंबर 1926 में एमसीसी और हिंदूज़ के बीच बॉम्बे जिमखाना में खेले जा रहे एक मैच में नायडू ने 116 मिनट में 13 चौके और 11 छक्कों के साथ 153 रन बनाए. वहां इस इनिंग्स को सैकड़ों लोग देख रहे थे. इन देखने वालों में एक थे 15 साल के विजय मर्चेंट जो आगे चलकर इंडिया के पहले महान ओपनिंग बैट्समैन बने. वो कहते हैं कि उन्होंने नायडू की इनिंग्स से अच्छी इनिंग्स और कहीं नहीं देखी थी. उस वक़्त से नायडू एक नए देश के लिए नई ताकत बन गए. वो भी उस समय में जब लोगों में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ गुस्सा कूट कूट के भरा था. अब सब कुछ साफ़ हो गया था – कोलकाता देश की फ़ुटबॉल की और मुंबई क्रिकेट की राजधानी बन चुकी थी. अगर मुंबई रणजी ट्रॉफी में राज कर रही थी तो कोलकाता के पास फुटबॉल की संतोष ट्रॉफी थी. इसके साथ ही अगर दादर यूनियन बनाम शिवाजी पार्क आगर मुंबई में क्रिकेट के मैदान की सबसे बड़ी जंग थी तो ईस्ट बंगाल बनाम मोहन बागान देश में फुटबॉल की सबसे बड़ी लड़ाई थी.

फिर भी ये पूरा मामला बंगाली क्रिकेटप्रेमियों को अपने मन में शिकायत का भाव रखने से नहीं रोक पाया. इसलिए जब बंगाल के ओपनिंग बैट्समैन गोपाल बोस को 1970 के दशक के मध्य में टीम में नहीं चुना गया, बंगाली फैन्स ने क्रिकेट में बंगाल के ख़िलाफ़ पक्षपात का आरोप लगाया. कोलकाता के क्रिकेट कमेंटेटर किशोर भीमानी मजाकिया लहज़े में कहते हैं, “हम बंगालियों को नेताजी बोस से लेकर गोपाल बोस में साज़िशों की मौजूदगी का अहसास होता रहता है.” भीमानी 1982 में वानखेड़े स्टेडियम में मुंबई और बंगाल के बीच खेले गए एक रणजी मैच के बार में बताते हैं कि उसमें गावस्कर ने अपने फर्स्ट क्लास करियर का सर्वाधिक स्कोर बनाया था. गावस्कर ने 342 रनों की पारी खेली थी लेकिन सभी बंगाली खिलाड़ी एक ही बात कह रहे थे कि गावस्कर अपनी इनिंग्स की शुरुआत में ही एलबीडब्लू पर आउट थे मगर उन्हें आउट दिया नहीं गया. भीमानी कहते हैं, “मैं कमेंट्री बॉक्स में था और तैश में आकर मैंने ये तक कह दिया कि शायद मुंबई में किसी भी अम्पायर की इतनी हिम्मत नहीं है की वो गावस्कर को आउट दे सके.” गावस्कर उसे याद करते हुए कहते हैं, “वो एक नज़दीकी मामला था लेकिन मैं आउट नहीं था. लेकिन मुझे ये भी मालूम था कि सारे बंगाली बाकी के दिन इसी के बारे में बात करते रहेंगे और इस चक्कर में वो खेल पर ध्यान ही नहीं देंगे.” ये कहते हुए वो खूब हंसते हैं. बंगाली क्रिकेट को इस बात ने बहुत वक़्त तक परेशान किया. उन्हें ऐसा लगने लगा था कि पूरा विश्व बंगालियों के ख़िलाफ़ खड़ा था.

विकेट्स इन द ईस्ट नाम की किताब में इतिहासकार रामचंन्द्र गुहा बंगाल के क्रिकेट और वहां की राजनीति के बीच में तुलना करते हैं. 70 के दशक के मध्य में वहां मार्क्सिज़म पनपने लगा था और वहां के क्रिकेट की क्वालिटी में गिरावट आने लगी. बेहद सम्मानित एफ्रो-त्रिनिदादियन मार्क्सिस्ट सी.एल.आर. जेम्स ने वेस्ट-इंडीज़ के क्रिकेट के बारे में भावुक होकर खूब लिखा लेकिन जैसा कि ब्रिटिश राजनेता वुडरो वायट कहते हैं, कोई भी ऐसा देश जो क्रिकेट खेलता आया हो, कम्युनिस्ट नहीं बन सका. कई कम्युनिस्ट लेखकों के अनुसार क्रिकेट एलीट क्लास के पतन का रूपक था. क्रांति से भरे हुए बंगाली कम्युनिस्टों का एक बड़ा हिस्सा क्रिकेट को अंग्रेज़ी हुकूमत की परंपरा मानता था. लेकिन इसी वक़्त पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी जैसे बंगाली कम्युनिस्ट नेता भी थे जो इस खेल की भरपूर वकालत करते थे. हम एक बार स्पीकर के चैम्बर में गए थे और वहां उनके दरवाज़े पर ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ का साइन देखा. उनके असिस्टेंट ने बताया, “बॉस एक ज़रूरी मीटिंग में हैं.”हमें बाद में मालूम चला कि वो टीवी पर एक मज़ेदार वन-डे मैच देख रहे थे!

सीपीआई(एम) लेफ़्ट से गठबंधन के बाद पश्चिम बंगाल में 1977 में ज्योति बसु की सरकार बनी. इस बात से इनकार ही नहीं किया जा सकता है कि इस दौरान ये पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय मेनस्ट्रीम से दूर जा रहा था और ‘एकला चलो रे’ को चरितार्थ करता जा रहा था. एक पूरी युवा पीढ़ी की ऊर्जा सालों पुरानी सोच से लड़ने में ज़ाया हो रही थी और खेल के मैदान में उन्हें हार का सामना करना पड़ रहा था. और ठीक इसी समय सच्चाई ये भी थी कि बंगाली जो ईडेन गार्डन में हर इंटरनेशनल मैच को देखने के लिए हज़ारों की संख्या में इकट्ठे हो रहे थे, अपने लिए एक लोकल हीरो की तलाश में थे. कोई ऐसा जो क्रिकेट का सुभाष चन्द्र बोस बन सके, कोई ऐसा जो क्रिकेट के मैदान में उनके आत्मसम्मान की मशाल जलाए रखे. “हम तो बस आग लगाने के लिए एक चिंगारी का इंतज़ार कर रहे थे,” भीमानी ने कहा.

सौरव गांगुली का क्रिकेट में उदय इसी वजह से बंगाली आत्मसम्मान के लिए काफ़ी ज़रूरी था. जब गांगुली ने अपने पहले ही मैच में लॉर्ड्स में सेंचुरी मारी, मेरी सास की प्रतिक्रिया मुझे कभी नहीं भूलेगी. “मैंने तुमसे कहा था न? हम बंगाली क्रिकेट में भी अच्छे हैं. बस हमें खुद को साबित करने के मौका नहीं मिला है.” बाद में जब गांगुली को टीम से ड्रॉप कर दिया गया था, वो परेशान हो गई थीं, “तुम्हें इन सेलेक्टर्स से बात करनी चाहिये. इन्हें फ़ोन लगाओ. ये साज़िश है. वो बंगाल के साम्मान से साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

बंगाल का सम्मान. ये सच है कि गांगुली से बड़े इंडियन क्रिकेटर्स हुए हैं लेकिन उनमें से किसी ने भी अपने समुदाय को इतनी मज़बूती और पूरी कर्मठता के साथ आशा और विश्वास से नहीं भर दिया. इस मामले में ‘कलकत्ता का प्रिंस’ सभी से आगे हैं. इसे बंगाली राष्ट्रवाद कह लीजिये लेकिन जब भी गांगुली मैदान पर होते थे वो सिर्फ देश के सम्मान के लिए नहीं बल्कि हर बंगाली क्रिकेट प्रेमी के लिए उससे भी ज़्यादा मजबूती से खेल रहे होते थे. गांगुली के आने से पहले बस पंकज रॉय की यादें बंगाली क्रिकेट के दिए को ईंधन दे रही थीं. अब उनके पास अपना एक हीरो था. वो सिर्फ़ एक खिलाड़ी नहीं था बल्कि क्रिकेट में उनके पुनर्जन्म का कारण था. एक बार तेंदुलकर-गांगुली की एक ओपनिंग पार्टनरशिप के दौरान कमेंटेटर सचिन की बैटिंग की तारीफ़ किये जा रहा था. मेरी सास ने अपनी झल्लाहट को छुपाते हुए कहा, “मुझे लगता है कि सौरव भी सचिन जितना ही अच्छा खेल रहा है.” बंगाली अपवाद जागृत था.

दक्षिण पश्चिमी कोलकाता में मौजूद बेहाला ऐसी जगह नहीं है जिसके बारे में काफ़ी कुछ कहा-सुना जाता रहा हो. इसके उलट अलीपुर में सड़क किनारे लगे भरे पेड़ और फिर शुरू होते हुए बंगले और फैंसी अपार्टमेंट दिखाई देते हैं जिनमें से ज़्यादातर के मालिक मारवाड़ी बिज़नेस कम्युनिटी से जुड़े लोग हैं. बेहाला पुराना कोलकाता है. एक भीड़ से भरी जगह जिसकी बाज़ार में ताज़ा मछली की गंध घुली होती है और जहां बंगाली मिठाई की दुकानें मिलती हैं. वहां की गलियों में घूमते वक़्त हर टैक्सी ड्राइवर आपको सौरव गांगुली का घर दिखायेगा. लाल रंग की चार तीन-तीन माले की बिल्डिंग आपस में मिलकर उनका घर बनाती हैं. इस घर में तीन पीढियां रही हैं. गांगुली के परबाबा ने वहां एक प्रिंटिंग का बिज़नेस शुरू किया था जो अभी तक चलता आ रहा है.

गांगुली कहते हैं, “हमारा एक बड़ा परिवार था और हम बड़े आराम से रह रहे थे.” ये बातें करते वक़्त हम सौरव के घर में ग्राउंड फ़्लोर पर उनकी ‘गुफा’ में बैठे थे. सौरव की गुफ़ा इसलिए क्यूंकि पूरा कमरा ट्रॉफी और गांगुली के क्रिकेट करियर के दौरान ली गई तस्वीरों से भरा हुआ था. गांगुली को क्रिकेट खेलने की प्रेरणा अपने पिता चंडीदास से मिली जो आगे चलकर बंगाल क्रिकेट में पदाधिकारी बने. “मेरे पिता एक अच्छे क्लब क्रिकेटर थे और क्रिकेट को लेकर बहुत जुनूनी थे. इसलिए घर पर हमेशा क्रिकेट की बातें होती रहती थीं.” सौरव के पिता के तीन भाई थे. इसलिए कभी भी टीम बनाकर घर के गार्डन में क्रिकेट खेलने में कोई दिक्कत ही नहीं हुई. “असल में परिवार में हम छह भाई थे और सभी क्रिकेट खेलते थे. सबसे मज़े की बात ये थी कि हम सभी बाएं हाथ से बैटिंग करते थे.” गांगुली खुद दायें हाथ से सारे काम करते थे लेकिन अपने परिवार के क्रिकेटर्स को देखते हुए उनकी नकल करते हुए वो लेफ़्ट हैंड से बैटिंग करने लगे.

इन सभी में स्नेहाशीष सबसे बेहतरीन प्लेयर था. सौरव से पांच साल सीनियर स्नेहाशीष ने बंगाल के लिए 6 फर्स्ट क्लास सेंचुरी मारी हैं. अगर सचिन के परिवार में अजीत ने अपने टैलेंट से भरे छोटे भाई से अपने क्रिकेट खेलने के सपने को पूरा करवाया तो दूसरी तरफ़ दोनों गांगुलियों के बीच कम्पटीशन की स्थिति रहती थी. “मुझे लगता है कि बाद में हमारे बीच में कुछ कम्पटीशन शुरू हो गया था वरना मेरा भाई परिवार में पहला फर्स्ट क्लास क्रिकेटर था और इसलिए हम सभी उसकी काफ़ी इज़्ज़त करते थे. यहां तक कि सेंट ज़ेवियर कोलकाता कॉलेज में मैं फुटबॉल खेलता था और वो क्रिकेटर था.” गांगुली जब 13 साल की उम्र के थे तब उनके पिता ने उन्हें समर क्रिकेट कैम्प में जबरन भेजा और तब उन्हें इस खेल में मज़ा आने लगा. सौरव को पहला बड़ा मौका तब मिला जब उन्हें बंगाल बनाम उड़ीसा के एक फ्रेंडली अंडर-15 मैच में ईडेन गार्डन में खेलने खेलने का मौका मिला. ये मौका भी इत्तेफ़ाकन आया था क्यूंकि बंगाल की टीम में एक प्लेयर की कमी थी. सौरव कहते हैं, “मैंने अपने पहले ही मैच में सेंचुरी मारी और तबसे फुटबॉल की जगह क्रिकेट ने ले ली.”

क्रिकेट के प्रति समर्पित पिता ने पहले से ही सौरव के बड़े भाई के देबू मितरा को कोच के तौर पर रखा हुआ था. अब मितरा को दो लड़के कोच करने को मिल गए थे. घर में एक जिम बनवाया गया और घर के ही पास 2 कंक्रीट की पिचें ढलवाई गईं जहां दोनों भाई प्रैक्टिस किया करते थे. स्नेहाशीष बंगाल की रणजी टीम में जगह बना रहा था और दूसरी तरफ सौरव जूनियर क्रिकेट में नाम बना रहा था. राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर और अनिल कुंबले उस वक़्त इसी ग्रुप में थे. इंडिया में जूनियर क्रिकेट को आकार देने के लिए एक अच्छा ढांचा तैयार किया गया था. सभी जूनियर क्रिकेटर्स इसका लाभ उठा रहे थे. गांगुली 1972 में पैदा हुए, तेंदुलकर 1973 में. ये दोनों पहली बार 1987 में इंदौर में नेशनल कैम्प में एक साथ आए. एक साल बाद राजस्थान के पूर्व क्रिकेटर कैलाश गट्टानी द्वारा आयोजित एक प्राइवेट क्रिकेट टूर पर दोनों एक साथ इंग्लैंड गए. गांगुली इसके बारे में बताते हैं, “सचिन, राहुल, अनिल और मेरे बीच दोस्ती बहुत ही शुरुआत में हो गई थी और हम जैसे-जैसे इंटरनेशनल क्रिकेट खेलते गए, हमारी दोस्ती गाढ़ी होती गई.”

उस टूर पर तेंदुलकर और गांगुली ने पहली बार किसी मैच में ओपनिंग की थी. कैलाश गट्टानी को वो टूर बॉल-दर-बॉल याद है. वो बताते हैं, “ससेक्स की जूनियर टीम बहुत तगड़ी थी. उन्होंने 270 रन बनाए थे और हमें 30 ओवर में उसका पीछा करना था. सचिन और गांगुली ने ओपनिंग करने के लिए अपने हाथ उठाए. वो गए और ससेक्स की बॉलिंग की धज्जियां उड़ा दीं. उनकी ओपनिंग के दम पर हम मैच जीत सके.” ये आने वाले समय की एक झलक मात्र थी.

जब तेंदुलकर 16 साल की उम्र में 1989 में अपना पहला टेस्ट मैच खेल रहे थे, गांगुली जूनियर लेवल में खुद को साबित करने की कोशिश में लगे हुए थे. 1990 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अंडर-19 टीम के लिए गांगुली को चुना गया. उन्होंने मुंबई में चौथे टेस्ट में सेंचुरी मारी. “हमारे तीन विकेट बहुत जल्दी गिर गए थे और फिर मैं बैटिंग करने गया. मुझसे पहले वाले बैट्समैन को मुंह पर गेंद लगी थी और मैं उसके पिच पर गिरे हुए खून को देख सकता था.पाकिस्तान की जूनियर साइड में वक़ार यूनिस खेल रहा था. उनके ख़िलाफ़ खेलना आसान नहीं था. लेकिन मेरी उस सेंचुरी ने बताया कि मैं बड़े लेवल पर अच्छा खेल सकता था.”

कुछ ही हफ़्तों में गांगुली बंगाल के लिए अपना पहला फर्स्ट क्लास मैच खेल रहे थे. मैच दिल्ली के ख़िलाफ़ था. बंगाल फाइनल में पहुंच गया था और दूसरी बार रणजी ट्रॉफी जीतने के सपने देख रहा था. स्नेहाशीष ने पूरे टूर्नामेंट बंगाल के लिए खेला था. लेकिन फाइनल में उन्हें आराम दिया गया और उनकी जगह सौरव को लाया गया. “फाइनल मैच में मुझे टीम में नहीं लिया गया और इसने मुझे काफ़ी निराश किया. मुझे इससे उबरने में कुछ वक़्त लगा. लेकिन ये कहना कि टीम में मेरी जगह मेरे भाई के लिए जाने पर मैंने उससे महीनों तक बात नहीं की, सरासर ग़लत खबर थी,” स्नेहाशीष बताते हैं.

फाइनल मैच में सौरव ने दिल्ली की मज़बूत बॉलिंग के ख़िलाफ़ 22 रन बनाए और बिना एक भी विकेट लिए 6 ओवर फेंके. बंगाल ने मैच और ट्रॉफी दोनों जीते लेकिन पहले फर्स्ट क्लास मैच के लिहाज़ से ये वो मैच नहीं था जिसके लिए बंगाल जश्न में डूब जाता. हालांकि सभी क्रिकेट विशेषज्ञ इस नए टैलेंट को लेकर काफ़ी आशान्वित थे. “एक लेफ़्ट हैंडर के बारे में कुछ तो ऐसा होता है जो उसे ख़ास बना देता है. सौरव के पास गेंद मारने की कमाल की तकनीक थी जो उन्हें बाकियों से एकदम अलग खड़ा कर देती थी. छोटी उम्र से ही वो मनमाने छक्के जड़ता रहता था,” अरुण लाल, जिन्होंने इस पूरे दौरान बंगाल क्रिकेट को अपने कंधे पर रखकर ढोया, सौरव गांगुली के बारे में कहते हैं.

साल भर बाद ही फर्स्ट क्लास क्रिकेट में सौरव गांगुली ने अपनी पहली सेंचुरी मारी. वो ईस्ट ज़ोन के लिए एक मज़बूत वेस्ट ज़ोन की टीम के ख़िलाफ़ खेल रहे थे. इसी मैच में सौरव ने अपनी मीडियम पेस से 4 विकेट भी लिए. अब उन्हें एक ऑल राउंडर बताया जा रहा था. (वो कहते हैं, “मुझे बॉलिंग करना बहुत पसंद है.”) सौरव की वन-डे फॉर्म बहुत अच्छी चल रही थी. विल्स ट्रॉफी के एक वन-डे मैच में वेस्ट ज़ोन के ख़िलाफ़ सौरव ने इंडिया टेस्ट प्लेयर रवि शास्त्री को ऐसा छक्का मारा कि गेंद मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम में ऊंचाई पर लगी घड़ी पर जाकर लगी. शास्त्री उसकी बैटिंग से इतने प्रभावित हुए कि टाटा ग्रुप, जहां वो खुद काम करते थे, को जाकर उसके बारे में बताया. टाटा ग्रुप अपनी टीम मज़बूत करने के लिए हमेशा नए लड़कों की तलाश में रहती थी. शास्त्री कहते हैं, “उसकी सबसे अच्छी बात ये थी कि उसका बल्ला एकदम स्वच्छंद तरीके से घूमता था.” आने वाले सालों में सौरव गांगुली लेफ़्ट आर्म स्पिनर्स को तहस नहस करते हैं. ये वो एक शय थी जो शास्त्री ने सौरव में बहुत पहले ही देख ली थी.

इस सब के बावजूद, जब गांगुली को 1991-92 में इंडिया के ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए चुना गया, काफ़ी सवाल उठे. क्या एक फर्स्ट क्लास सेंचुरी के दम पर एक 18 साल के लड़के को इतने मुश्किल टूर पर भेज दिया जाना उचित था? ऐसा भी कहा जाने लगा कि इंडियन टीम में अनकहा कोटा सिस्टम चल रहा है और गांगुली को ईस्ट ज़ोन के कोटा की भरपाई करने के लिए टीम में रखा जा रहा था. इस बारे में गांगुली बहुत ही रूखे होकर जवाब देते हैं, “जब ईस्ट ज़ोन से एक टैलेंटेड प्लेयर को लिया जाता है तो पूरा मीडिया कोटा सिस्टम का शोर मचाने लगता है. बाकी जगहों से जब भी कोई टीम में लिया जाता है, कोई कुछ नहीं कहता है.”

चार महीने का वो टूर एक बुरा सपना था. गांगुली को एक रिज़र्व बैट्समैन के तौर पर गए थे. लिहाज़ा उन्हें ज़्यादा क्रिकेट खेलने को ही नहीं मिला. उन्हें बस एक इंटरनेशनल मैच खेलने को मिला. इसके साथ ही ये भी अफवाह उड़ी कि वो बारहवें खिलाड़ी का काम जैसे ड्रिंक्स ले जाना वगैरह नहीं कर रहे थे उनका रवैया ठीक नहीं लग रहा था. सौरव का को महाराज बुलाया जाता था. ये भी एक चीज़ थी जो उनके पक्ष में नहीं जा रही थी. कहा जाने लगा कि वो सुस्त और अहंकारी खिलाड़ी हैं. 1992 की वर्ल्ड कप की टीम से उन्हें ड्रॉप कर दिया गया. वो वापस बंगाल के लिए क्रिकेट खेलने आ गए. गांगुली इसके जवाब में कहते हैं, “ये बकवास है कि मैं टीम के साथ घुलमिल के नहीं रह रहा था या उनके लिए ड्रिंक्स नहीं ले जा रहा था. वो एक बेहतरीन इंडियन बैटिंग लाइन-अप था और उसमें मेरे लिए कोई जगह नहीं थी. मुझे बस ये समझना था.”

 

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